वाराणसी, 16 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
(★) बीएचयू उर्दू विभाग में प्रो• शहाबुद्दीन साकिब का खिताब
---हरेन्द्र शुक्ला। साहित्यिक कृतियों में रचनात्मक क्रिया का एक विशेष महत्व होता है। लेकिन रचनात्मकता की सीमा शायरी और उपन्यासों तक ही महदूद नहीं बल्कि गै़र अफ़सानवी नस्र को भी रचनात्मकता के माध्यम से मोहक और प्रभावी बनाया जा सकता है। ग़ैर अफ़सानवी नस्र (गद्य) को सरवत मन्द बनाने और दूसरे उलूम से इसका सम्बन्ध प्रांगण करने में सहायक होती है। अतः गै़र अफ़सानवी नस्र किसी भी ऐतबार से तख़लीक़ी नस्र से कमतर नहीं। यह बात काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग की ओर से मंगलवार को दस्तक अदबी फोरम के तत्वाधान में आयोजित ‘‘ग़ै़र अफसानवी नस्रः अहमियत और अफ़ादियत’ के तहत विशेष व्याख्यान में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय उर्दू विभाग के प्रो• शहाबुद्दीन साक़िब ने कहीं।
उन्होंने उर्दू के ग़ैर अफसानवी नस्र की विभिन्न विधाओं का ज़िक्र करते हुए ख़ाका, इनशाइया, सवानेह, खुदनविस्त और सफरनामों की ज़बान से बहस की और इन विधाओं में निहित रचनात्मकता और भाषा शैली की विषेशताओं को चिन्हित किया।
इस मौके पर बीएचयू उर्दू विभाग के डा• मोशर्रफ अली ने दस्तक अदबी फोरम की कार्यप्रणाली और उसके उद्देश्यों से अवगत कराया। विभागाध्यक्ष डा• आफताब अहमद आफाक़ी ने व्याख्यान में शिरकत कर रहे मेहमानों का तहेदिल से खैर मकदम करते हुये कहा कि दस्तक अदबी फ़ोरम और उर्दू विभाग ने अपने पूर्वजा़ें के कारनामों से परिचित कराने का जो बीड़ा उठाया है उसके लिए इस प्रकार के जलसा का होना बेहद ज़रूरी है। जलसे की सदारत विभागाध्यक्ष डा• आफ़ताब अहमद आफ़ाक़ी ने की। निजामत उर्दू विभाग के डा• क़ासिम अंसारी एवं धन्यवाद ज्ञापन डा• एहसान हसन ने दिया।