अब नयी नस्लें "गंगाजी" को संग्रहालय में देखेगी क्या...?



04 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

(●) मंत्रालय भी नहीं बंद करा पा रहा गंगा में गिरते नाले

--- हरेन्द्र शुक्ला, वाराणसी। सरकार और सियासी दल गंगा की स्वच्छता की वकालत केवल गरीबी - बेरोजगारी हटाने की तर्ज पर कर रही है। यहां तक की मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गंगा के नाम पर उनको संरक्षित करने के लिए अलग मंत्रालय भी बना दिया। बड़ी जोरशोर से नमामि गंगे योजना भी लागू किया गया लेकिन यह विडंबना देखने को मिला कि गंगोत्री से लेकर बंगाल तक गंगा में गिरने वाली एक भी नाली आज तक बंद नहीं हुई।

गंगा स्वच्छता के सवाल पर अभी हाल ही में आये कैग की रिपोर्ट ने तो सरकार के कामकाज को नंगा कर दिया है। सीवेज, नाले के सहारे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने वाली गंगा अब तो काली होने लगी है। काशी में देखे तो यहां लगभग 350 एम एल डी अवजल प्रतिदिन नालों और सीवरेज के रास्ते गंगाजी में ही गिर रहा है। काशी में सामनेघाट से लेकर राजघाट तक गंगाजी कभी घाटों की सीढ़ियों को चुमती हुई कलकल करके बहती थी लेकिन अब पानी के अभाव में गंगा घाटों से दूर चली गयी है।

भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली गंगा जल के आभाव और प्रदूषण के कारण कोमा की ओर अग्रसर हो रही हैं। मंत्रालय भी गंगा में गिरने वाले नाले को बंद नहीं करा पा रहा है। ऐसे में सरकार को भी गंगा को चुनावी तामझाम से दूर रखकर जनआंदोलन बनाना होगा तभी गंगा का अस्तित्व बच पायेगा।

देश के संग्रहालयों को भी अब यह चाहिए कि समय रहते "गंगा-जल" को किसी जार में रखकर अपने यहां संरक्षित करें ताकि आने वाली नस्लें यह जान सके कि इस देश में कभी गंगा भी बहती थी।

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