कश्मीर सी सुलग रही है दार्जिलिंग



विशेष संवाददाता – प्रकाश पाण्डेय,

पहले हिंसा और पत्थरबाजी की ज्यादातर तस्वीरें कश्मीर में देखने को मिलती थी। लेकिन समय के साथ दूरियां कमी और कश्मीर से हजारों किलोमीटर दूर स्थित दार्जिलिंग एक और कश्मीर की तरह नजर आने लगा है। यहां का माहौल भी कश्मीर से अलग नहीं है, बस अंतर इतना है कि दार्जिलिंग आतंकवाद की वजह से नहीं, बल्कि भाषा की वजह सुलग रहा है।

चाय बागानों लिए मशहूर पश्चिकम बंगाल राज्य का यह पहाड़ी जिला अब जगह-जगह जली हुई गाड़ियों और पुलिसिया हुजूम से पटा पड़ा है।

सुलगते दार्जिलिंग के लोगों की पीड़ा की वजह है दीदी का बांग्ला भाषा फरमान जिसमें उन्होंने कहा था कि अब बांग्ला भाषा स्कूलों में अनिर्वाय होगी और इस पहाड़ी जिले में बड़ी संख्या नेपाली भाषा बोलन वाले गोरखा समुदाय की है। साल 1961 में नेपाली भाषा को बंगाल में आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला। फिर 1992 में नेपाली को भारत की एक आधिकारिक भाषा की सूची में डाला गया। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने डर की वजह से ही एक बार फिर 100 साल पुरानी अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर प्रदर्शन तेज कर दिया है। आंदोलन के मुखिया बिमल गुरुंग खुद इस वक्त किसी गुप्त जगह पर रह अपने समर्थकों से लड़ाई लड़ने की अपील कर रहे हैं।

खैर, उस त्रिकोणीय समझौते से भी आपको अवगत करवा दे जो गुरुंग ने केंद्र और राज्य सरकार के साथ किया था। जिसमें पूर्ण राज्य के दर्जे की जगह एक अनाम प्रशासनिक संघ की बात थी। इस समझौते की वजह से गुरुंग को इस बात का अहसास हुआ कि अब वह धीरे-धीरे अपनी लोकप्रियता खोते जा रहे हैं। साथ ही उन्हें अपना संघर्ष भी खतरे में लगने लगा था और दार्जिलिंग की मौजूदा हालात की वजह से एक बार फिर गुरुंग चर्चा में हैं। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जीजेएम के साथ बातचीत की पेशकश की और इस बात को भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार स्कूलों में बंगाली भाषा लागू करने नहीं जा रही है। इतना ही नहीं ममता ने गुरुंग पर यह आरोप भी लगा दिए हैं कि उनकी पार्टी जीजेएम के संपर्क उत्तर-पूर्व राज्यों के आतंकी संगठन से हैं।

