कोलकाता, 09 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
--- रंजीत लुधियानवी। भारतीय जनता पार्टी की ओर से पश्चिम बंगाल में मुख्य विरोधी पार्टी बनने के लिए बीते चार साल से कोशिश तेज कर दी गई है। भाजपा अध्यक्ष अमित साह ने इस बार बांग्ला का नारा भी दिया था। राज्य में भाजपा का संगठन मजबूत करने के लिए बूथ स्तर पर जाकर संगठन बनाने पर जोर दिया था। पांच केंद्रीय नेताओं को भी कामकाज तेजी के साथ करने के लिए भेजा था। बताया जाता है कि दल की परिभाषा में ‘पालक’ नेताओं ने दल के अध्यक्ष को एक रिपोर्ट भेजी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बूथ स्तर तक संगठन तो किसी तरह बनाया जा सकता है लेकिन आगामी लोकसभा व विधानसभा चुनाव में दल के लिए सबसे बड़ी समस्या प्रभावशाली उम्मीदवारों को तलाशने की होगी। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंगाल भाजपा में अभी तक मुश्किल से 300 ऐसे नेता भी नहीं हैं, जो संगठन के साथ-साथ उम्मीदवार के तौर पर भी इलाके को प्रभावित कर सकें। दिल्ली से आकर रिपोर्ट देने वाले नेताओं की रिपोर्ट के बाद भाजपा में निराशा के साथ यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बंगाल में दल की हालत में ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा ? गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में कुल मिलाकर बूथों की संख्या 77,000 है। केंद्र में सत्ता संभालने के बाद राज्य में अपनी गतिविधियां तेज करने के बाद मुश्किल से राज्य भाजपा 40,000 बूथों पर कमेटी बनाने में सफल रही है। माना जा रहा है कि साल भर बाद 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कुछ हजार और कमेटियां बना सकेंगे। इसके साथ ही भाजपा के एक नेता का कहना है कि राज्य में किसी भी हालत में 20-25 हजार बूथों में कमेटियां गठन नहीं की जा सकती हैं क्योंकि वह अल्पसंख्यक बहुल इलाके हैं।
मालूम हो कि राज्य नेताओं पर भरोसा नहीं करते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने पालक के तौर पर पांच लोगों को पालक बनाया था। इसमें जहां केंद्रीय मंत्री अर्जूनराम मेघावाल, मनोज सिन्हा शामिल थे, वहीं कैलाश विजयवर्गीय, राहुल सिन्हा जैसे नेता भी शामिल थे। सांगठनिक तौर पर देखरेख की जिम्मेवारी शिव प्रकाश को दी गई। बताया जाता है कि दो-तीन बार लोकसभा इलाकों का दौरा करने के बाद अमित शाह को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि दल में जूझने वाले, प्रभावशाली उम्मीदवारों की कमी है।
गौरतलब है कि हाल में सबंग विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के बाद आगामी दिनों होने वाले नोवापाड़ा विधानसभा सीट और उलबेड़िया लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को देखते हुए दल की हालत का पता चलता है। भाजपा नेता मान रहे हैं कि 29 जनवरी को होने वाली दोनों सीटों पर जीतने की उम्मीद तो नहीं है, लेकिन किसी तरह दूसरा स्थान हासिल करके ही इज्जत बचाई जा सकती है। सबंग में वोटों के बढ़ने के बाद भी भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी। सबंग में अंतिम समय तक उम्मीदवार नहीं मिल रहा था, बाद में साल भर पहले माकपा छोड़ कर आने वाली अंतरा भट्टाचार्य को उम्मीदवार बनाया गया। यही हाल नोवापाड़ा में देखने को मिला, जहां मंजू घोष को उम्मीदवार बनाए जाने पर किरकिरी का सामना करना पड़ा। उलबेड़िया में भी उम्मीदवार की तलाश में दल की हालत खराब हो गई। पिछले लोकसभा चुनाव में भी पूर्व पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, फिल्म जगत के लोगों को टिकट देना पड़ा था। प्रभावशाली लोगों की तलाश में दल ने विद्वानों की तलाश शुरू की थी, लेकिन राज्य भाजपा के विद्वानों के प्रकोष्ठ के संयोजक कर्नल दीप्तांशु चौधरी ही अब तृणमूल में चले गए हैं।