गोलियों ने छलनी कर दिया...



• वामपंथी शब्दावली और पार्टी की सफाई का मतलब

@प्रकाश पाण्डेय, कोलकाता। सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है यह एक अपने आप में वीभत्स विचारधारा है और जब तक यह वीभत्स विचारधारा जीवित है तब तक इसके गर्भ से खौफ और दानव ही उपजेंगे। खुद के खिलाफ उठने वाली आवाजों को खामोश करने और सर्वनाश रूपी अमानवीय खेल के लिए वामपंथी विशिष्ट शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं जिसे पार्टी की सफाई कहते हैं। अंग्रेजी में पर्ज भी कहा जाता है इसका अर्थ है सफाई करना।

बंगाल में भी कार्ल मार्क्स के दत्तक संतानों की कमी नहीं थी और इस बात की पुष्टि साल 1993 का 21 जुलाई करता है। वामपंथ कोई पंथ न होकर मार्क्स-लेनिन का एक ऐसा कॉकटेल है जिसमें सिर्फ और सिर्फ हिंसा की फसल उगते रही है। 1993 में कलकत्ता की सड़कों पर सरेआम 13 लोगों को पुलिसिया गोली का शिकार होना पड़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने मामले की जांच करवाने की जगह उन पुलिसकर्मियों की पीठ थपथपाई जिन्होंने 13 कुनबों को उजाड़ दिया था। इस गोलीकांड के विरोध में हिन्दुस्तान भर से विरोध की आवाजें उठी लेकिन बंगाल के सत्ताधारी वामपंथी सियासी अकड़ रूपी कॉकटेल के नशे में झूमते रहे। उन्हें किसी की फिक्र नहीं थी। विपक्ष में रहते हुए वामपंथी अधिकार, लोकतंत्र और आजादी जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और जुलूस निकाल अपना विरोध दर्ज करते हैं वही सत्ता में आते ही सबसे बड़े दमनकारी खुद बन जाते हैं। यह इनकी चाल, चरित्र की असल हकीकत को बयां करता है।

विचार का आचार बना शौक-ए-मिजाज इस पंथ के फॉलोवर कभी सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले लड़ाकू बन जाते हैं तो कभी नागरिक अधिकारों के लिए सड़क पर तमाशा करते हैं। अधजल गगरी छलकत जाए यानि इस विचारधारा की मौलिक समझ के बगैर, आधी अधूरी जानकारी और प्रोपोगंडा के शिकार लोग साधारण सी बात को नहीं समझ पाते हैं कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद की विचारधारा पर चलने वाले सोशलिस्ट देशों ने जितना जनसंहार किया है उतने लोग तो किसी विश्वनयुद्ध में भी नहीं मारे गए होंगे।

20वीं सदी में सोशलिस्ट स्टेट्स ने 90 से 100 मिलियन लोगों की जाने ली। सबसे अधिक 65 मिलियन चीन में, रूस में 20 मिलियन, कम्बोडिया में दो मिलियन, नार्थ कोरिया में दो मिलियन, इथोपिया में 1.7 मिलियन, अफगानिस्तान में 1.5 मिलियन, इस्टर्न यूरोप में एक मिलियन, वियतनाम में एक मिलियन, क्यूबा और लैटिन अमेरिका में करीब डेढ़ लाख लोगों का कम्युनिस्ट-सरकारों ने जनसंहार किया। वामपंथियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने न सिर्फ जनसंहार किया बल्कि उसका औचित्य बताकर खुद को आरोपमुक्त भी साबित करने की कोशिश की और इस तालिका में पश्चियम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम भी शुमार है जिन्होंने 1993 के गोलीकांड को जायज ठहरा उन पुलिसकर्मियों की पीठ थपथपाई जिनकी गोलियों ने 13 लोगों की जान ले ली।

इस विचारधारा के महान व्याख्याता कहे जाने वाले लेनिन दुनिया के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने अपने ही लोगों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। मध्य एशिया के मुसलमानों का जनसंहार हुआ और हजारों मस्जिदों और इस्लामी संस्थानों को तबाह कर दिया गया। वैसे सोवियत संघ, चीन और कम्बोडिया की कई कहानियां ऐसी हैं जिन्हें सुनकर मन में खौफ भर जाता है। हिंदुस्तान में ये बातें स्कूलों और कॉलेजों में नहीं पढ़ाई जाती हैं। वामपंथियों की दलीलों को किताब में पेश कर यह बता दिया जाता है कि वहां क्रांति हो रही थी। क्रांति के दुश्मनों व सर्वहारा के दुश्मनों को मारा गया था। पर्दे की आड़ में शब्दों को परोसने की कला यदि किसी को सीखनी हो तो वो भारत के वामपंथी लेखकों से सीख सकता है।

भारत में वामपंथी शासन और सत्ता की बात करे तो पश्चिोम बंगाल राज्य में वामपंथियों ने 34 साल तक राज किया। लेकिन इस 34 साल के शासनकाल में राज्य को गुंडागर्दी, हत्याएं और अपहरण के अलावा कुछ न मिला। आहिस्ते-आहिस्ते विकास का यहां से नामो निशां मिट गया। कल-कारखानों के लिए जाना जाने वाला बंगाल इनके शासन के दौरान हड़तालों और रैलियों के लिए विश्व। के समक्ष शुमार हुआ। सत्ता में बने रहने के लिए शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बूथे लुटी जाने लगी। 1993 में कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में लोगों ने फोटो पहचान पत्र की मांग करते हुए सड़क पर विरोध शुरू किया। आहिस्ते-आहिस्ते विरोध का स्वरुप बड़ा होता गया। 21 जुलाई को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राइटर्स बिल्डिंग घेरने की योजना बनाई लेकिन उन्हें रास्ते में ही कोलकाता पुलिस द्वारा रोक दिया गया और जिन्होंने पथ रोकने से मना किया उनका कारवां गोलियों की बौछार तले खत्म हो गया। 13 कांग्रेस कर्मियों ने जाने गवाई और उनकी मौत मौजूदा सरकार के लिए विरोध दंड करार दिया गया। वहीं युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर पुलिस फायरिंग मामले की जांच कर रहे आयोग ने गोलीकांड को जलियांवाला बाग से भी बदतर ठहराया और इस घटना में मृत युवकों के परिजनों को 25-25 लाख और घायलों को पांच-पांच लाख रुपए मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।

गौरतलब है कि 21 जुलाई, 1993 को तत्कालीन युवा कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने राज्य सचिवालय अभियान की अगुआई की थी। ममता ने बंगाल में सत्ता संभालने के बाद उस घटना की जांच के लिए उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशांतो चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया था। आयोग के अध्यक्ष ने सात सौ पन्ने की अपनी रिपोर्ट को सरकार को सौंपने से पहले उसे सार्वजनिक करते हुए मुख्य अंश भी पढ़ कर सुनाए। उन्होंने कहा, उस दिन युवा कांग्रेस के अभियान को रोकने के लिए पुलिस को गोलियां चलाने की कोई जरूरत नहीं थी और फायरिंग के लिए उस दिन कोलकाता पुलिस के कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी जिम्मेदार थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पुलिस ने युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर 75 राउंड गोलियां चलाई थीं। हर साल तृणमूल कांग्रेस की ओर से 21 जुलाई को शहीद दिवस मनाया जाता है और इस दिन दीदी मारे गए शहीदों के परिजनों को आर्थिक मदद भी देती हैं। खैर, यह तो एक कांड था इसके अलावा भी बंगाल में ऐसे कई कांड वाम सत्ता के दौरान घटित हुए जो इस विचारधारा की कलई को खोलने के लिए काफी है।

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