--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।
20 नवम्बर। पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रिय रंजन दासमुंशी के दिल्ली में निधन की खबर यहां पहुंचते ही राज्य के राजनीतिक हलकों में शोक की लहर दौड़ गई। दासमुंशी के नेतृत्व में अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेताओं ने उनको अपने-अपने तरीके से याद किया। 12 अक्टूबर 2008 को दिल का दौरा पड़ने और उसके बाद लकवाग्रस्त होने के बाद से दासमुंशी बिस्तर पर थे। सरकारी सूत्रों ने बताया कि दासमुंशी का शव रात को ही यहां लाया जाएगा और परिवार वालों की अनुमति मिलने पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा कि मंगलवार को दोपहर बाद ही विधानसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी जाएगी ताकि तमाम सदस्य दासमुंशी को श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रिय रंजन दासमुंशी के निधन पर गहरा शोक जताते हुए इसे एक भारी नुकसान करार दिया है। दासमुंशी के सम्मान में उन्होंने सोमवार को सरकारी दफ्तरों में आधे दिन की छुट्टी का भी एलान किया। ममता ने राज्य सचिवालय में कहा कि वे प्रिय रंजन दासमुंशी के निधन से शोकाकुल हैं। उनके परिजनों, शुभचिंतकों और पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनाएं। वे 1972 से ही बंगाल के एक बेहद लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने कहा कि दासमुंशी बीते लगभग नौ वर्षों से कोमा में थे। वर्ष 2008 में पड़े दौरे ने उनका राजनीतिक करियर लगभग खत्म कर दिया था। ऐसा नहीं होता तो वे अपने राजनीतिक जीवन में बहुत कुछ करते। वे उसके बाद भी जीवित थे। लेकिन अब दासमुंशी हमारे बीच नहीं रहे।
पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि उनके सिर से एक बार फिर पिता का साया उठ गया है। वे मेरे मित्र, फिलास्फर व गाइड थे। मुखर्जी ने कहा कि वे राजनीतिक ही नहीं बल्कि निजी मामलों में भी अक्सर उनसे सलाह लिया करते थे। किसी दौर में मुखर्जी दासमुंशी के बेहद करीबी थे। वे दोनों छात्र परिषद में भी साथ थे। मुखर्जी ने कहा कि साथ रहते हुए दासमुंशी ने कई बार उनके लिए खाना तक पकाया था। हमने एक साथ संयुक्त मोर्चा सरकार से लेकर नक्सल आंदोलन तक का दौर देखा था।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने कहा कि दासमुंशी उनके लिए बड़े भाई और गाइड के समान थे। एक राजनेता होने के साथ ही वे हम सबके लिए बड़े भाई व गाइड की तरह थे। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोमेन मित्र को दासमुंशी ने ही पहली बार सियालदह सीट से टिकट दिलाया था। मित्र ने कहा कि वे 1972 में पहली बार सियालदह सीट से विधायक चुने गए थे। प्रिय दा के दबाव में ही मुझे टिकट मिला था। वे हमेशा युवा नेताओं को प्रोत्साहित करते थे। वे बताते हैं कि 1972 से 1977 तक सरकार में रहने के दौरान कांग्रेस के 83 विधायक 30 साल से कम उम्र के थे।
माकपा के सांसद व पोलितब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा कि दासमुंशी अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ भी निजी संबंध बनाने की कला में माहिर थे। उनके निधन के साथ ही तथ्यों व तर्कों पर आधारित बहस का दौर खत्म हो गया। सलीम फिलहाल उसी रायगंज संसदीय सीट से सांसद हैं जहां से वर्ष 1999 व 2004 में दासमुंशी जीते थे।
विधानसभा में विपक्ष के नेता व कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य अब्दुल मन्ना ने कहा कि वे दासमुंशी के निधन की खबर से मर्माहत हैं। मन्नान ने कहा कि उन्होंने राजनीति का ककहरा दासमुंशी से ही सीखा था और वे आज जहां हैं उसमें उनका ही सबसे बड़ा योगदान है।
ममता सरकार ने केबिनेट मंत्री शोभनदेव चटर्जी ने कहा कि उनको राजनीति में दासमुंशी ही लाए थे। मैं उनका हाथ थाम कर ही राजनीति में आया था। यह एक बेहद दुखद दिन है। कांग्रेस के तमाम नेता दासमुंशी को पार्टी के संकटमोचक के तौर पर भी याद करते हैं। उनका कहना था कि जब भी पार्टी किसी संकट में होती थी दासमुंशी उसको संकट से बाहर निकालते थे। वे एक बेहद कुशल वक्ता था जिसमें दर्शकों को बांधे रखने की अद्भुत क्षमता थी।
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