प्रशंसा की मदिरा मुख से नहीं कानों से पी जाती हैं : मुनि श्री प्रतीक सागर



हावड़ा, 03 मार्च 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

उत्तर हावड़ा के डवसन रोड स्थित पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर के सभागार में आयोजित धर्म सभा में क्रांतिवीर मुनि श्री प्रतीक सागर जी महाराज ने कहा कि दर्पण में अपना चेहरा देखो और चेहरे में अपना चरित्र देखो जब कोई आप की प्रशंसा करें तो आप को अंतर्मूखी हो जाना चाहिए। प्रशंसा एक मिठी मदिरा हैं, धीमा जहर हैं, इसे पचा पाना बड़ा कठिन है। प्रशंसा की मदिरा मुख से नहीं कानों से पी जाती हैं।

मुनि श्री ने आगे कहा कि मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे सभी धर्म सीखने की पाठशाला है और दुकान, घर धर्म को जीने की प्रयोगशाला हैं। धर्म तभी आप के जीवन में परिवर्तन करेगा जब मंदिर से घर तक आपके साथ जायेगा। मुनि श्री ने आगे कहा कि लक्ष्मी पुण्य से मिलती हैं मेहनत से नहीं। मेहनत से मिलती तो मजदूरों के पास क्यो नहीं है ? बुद्धि से मिलती तो पण्डितों के पास क्यों नहीं है ? जिन्दगी में अच्छी सन्तान, सम्पत्ति, सफलता और सम्मान पुण्य से मिलता हैं और पुण्य मिलता है देव शास्त्र गुरु की सेवा करने से।

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