@प्रकाश पाण्डेय, कोलकाता। यदि 21 जुलाई के इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। 21 जुलाई 1658 को औरंगजेब ने अपने अनौपचारिक राज्याभिषेक का जश्नं मनाया था। वहीं 21 जुलाई 1883 को कोलकाता में भारत के पहले सार्वजनिक थियेटर हॉल स्टार थियेटर की शुरुआत हुई थी। 21 जुलाई 1884 को लॉर्ड्स के मैदान पर पहला क्रिकेट टेस्ट मैच खेला गया था। 1904 में इसी दिन 13 साल तक चले निर्माण कार्य के बाद रूस ने 4607 किलोमीटर लम्बी ट्रांस साइबेरियन रेल लाइन का काम पूरा हुआ था। 1920 को श्री रामकृष्ण परमहंस की धर्मपत्नी शारदा मां का निधन हुआ था और 21 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखा था। 1947 में भारत की संविधान सभा ने 21 जुलाई को ही राष्ट्रीय ध्वज को मंजूरी दी थी। 1963 में इसी दिन काशी विद्यापीठ को विश्वाविद्यालय का दर्जा मिला और इसी तारीख को साल 2007 में प्रतिभा पाटिल भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनी थीं। लेकिन, इन सारी घटनाक्रमों से ज्यादा महत्वपूर्ण है साल 1993 का 21 जुलाई, क्योंकि इसी दिन कोलकाता पुलिस की गोलियों की बौछार ने 13 लोगों की जान ले ली थी। यह दिन बंगाल व देश के इतिहास में काले दिन के रूप में अंकित हो गया और शहीदों के सम्मान में ममता बनर्जी की 21 जुलाई की महा रैली एक परम्परा सी बन गई।
बंगीय अवाम इन शहीदों की शहादत को न कभी भूल पाई है और ना ही आगे भूल पाएगी। बंगाल में वाम सत्ता के दौरान यातनाओं का वो दौर देखने को मिला जिसने सरेआम प्रजातंत्र का गला घोटना शुरू कर दिया था। हक-हकूक की बलि दी जा रही थी। आवाज उठने से पहले ही खामोश कर दी जाती थी। राज्य की राजधानी कलकत्ता को इसी दौर में हड़ताल और जुलूसों का तमगा मिला। हालांकि वाम सत्ता की कमियों को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस शहर को मृत करार दे दिया था।
आज से 50 साल पहले उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र के तहत पड़ने वाले गांवों में खुद को क्रांतिकारी कहने वाले वामपंथियों की अगुआई में आदिवासी किसानों ने चीन में हुई क्रांति की तर्ज पर हथियारबंद बगावत की शुरुआत की थी। दरअसल, उस समय बंगाल में वाम सत्ता होने के कारण जुझारू किसान आंदोलन अपने उफान पर था। जिससे घबड़ाए जमींदारों ने बटाईदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया था। बटाईदार किसान कभी आंदोलन के जरिए, तो कभी कोर्ट के जरिए अपने हकों के लिए लड़ रहे थे। हदबंदी को चकमा देने वाले झूठे दस्तावेज जलाए जाने लगे, कर्ज के प्रोनोट नष्ट किए जाने लगे और जमींदारों के कारिंदों से बंदूकें छीनने की मुहिम शुरू हो गई। कानू सान्याल ने इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व किया था। कानू सान्याल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने खुदकुशी कर ली थी। लेकिन मौत की वजह आज तक साफ नहीं हो पाई है। इसी दौरान शुरू हुई छिना झपट की सियासी आगाज ने विकास को अलविदा कह दिया और आगे चलकर इसका परिणाम यह हुआ कि कल-कारखानों में वाम यूनियन की नींव पड़ी और उन्होंने हर रोज अपने मतानुसार बेतुके मांग रखने शुरू किए, जिसकी पूर्ति किसी के लिए सम्भव न थी। आखिरकार एक-एक कर कल-कारखाने बंद होते चले गए और चौतरफा बेरोजगारी का आलम पसरा। आहिस्ते-आहिस्ते विरोधियों को खामोश करने का काम शुरू हुआ और दमन की आंधी में सभी लुप्त होते चले गए। चुनाव के दौरान लूट-पाट और मताधिकार उन लोगों के लिए वर्जित था जो विरोध में मतदान करते थे। गाहे-बगाहे शिनाख्त हो जाने पर पिटाई और घर फूंकाई आम प्रचलन बन गई थी। 21 जुलाई 1993 के विरोध प्रदर्शन के पीछे भी कारण यही था। 1991 के विधानसभा चुनाव में हुए लूट-पाट की घटनाओं के विरोध में राज्य कांग्रेसकर्मी ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य सचिवालय के समक्ष प्रदर्शन के लिए निकले थे। सचिवालय से करीब एक किलोमीटर दूर धर्मतल्ला के पास मेयो रोड और डारिना रोड क्रासिंग पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चलाई और इस गोलीबारी में 13 लोगों की मौत हो गई।
इस घटना के बाद राज्य भर में वाम विरोधी लहर चल पड़ी। राज्य के मुख्यमंत्री ज्योति बसु इस घटना को आम घटनाओं की तरह पेश कर शांत हो गए। उनके अनुसार पुलिस ने गोली चलाकर कुछ भी गलत नहीं किया था। तत्कालीन सरकार में पुलिस प्रभारी मंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य ने घटना के संदर्भ में कहा था कि जो कुछ भी हुआ इसमें गलत कुछ भी नहीं था और बाद में साल 2011 में सत्ता परिवर्तन के दौरान आयोग के समक्ष बायन देते हुए भी उन्होंने कहा कि वो अपने बयान पर अडिग हैं।
लेकिन इन सब के बीच दीदी यानि ममता बनर्जी दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय होती गई। 21 जुलाई 1993 की घटना में मरे लोगों को दीदी ने शहीद का दर्जा दिया और उनकी याद में हर साल धर्मतल्ला के निकट टीपू सुल्तान मस्जिद के सामने महारैली करने लगी, जिसमें राज्य भर से भारी संख्या में लोग एकत्र होने लगे। उनकी यह रैली आगे चलकर शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया बना और बंगीय कैलेंडर में 21 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में शामिल किया गया। ऐसे तो 21 जुलाई को कई घटनाएं हुई हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में जगह भी मिली है बावजूद इसके उन सारी घटनाओं से आगे दीदी की शहीद महारैली इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग 21 जुलाई यानि बांग्ला शहीद दिवस जानने लगे हैं और उनकी शहादत ही दीदी की सत्ता प्राप्ती का जरिया भी माना जाता है।