समीक्षक : पवन उपाध्याय
कहते हैं कि शोर की दुनिया में मौनं भी संवाद का एक सशक्त माध्यक है। एैसे में ‘मौन का संवाद’ हो और योगेश जी जैसा कोई विलक्षण ‘सर्विलांस’ हो तभी यह संवाद संकलित भी किया जा सकता है। कभी हिन्दी साहित्य में आलोचना के जनक नामवर जी को सुना था कि ‘‘कहानियाँ तो जिन्दा लोगों की होती है’’, मुर्दों की कैसी कहानियाँ भला? पुस्तक में ज्यादातर कहानियाँ मुर्दों की है। ताज्जुब है, मुर्दों पर भी कहानियाँ सम्भव है। स्मरण हो आया। परम्परा से विलग संसार में जो भी कुछ होता है, सच तो यही है, वह प्रभाव छोड़ता है। यहाँ भी बिना शोर के एक संवाद है, इसलिए पाठक के अन्तिस में तरल के बीच ठोस घन्तव से पैठ जाता है, नीचे, कहीं बहुत नीचे। जिसका अन्वेषण, बहुत से गम्भीर निष्कर्ष देगा। योगेश जी मूलतः एक अन्वेषक ही है, जिसका प्रभाव उनके सम्पूर्ण पत्रकारीय यात्रा में परिलक्षित हुआ है। जाहिर है जो खबर थी, उसने तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं में स्थान पा लिया, लेकिन जो विवशतावश उनकी निजी संवदेना थी, उसे कहीं अलग ही स्थापित होना था। वही है ‘‘मौन का संवाद’’ जिसकी पुष्टि स्वयं सृजक करता है कि ‘‘पुस्तक वास्तव में एक अन्वेषक की यात्रा का संवाद है।’’ सच में रचना, शिल्प और अकादमिक मापदण्ड से इतर कहने की कला भी बहुत मायने रखती हैं।
‘मौन का संवाद’ भौतिकवादी कालखण्ड, में अपनी संवदेनाओं को सहेजने वालों को सम्मान है वास्तव में। जिसकी रचनाओं का उद्गम ‘माँ’ से ही हुआ है। हम अपने आस-पास जो कुछ भी देखते सुनते हैं, पुकारते हैं, हमारी कल्पना में आने वाला ऐसा कुछ भी शेष नहीं जो रचयिता की दृष्टि से बचा हो। और यही प्रमाण भी है अन्वेषण का। किसी कविता में पाठक को अपने दिल की कहे का मान हो, तो कवि ने उसे अपना साध्य स्वीकारा है। वो कहते हैं ना ‘‘अच्छी कविता वह होती है, जिसमें कथा हो और एक अच्छी कथा वह है, जिसमें कविता हो।’’ एक दर्शन निहित है उनके इस कथन में।
एक कहानी याद आती है। उसका जिक्र जरूरी है। एक राजा ने अपने राज्य में एक सच्चे कवि की खोज में मुनादी करवाई। अगले दिन एक हजार एक लोगों ने स्वयं के कवि होने का दावा किया। राजा ने सबको बन्दी बनवा दण्डित कराने और बन्दी बनाने का फरमान जारी किया। कुछ दिन बाद बन्दीगृह में दौरा करने पर कुछ के पास कुछ न कुछ लिखा मिला। उन्हें कवि मान, राज्य में विशेष स्थान दिया। और बाकियों को खदेड़ किया गया। सुख सम्पन्नता के बीच वो सारे मोर महल में रहने लगे। कुछ समय बीतने पर उन शेष के बीच राजा पुनः गया। और पाया कि सब के सब ऐश में जी रहे थे। इस दौरान एक को छोड़ किसी के पास कुछ भी लिखा नहीं मिला। राजा ने उस एक का कवि रूप में चयन किया और निर्धारित किया कि इस कवि की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी है कि रोज ही ये एक क्रोध सुनायेंगे। अगले दिन से क्रम जारी हुआ। राजा मुग्ध हुूए। लेकिन दो चार दिन बाद ही कवि ने ऐसा कुछ करने से साफ इनकार ‘कर’ दिया और कहा कि यह मुझसे न होगा। मैं कवि हूँ भाट नहीं। मैं उद्गारों का कवि हूँ। किसी की मरजी का गुलाम नहीं। सब हतप्रद थे। लेकिन राजा ने एक सच्चा कवि पा लिया था। राजा ने स्पष्ट करते हुए कहा कि बन्दीगृह की यातना में भी यह कविता लिखते थे। चाहे दुःख की काली रात हो या सुख का प्रभात हो, बंदीगृह की यातना हो या मोर महल की विलासिता। समान रूप से कवि ही लिख सकता है। जो बिना लिखे रह ही नहीं सकता। ऐसे ही कवि हैं। ‘मौन से संवाद’ करते योगेश मिश्र। जिसकी खोज किसी युक्ति से नहीं होती। बल्कि स्वंय ही उनका पाठक करता है। उनकी रचना धार्मिता के इस बियावान में खो कर। मौन का संवाद भौतिकवाद के इस कालखण्ड में अपनी संवेदनाओं को सहेजे वाले ऐसे कामयाब लोगों को समर्पित है।