समस्या को समझने के लिए अतीत को जानना बेहत जरूरी होता है। साल 1980 में सुभाष घीसिंग ने पहली बार गोरखालैंड की मांग की थी। उस दौरान भी इसी तरह से विरोध प्रदर्शन हुए थे और करीब 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। यह संघर्ष 8 साल बाद 1988 में तब खत्म हुआ जब दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल यानि डीजीएचसी का गठन हुआ। डीजीएचसी पिछले 23 सालों से दार्जिलिंग में मौजूद है और शासन कर रही है। इसके बाद साल 2004 में डीजीएससी के चुनाव होने थे लेकिन तब सरकार ने चुनाव न कराने का फैसला किया। चुनाव की जगह पर घीसिंग को इसका केयरटेकर बना दिया गया। इस वजह से संगठन में असंतोष फैलने लगा और यहां से गुरुंग ने संगठन से अलग होने का फैसला किया। गुरुंग को तेजी से समर्थन मिला। गुरुंग ने उस समय के इंडियन आयडल प्रतियोगी प्रशांत तमांग के लिए बड़े पैमाने पर समर्थन जुटाया और इस तरह से वह घीसिंग को उनकी सत्ता से उखाड़ फेंकने में सफल हुए। गुरुंग को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की स्थापना के लिए प्रेरणा मिली और उन्होंने इसकी नींव रखी। 2009 में जब लोकसभा चुनाव होने वाले थे तो बीजेपी ने सत्ता में आने पर तेलंगाना और गोरखालैंड दो राज्यों के निर्माण का ऐलान किया था। उस समय बीजेपी ने जसवंत सिंह को यहां से अपना उम्मीदवार घोषित किया था। जसवंत सिंह ने 51.5 प्रतिशत मतों से चुनावों में जीत दर्ज की। जुलाई 2009 में संसद का बजट सत्र हुआ तो तीन सांसदों राजीव प्रताप रूडी, सुषमा स्वराज और जसवंत सिंह ने अलग गोरखलैंड राज्य की मांग की। 21 मई 2010 को अलग गोरखालैंड की मांग ने उस समय एक नया मोड़ ले लिया जब अखिल भारतीय गोरखा लीग के नेता मदन तमांग की हत्या कर दी गई। जीजेएम के समर्थकों पर आरोप था कि उन्होंने तमांग को मारा है। इसके बाद दार्जिलिंग समेत कलिमपोंग और कुर्सेयांग में बंद का ऐलान हुआ।

इसके बाद 8 फरवरी 2011 को तीन जीजेएम कार्यकर्ताओं की गोली मारकर हत्या कर दी। इनकी हत्या उस समय हुई जब गुरुंग की अगुवाई में कार्यकर्ता जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग में दाखिल होने की कोशिश कर रहे थे। यहां पर हिंसा शुरू हुई और करीब नौ दिनों तक हिंसा का तांडव जारी रहा।

2011 में जब बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए तो जीजेएम के उम्मीदवारों ने दार्जिलिंग हिल एसेंबली से तीन सीटें जीती थीं। 2014 में यहां से बीजेपी के एस० एस० अहलूवालिया को जीत मिली और वह फिलहाल यहां से सांसद हैं। चुनाव जीतने के मकसद सत्ताधारी बीजेपी ने जो वादा किया उसे पूरा करने के आसार फिलहाल यहां के लोगों को नजर नहीं आ रहे हैं।

बीते कल के वाकयाओं को रखना इसलिए भी जरूरी था कि उसे समझे बिना सुलगते दार्जिलिंग को समझना आसान नहीं था।

खैर, दार्जिलिंग हिंसा को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय और ममता सरकार में तनातनी की स्थिति बनी हुई है। राज्य सरकार ने अपनी रिपोर्ट में मंत्रालय को गोरखा टेरिटोरियल ऐडमिनिस्ट्रेशन यानि जीटीए में होने वाले चुनाव हिंसा की वजह बताया है। उधर दार्जिलिंग में तनाव अब भी कायम है। गंगटोक-सिलिगुड़ी मार्ग बाधित है। सैलानी पुलिस सुरक्षा में सिलिगुड़ी तक पहुंचाए जा रहे हैं। वहीं सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने भी मोर्चे की मांग का समर्थन कर दिया है। वहीं राज्य सरकार ने केंद्र से जो अतिरिक्त कंपनियां मांगी थी वो भी केंद्र ने देने से साफ इनकार कर दिया है। उधर दार्जिलिंग के सांसद व भाजपा नेता एस० एस० आलूवालिया ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि दार्जिलिंग में आंदोलन चल रहा है और मुख्यमंत्री हालैंड में है। इतना ही नहीं उन्होंने इस हिंसा की उच्च स्तरीय जांच की मांग भी की है। वहीं दूसरी तरह ममता सरकार इलाके में तनाव के पीछे भाजपा का हाथ होने की बात कह रही है और तृणमूल के नेताओं की ओर से सरेआम यह कहा जा रहा है कि अब लड़ाई पहाड़ी और मैदानी इलाके की है। जबकि गोरखा लोगों का कहना है कि दीदी सियासत कर रही हैं।

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