अमावस्या की काली रात सी शेष है जनतंत्र



@प्रकाश पाण्डेय। लोकतंत्र यानि जनतंत्र और जनतंत्र में जनता सियासत के केंद्र में होती है क्योंकि हर निर्णय में उसकी भूमिका निर्णायक होती है। लोकतंत्र में चुनाव का महत्व इस तथ्य का प्रमाण है कि जनता का मनोभाव कुछ बदल रहा है। लोकतंत्र में चुनाव का महत्व न तो कोई समय देखता है और इससे होने वाले परिणामों और कुपरिणामों पर ही विचार करता है। हमारे देश में इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई आपातकालीन अवधि के फलस्वरूप होने वाले अत्याचारों का प्रबल विरोध करने के लिए जब जनता ने इस आपातकाल के स्थान पर चुनाव की मांग की तो इंदिरा सरकार को आपातकाल को तुरन्त ही हटा करचुनाव कराना पड़ा था।

लोकतंत्र और चुनाव के स्वरूप पर प्रकाश डालने का कार्य तभी पूर्ण कहा जाएगा। जब इसकी अच्छाइयों के साथ-साथ इसकी बुराइयों को भी प्रकाशित किया जा सके। लोकतांत्रिक सरकारी प्रक्रियाओं पर विचार रखने से हम यह देखते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव के बाद कई कमियों का प्रवेश होता है।

चुनाव के बाद चुना गया शख्स जनता का प्रतिनिधि होता है और आम नागरिक भी। लेकिन वह पद पाते ही असामान्य शख्स बन जाता है। हमारे देश में हुए चुनाव के बाद चुनावी मुद्दों को भूल कर कुर्सीवाद और स्वार्थवाद के अन्य सहायक तत्वों, जैसे भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद, सम्प्रदायवाद आदि में अपने पद और अधिकार को लगाना लोकतांत्रिक चुनाव के स्वरूप और परिणाम के विपरीत कार्य करना है। इससे लोकतंत्र का सही रूप प्रकट नहीं होता है।

जिसकी लाठी उसकी भैंस यह कहावत चिरकाल से प्रचलित है। अक्सर हमारे घर के बुजुर्गों की जुबान से इस कहावत को हम सुनते आए हैं और इसका स्वरुप मौजूदा सियासत में साफ दिख रहा है। राष्ट्रपति चुनाव की बात हो या फिर स्थानीय पार्षदी का चुनाव, हर जगह चालबाज चितेरे पैतरे पर पैतरा आजमाते हैं। ज्यादातर तो उन्हीं की जीत होती है और इन सबके बीच अगर कोई हारता है तो वो है आम नागरिक, जिसे देश के संविधान में हक तो मिला है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वो मौसमी आम की मिठास से ज्यादा कुछ नहीं है। सभी उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस चेहरे पर भी वो विश्वाकस करता है वो सत प्रतिशत खरा नहीं उतरता। ऐसे हालात में आमजन विचार करने के लिए मजबूर होते हैं कि आखिरकार हम किस पर विश्वासस करे। लोकतंत्र में चुनाव को एक अच्छा और कल्याणकारी स्वरुप माना गया है, लेकिन इसके दुरूपयोग तो इससे कहीं भयंकर और कष्टदायक है। चुनाव का स्वरुप हर बार धुंधला और मटमैला हो जाने की वजह से अब किसी प्रकार के अच्छे परिणाम और सुखद भविष्य की कल्पना कठिनाई से की जा रही है। मतदाता विवश और लाचार है। वह किसका चुनाव करे और किसका न करे। वह जिसे चुनती है, वही गद्दार और शोषक बन जाता है। इसलिए वह हारकर कभी इस दल को, कभी उस दल को अपना मत देती है लेकिन फिर भी कोई अंतर नहीं पड़ता है। आखिर में एक ही चीज सामने आती है कि चुनाव के स्वरुप में परिवर्तन होना चाहिए और ऐसा नहीं होता है तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की हत्या का सिलसिला जारी है।

वहीं देश के किसानों की बात करें तो हमारे यहां आज भी गांवों में ज्यादातर लोग खेती पर ही निर्भर हैं और कहा जाता है कि हमारे देश में किसान कर्ज में ही जन्म लेते हैं और जिंदगी भर कर्जदार ही बने रहते हैं। अपना खूनपसीना बहा कर अनाज पैदा करते हैं लेकिन वो खुद भूखा रह जाता है। पहले गांव के जमींदार किसानों का खून चूस कर अपना पेट फुलाए बैठे रहते थे। तब सारा काम करने वाले किसानों को कपड़ा व भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था। खैर, वो समय तो गुजर गया लेकिन हकीकत तो यह है कि कल और आज में कोई खास तब्दीली नहीं हो पाई है। हर पार्टी चुनाव के दौरान किसानों को अनुदान देने की बात करती है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही सारे वायदे जुमलों में तब्दील हो जाया करती है और अगर कुछ हुआ भी तो आमतौर पर अनुदान की राशियां सरकारी मुलाजिम की जेबों में चली जाती है।

हाल फिलहाल की बात करे तो मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 किसानों को पुलिस की गोलियों ने छलनी कर दिया। ये किसान सरकार के वादा खिलाफी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे और उनकी आवाज दबाने के लिए कोई रास्ता न सुझने की स्थिति में आखिरकार पुलिस का सहारा लिया गया और 6 किसानों की जीवनलीला को ही समाप्त कर दिया गया। यहां तक की आंदोलन की अग्नि न फैले इसके लिए राज्य सरकार ने मंदसौर, रतलाम और उज्जैन में इंटरनेट सेवा कर बंद कर दी थी। हद तो तब हो गई जब मौत के बदले मुआवजा के नाम पर 5 लाख रुपए देने की घोषणा की गई और इसके बाद भी स्थिति पर काबू न होता देख मुआवजे राशि को बढ़ा कर 10 लाख किया गया। लेकिन सियासी दबाव और विपक्षियों की हल्ला बोल से मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार इतना घबड़ा गई कि आखिरकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस की फायरिंग में मारे गए किसानों की मौत की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए और तो और इसके साथ ही मृतकों को एक करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की।

लेकिन इन सब के बीच सवाल उठता है कि क्या किसान की जिंदगी की कीमत एक करोड़ है? देश की बड़ी आबादी का पेट भरने वाला किसान खुद भूखा, बेचारे की तरह चिलचिलाती धूप, बरसात और ठंड सहकर अनाज पैदा करता है और आखिर तक वो कर्जदार रह रोता है। मजबूर और मेहनती भारतीय किसान मामूली जिंदगी भी खुशी-खुशी नहीं बीता पाता और उसके नाम पर सियासत करने वाले नेता दिल्ली पहुंचकर आलिशान बंगलो में कबाब और शबाब का लुत्फ उठाते हैं। हमारी लाचारी यह है कि हम जिस किसी पर भी विश्वांस करते हैं वो विश्वााघात करता है। हर पार्टी केवल चुनाव के दौरान ही क्यों समस्याओं के समाधान की बात करते हैं और चुनाव के बाद उनकी कथनी और करनी में अंतर क्यों आता है यह समस्या किसी एक पार्टी विशेष की नहीं है बल्कि सवाल सभी सियासी पार्टी के लिए हैं कि अब उन्हें बदलना होगा जुमलो से देश नहीं चलती। जनतंत्र को कृपया जुमलातंत्र न बनने दे। वायदे करे तो उसे निभाए भी।

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