हिंदी को बाजारू नहीं, बाजार की भाषा बनाना जरुरी - प्रो• पालीवाल



वाराणसी, 10 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

(★) बीएचयू भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में विश्व हिन्दी दिवस पर व्याख्यान

--- हरेन्द्र शुक्ला। वर्तमान दौर में हमारी सारी जरूरते यहां तक कि हमारी सामाजिक-राजनैतिक स्थिति भी बाजार तय कर रहा है। ऐसे में हमारी भाषा को भी अब बाजार ही तय करेगी। यह बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में आयोजित विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर 'बदलती हिंदी और लोक भाषाओं पर उसका प्रभाव' विषयक विशिष्ट व्याख्यान में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक प्रो• सूरज पालीवाल ने कही।

उन्होंने कहा कि जिस हिंदुस्तानी की बात गांधी-नेहरू कर रहे थे उसे बाज़ार ने बदल दिया है। इस बदली हुई स्थिति को अपनाकर ही हिंदी का विकास संभव है। यहां बाजार की भाषा से आशय बाजारू भाषा से नहीं है। बाजार की भाषा बनने से आशय अपने युग के अनुरूप खुद को विकसित और परिवर्तित करने से है।

अध्यक्षता करते हुये कला संकाय के प्रमुख प्रो• कुमार पंकज ने कहा कि रघुवीर सहाय की कविता 'हमारी हिंदी दुहाजू की वीवी' का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी पर बात करने से पहले इस कविता को पढ़ना चाहिए। उन्होने कहा कि अंग्रेजी के पापुलर राइटिंग का जवाब हिंदी के कई लेखक उसी तरह के पापुलर राइटिंग से दे रहे हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए यह एक विशिष्ट प्रयोग है। जिनकी साहित्यिक गंभीरता को अभी महत्वपूर्ण मानना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि ये पॉपुलर लिटरेचर हिंदी के गंभीर साहित्य में तो नहीं आ सकते लेकिन हिंदी के प्रचार के लिए उनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

डॉ• रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि हिंदी के समानांतर अंग्रेजी के वर्चस्व की बात कही और कहा कि अंग्रेजी विकसित इसलिए हुई क्योंकि वह सत्ता और बाजार के साथ जुड़ी हुई भाषा रही है। हिंदी के विकास के लिए जरूरी है कि वह सत्ता और बाजार की भाषा बने। उन्होंने भाषा के सवाल को मानवीय अस्तित्व के सवाल से जोड़कर देखने की बात कही। उन्होंने कला और साहित्य के भीतर हिंदी के विकसित होने पर आश्वस्ति जताई और नए रचनाकारों के द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिंदी को रेखांकित किया।

अतिथियों का स्वागत करते हुये भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा किे हिंदी को विज्ञान, तकनीक और संचार की भाषा के रूप में विकसित करने की जरूरत है। हिंदी की लोक भाषाओं के विकास से हिंदी की समृद्धि की बात भी कही। हिंदी का लोक भाषाओं से कोई झगड़ा नहीं है और हिंदी का विकास ही लोक भाषाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।

इस अवसर पर शोध-छात्र दिवाकर तिवारी, दीपा वर्मा, जगन्नाथ दुबे और शिवकुमार यादव ने भी अपनी बात कही। संचालन प्रो• चंपा सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन शोध छात्र उदय पाल ने दिया। इस अवसर पर प्रो• वशिष्ठ अनूप, डॉ• राजेश चौधरी सहित शहर के प्रबुद्ध जनों के साथ भारी संख्या में छात्र/छात्राएं उपस्थित रहे।

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