कवि ने कविताओं के अतिरिक्त अपने उद्गार में ‘इस बहाने’ स्वयं को बहुत ही सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है, जो पाठक को जिज्ञासु बनाता है। इसके अन्तर्गत उन साथियों का जिक्र भी, जिसने संग्रह रूपी माला में कविताओं में संवेदनाएँ पिरोई हंै। इस प्रयास में उत्साह दिलाया है। उन्हें रूपाकार किया है। नये शब्द चित्र बनाये है। कविताओं की संवेदनायें पकड़ी है। भाषा गढ़ी है। कवि ने परिवार के उन सदस्यों को बधाई भी दी हैं। जिनके कहे को पिरोकर कविता को आकार मिला है। और पाठकों को आगाह किया है कि ‘‘संकलन को मेरी गुस्ताखियों के कदम ही समझिए।’’ 1982 से 2016 के अजीबो-गरीब गुजरे वक्त, या यूँ कहें कि जिन्दगी में रूमानी खयालातों से क्रान्ति की उद्दाम चेतना तक का सफरनामा है ‘मौन का संवाद'। धर्म में धाँधली के विस्तार के बावजूद संकलन की प्रथमू रचना ‘माँ’ में ही स्वंय के जीवन में माँ की महत्ता से परिचित कराते हैं। सृजक कि- ‘‘तुमने मेरे लिए कई बार सृजक कि ‘तुमनें ‘‘तुमने मेरे लिए कई बार लाँघी धर्म की रेखाएँ।’’ जिसके स्वरूप की स्थापना में कहते हैं ‘‘वह दुआओं से बड़ी है/मेरे मन के मन्दिर में खड़ी है।’’
दरअस्ल यह योगेश जी की कुल इकसठ कविताओं का संकलन है, जो एक पत्रकारीय जीवन यात्रा के छोटे-छोटे पड़ाव हैं, उनके भीतर उमड़ने-घुमड़ने वाले विचारों का। जिससे दुनिया बेखबर थी लेकिन उनके स्वयं से मौन संवाद और साक्षात्कार की एक खबर थी। खबर, जिनसे हमारा तार्रूफ उनकी खबरों में नहीं हुआ। ज्योति शेखर ने लिखा है- ‘‘वो मौत का नंगा नाच हो या औरत की लुटी इज्जत यारों, पीड़ा को हम दिल की नहीं। अब खबरों की नजर से देखते हैं।’’ और शायद यही संशय रहा हो श्री मिश्र जी के भीतर जो ‘मौन का संवाद’ के स्वरूप में हम पाठकों के बीच आई। हम अपने आस-पास जो देखते हैं, उनमें क्या सोंचते हैं, क्या देखते हैं, पाठक एक बार मौन का संवाद पढ़ने से पहले सोच लें। जो कुछ भी उन्हें महसूस होगा, वह सब अनुक्रम के इन इकसठ कविताओं में निश्चित ही दिखेगा। और यहीं योगेश जी की पैनी दृष्टि की सराहना किए बगैर पाठक नहीं रह सकेगा। चूँकि योगेश जी मूलतः एक पत्रकार हैं इस लिए इस सृजन में बहुआयामी नजर आयेंगे। यायावर नजर आयेंगे। जब वो अपने इर्द-गिर्द हवाओं को महसूस करते हैं तब उसके नैसर्गिक प्रकृति से कहीं विलग कुछ स्थूल में स्थापित कर देते हैं।
‘हवाएं’ जिसका कोई रंग रूप ही नहीं, सिर्फ महसूसियत ही उसके होने का प्रमाण है, वह भी कुछ-उकेर जाती हैं ‘‘यह भी क्या जरूरी है कि/कुछ उकेरा जाय हर कहीं।’’ पाठक विवश होता है कि सच में कुछ ऐसा भी सम्भव है क्या? यह उकेरा जाना ही तो स्थापना है।
‘संविधान’ का वृहद स्वरूप मात्र दो अधूरे पृष्ठों में, वो भी सम्पूर्ण यर्थाथ’ ऐसे गम्भीर सवालों के साथ, जिनसे हम कौंध उठें। अहिंसा के पुजारी गाँधी के टोपी के नीचे सुलगता उपसंहार ‘‘मांस मज्जा विहीन/जातियों में बँटा समाज/जो खादी और खाकी/के पीछे चलता/खौफ खाता।’’
‘उग रहा है बबूल’ आज की मानव सभ्यता को छिपे लफ्जों में उघाड़ते सच की विभीषिका से परिचित कराता है।
