उलबेड़िया में पता चलेगा कि मुकुल में है कितना दम...!



हावड़ा, 27 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

---रंजीत लुधियानवी। भगवा ब्रिगेड, संघ की पूरी शक्ति के साथ उलबेड़िया लोकसभा उपचुनाव में कूदे भाजपा नेता मुकुल राय के लिए उलबेड़िया के नतीजे इम्तिहान बन गए हैं। मीडिया में प्रचार किया जाता है कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना मुकुल ने की थी और ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने में तत्कालीन नंबर दो मुकुल ही इकलौते नेता थे, जिससे वाम दुर्ग ढह गया और दीदी मुख्यमंत्री बन गई।

अब पश्चिम बंगाल के दूसरे इलाकों की तरह हावड़ा तृणमूल कांग्रेस का गढ़ बन गया है। दोनों लोकसभा सीटें, 16 में 15 विधानसभा सीटें और पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद पर दल का बोलबाला है। कहा जा रहा है कि मुकुल वामदुर्ग में सेंघ लगा सकते हैं तो ममता का दुर्ग तो महज छह साल पुराना है, इसे ध्वस्त करना उनके लिए चुटकियों का खेल होना चाहिए।

उलबेड़िया लोकसभा केंद्र में कुल मतदाताओं की संख्या 15,77,396 है, जिसमें महिला मतदाताओं की संख्या 7,61,383 और थर्ड जेंडर के मतदाता 34 हैं। यह तो ताजा मतदाता सूची के आंकड़े हैं। 2011 के जनगणना विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कुल मिलाकर सात विधानसभा केंद्र के सिर्फ उलबेड़िया विधानसभा इलाके में, अब यह तीन हिस्सों में बंट चुका है। पहले एक उलबेड़िया ही था। उलबेड़िया पूर्व, उलबेड़िया उत्तर और उलबेड़िया दक्षिण में तब जनसंख्या 1,91,599 थी। इसमें हिंदु 1,15,932 और मुस्लिम 75,409 थे। ग्रामीण उलबेड़िया में कुल 80,793 लोगों में 64,171 हिंदू, 16,483 मुस्लिम, शहरी उलबेड़िया में कुल 1,10806 लोगों में 57,761 हिंदू, 58,926 मुस्लिम थे।

उलबेड़िया माकपा का गढ़ माान जाता रहा है और यहां माकपा ने 1971 में कांग्रेस को पराजित करते सीट पर ऐसा कब्जा किया कि 2004 तक आसानी से जीतते रहे। तृणमूल कांग्रेस के सर्देंदु विश्वास 1998 में सुदीप्त राय 1999 में और राजीव बनर्जी 2004 में माकपा नेता हन्नान मोल्ला का मुकाबला नहीं कर सके और अकेले मोल्ला ने ही सीट पर लगातार 8 बार जीत दर्ज की। लेकिन 2009 में सुल्तान अहमद ने मोल्ला को पराजित किया और इसके बाद 2014 में भी जीतने में सफल रहे। 2009 में कुल 10,09,820 वोटों में भाजपा को 42,443 और 2014 में 11,86,027 वोटों में 1,37,137 (16.8) फीसद वोट मिले थे।

आगामी 29 जनवरी को होने वाले उलबेड़िया लोकसभा के उपचुनाव को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए प्रशासन ने कमर कस ली है। ग्रामीण पुलिस के अधीक्षक गौरव शर्मा ने बताया कि उलबेड़िया में सभी बूथों को संवेदनशील घोषित किया गया है। कुल 1818 पोलिंग बूथों पर वोट डाले जाएंगे। चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की मूल जिम्मेवारी केंद्रीय बलों की 30 कंपनियां संभालेंगी। जबकि राज्य के 6,500 पुलिस के जवान भी सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में मदद करेंगे। जिलाधिकारी चैताली चक्रवर्ती ने बताया कि उलबेड़िया में कुल 1818 पोलिंग स्टेशन बनाएं गए हैं। इनमें 17 अतिरिक्त हैं। ग्रामीण इलाकों में पोलिंग स्टेशनों की संख्या 1,620 है, शहरी इलाकों में 198 पोलिंग स्टेशनों पर वोट डाले जाएंगे। इस बार कुल वाटरों की संख्या 15,77,396 है, इनमें पुरुष 8,15,979 और महिला मतदाता 7,61,383 हैं। इसके अलावा थर्ड जेंडर के 34 मतदाता भी हैं। इस बार चुनाव में 47,907 युवा पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। वहीं बंगाल में उलबेड़िया लोकसभा उपचुनाव में पहली बार वोटर वेरीफाएबेल पेपर आॅडिट ट्रेल (वीवीपैट) का भी इस्तेमाल किया जाएगा।

चुनाव पूर्व पुलिस ने इलाके में सघन छापामारी अभियान चलाकर कुल चार बदमाशों को गिरफ्तार किया है। वहीं छापामारी के दौरान 10 हथियार व कारतूस, 34 विस्फोटक, 18,318 लीटर अवैध शराब, 2.78 लाख नकद और दो वाहन भी जब्त किए हैं।

सुल्तान अहमद के निधन के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि किसे सीट मिलेगी। उनकी पत्नी सजदा अहमद को टिकट मिलने के बाद गुटबाजी दिख नहीं रही है। माकपा ने सबीरुद्दीन मोल्ला, कांग्रेस ने शेख मदस्सर हुसैन वारसी और भाजपा ने अनुपम मल्लिक को चुनाव मैदान में उतारा है।

स्थानीय तृणमूल कांग्रेस नेता ने ढाई लाख से जीत का दावा करके विपक्ष को हताश कर दिया था। इसके बाद शुभेन्दु अधिकारी, पार्थ चटजी, अभिषेक बनर्जी नेरोड शो, प्रचार अभियान में पहले से दोगुने वोटों से जीत का दावा किया। माकपा की ओर से सूर्यकांत मिश्र से लेकर सभी ने चुनाव प्रचार किया। भाजपा की ओर से कैलाश विजयवर्गीय, मुकुल राय, लाकेट चटर्जी, दिलीप घोष, राहुल सिन्हा से लेकर सभी नेता प्रचार में शामिल हुए। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर चौधरी समेत बड़े नेता भी प्रचार के लिए पहुंचे।

क्या वास्तव में ममता को शिखर तक पहुंचाने में मुकुल की कोई भूमिका थी, इसका पता चुनाव नतीजों से चल सकेगा। यहां 2014 में माकपा को 22.7 फीसद और भाजपा को 16.8 फीसद वोट मिले थे। बीते चार सालों में इलाके में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें, तृणमूल में गुटबाजी, माकपा में हताशा समेत ऐसे कई कारण हैं, जिससे माना जा रहा है कि माकपा और भाजपा में पांच फीसद वोटों का फर्क पूरा करने में मुश्किल नहीं होगी। इससे ज्यादा कुछ हासिल करने पर मुकुल की भाजपा में हैसियत बढ़ सकती है, लेकिन अगर विपरीत हुआ तो हैसियत में गिरावट तय है।

ताजा समाचार

National Report



Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News