‘शिक्षा’ में भारत के नौनिहालों की चिन्ता है कवि को और इसीलिए उन्हें वो कैद नजर आते हैं, स्कूल में। दीवारों और किताबों के दायरे में। व्यवस्था से प्रश्न है उनका कि ढेर सारे प्रभावों के बीच इकहरचरित्र निर्माण कैसे सम्भव है भला? जब कि बहुमुखी विकास जरूरी है आज।
‘भीड़’ के माध्यम से वर्तमान राजनीति का सिंह वलोकन किया है। योगेश जी ने। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि- ‘‘भीड़ क्रान्ति नहीं होती/क्रान्ति होते हैं विचार। जब ‘कविता, ‘सिंहालोकन की संज्ञा अखित्यार कर लें, तो यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती कि संकलन की प्रभावी रचना है भीड़ राजनीतिक अभिरूचि के पाठकों द्वारा कई बार पढ़ी जाने वाली कविता साबित हो सकती है।
लौकिक संसार में सम्भवतः निराशा के बीच आशाओं का सम्बल भी जुटाते हैं कवि ‘यह व्यथा’ में, और इस सच को स्थापित भी करते हैं कि प्रकृति ने समाज के बीच कोई भेद नहीं किया है। इसकी पुष्टि भी देखिये - ‘‘यह जीवन यात्रा/करनी पड़ती है पूरी/आम से राम तक कोई भी/यही शाश्वत है/उसने नहीं बाँटा है/किसी को कुछ विशेष।’’ इसके समर्थन में ‘बोध’ कविता भी पढ़ी जानी चाहिए। जहाँ यहीं संबल दार्शनिक भी व्यक्ति की पुष्टि करता है। -‘‘शब्द ब्रह्म होते हैं इसीलिए शब्द की तरह/इनका भी होना चाहिए बोध/ये मरते नहीं, चिरन्तन चलते रहते हैं/अंतरात्मा की तरह।’’ ‘नववर्ष’ में मानवता के लिए शुभकामनाएं भी जुहाते हैं तो राष्ट्र के नवनिर्माण का स्वप्न भी, आहवाहन भी और साथ ही साथ संकल्प भी। जाहिर है, फिर सच्चाई की जय कैसे न हो?
‘कथा’ में कितना तीखा व्यंग्य करते हैं योगेश जी जब वो सशक्त समाज के ‘एकता के मूल सिद्धान्त पर कुछ इस तरह कहते हैं - ‘क्योंकि यहाँ जोड़ना नहीं/तोड़ना दिलाता है/उपलब्ध्यिों का आकाश।’’
ठीक पहले ‘झूठी आशा’ में खुद के गिरेबान में झाँकने और हकीकत को स्वीकारने पर वह बल देते हैं कुछ इस तरह ‘‘अब करनी होगी खत्म/सभी ऐसी अभिलाषा/ताकि खत्म हो सके/जीवन की सारी झूठी आशा।’’
‘भीड़ का निर्माण फिर’ में कहीं न कहीं वर्तमान नगरीय सभ्यता और उसके विकास के उपरान्त मानव-जीवन में उपजी विकराल समस्याओं को अभिशप्त हम आप की व्यथा है। लेखक की संवेदना में इमारत पर घोसला बनाती चिड़िया है, नगर में झुग्गी-झोपड़ी में नगरीय जीवन को अभिशप्त लोग हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट के आगमन पर उजड़ना ही पड़ता है अक्सर तो साथ ही अपने भीतर की वह पीड़ा भी कि चाह कर भी उनके लिए कोई स्थाई ठिकाना न बनवा पाने की जिजीविषा का जरूरीपन।
हार्ड बाउण्ड पुस्तक के अन्तिम आवरण पृष्ठ पर नासिरा शर्मा एवं अल्पना मिश्र जी के पुस्तक के बारे में संक्षिप्त उद्गार अंकित हैं। जिसमें जहाँ एक ओर नासिरा शर्मा जी ने संकलन के अस्तित्व में आने को स्थापित किया है तो कविता में मौन के महत्व को भी। वहीं दूसरी ओर अल्पना मिश्र ने कविताओं में कवि के द्वारा जीवन की विवधि छवियों को भिन्न-भिन्न शेड्स और मूड्स में पकड़ सकने के रचानात्मक कौशल की पुष्टि की है। साथ ही ‘सपना’, ‘यादें’, ‘तुम मेरे लिए’, ‘बन्दरा’, ‘तुम्हारा प्यार, आदि कविताओं में प्रेेम की सूक्ष्म और सघन अनुभूतियों पर विशेष बल दिया है। सामायिक बुक्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक का मूल्य रूपये 395/- निर्धारित है।