चैती : लोक के आलोक में



वाराणसी, 05 अप्रैल 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

04 अप्रैल 2018 को भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, क्षेत्रीय केन्द्र वाराणसी के संयुक्त तत्त्वावधान में काशी व्याख्यान माला के अन्तर्गत आयोजित "चैती : लोक के आलोक में" विशिष्ट व्याख्यान सह प्रस्तुति का आयोजन मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के प्रेक्षागृह में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए भारत अध्ययन केन्द्र की शताब्दी पीठ आचार्य एवं विख्यात लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि चैती सिर्फ गाने की विधा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण समाजशास्त्र इसमें समाया हुआ है। इसमें सम्पूर्ण प्रकृति समाहित है। चैती में संयोग और वियोग का चरम साफ तौर पर देखा जा सकता है। श्रीमती अवस्थी ने कहा कि हमारे समाज में वर्जनायें और मर्यादायें तो थी लेकिन इसके बाद भी पूरा साहित्य संगीत से भर गया, चैती में इसकी प्रतिध्वनि स्पष्ट रूप से मिलती है। यह राम का जन्मोत्सव मास भी है इसीलिए चैतियों कि पंक्ति में ‘रामा’ शब्द का अन्त में विशेष प्रयोग आता है। यह अवधी, मगही और भोजपुरी में भी खूब रची गयी। आज से 70 वर्ष पहले रेडियों आया उसमें भी चैती सुनी जा रही थी। निर्गुण परम्परा की चैतियों में अलग-अलग प्रकार की धुन मिलती है।

महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, किशोरी लाल गोस्वामी और अम्बिका दत्त व्यास ने भी चैती की रचना की है। चैती का ही एक विशेष प्रकार घाटों पर भी मिलता है जिसमें गहन दर्शन है चैती में जड़चेतन के संवाद के ढेर सारे आख्यान हैं। लोक रचनाकारों ने बिम्ब एवं प्रतिबिम्बों का जो प्रयोग किया है वे कहीं न कहीं प्रकृति के अवयव एवं अंग हैं। गायिका मालिनी अवस्थी ने अपनी विशेष प्रस्तुति में कुछ चैतियाँ प्रस्तुत की जिनमें-

1. चईत चनरमा न भावै हो रामा दरद जगावै हो

2. नईहर से केहू नाही आईल हो रामा बितल फगुनवा

भउजी के कठिन करेजवा हो रामा,बीतल फगुनवां

3. बैरन रे कोयलिया तोरी बोली न सुहाय

4. सुगना बोलै ला अटरिया हो राम

प्रमुख थीं।

श्रीमती अवस्थी ने स्पष्ट किया कि हर विधा में बदलाव आया, किन्तु परम्परा ने चैती में कोई बदलाव नहीं आने दिया और न ही चैती के शब्द बदले। वियोगिनों द्वारा रचित चैती नितांत एकान्त में रची गयी है। उदाहरणार्थ- लिहले जनम रघुरइया हो राम अवध में, धावत राम बकईयाँ हो रामा धूरी भरे तन।

राम कथा के उपादान एवं दृष्टान्त चैती में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। राम को हटा दे तो लोक में कुछ भी नहीं है। राम का कष्ट पूरे भारतीय जनमानस का कष्ट है। श्रीमती अवस्थी ने चैती के शृंगार पक्ष पर बात करते हुए, ‘रात हम देखली सपनवा हो रामा, पिया घर अईलें’ तथा ‘सोवत निदिया जगावे हो रामा, भोरे ही भोरे चैतियों’ का उल्लेख किया जिसमें राम को साक्षी रूप में स्पष्ट किया गया है। 

कार्यक्रम में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि वर्तमान में देश सांस्कृतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, व्यक्ति समाज को छोड़कर अपने ऊपर फोकस करने लगा है, सेल्फी उसका ताजा प्रमाण है। मुगलों के आक्रमण के बाद गिरधरनागर कोठों का नागर हो गया। उन्होंने चैती के कई रूपों को स्पष्ट करते हुए कुछ चैतियों की चर्चा की। उनमें पहला वह जिसमें नायिका चिझ्ति नायक की प्रतीक्षा कर रही है। दूसरी होली के बाद की चैती है जिसमें अनदेखे तथा अनास्वादित अपूर्व नायक की प्रतीक्षा है। श्री भट्टाचार्य ने चैती में आम्रवृक्ष के महत्त्व को रेखांकित करते हुए आम्रवृक्ष को एक संक्रमण का प्रतीक बताया। उन्होंने काजी नजरूल इस्लाम द्वारा लिखित बांगला चैती को उद्धृत किया तथा यह स्पष्ट किया कि मशीनी जिन्दगी से बचना है तो हमें मिट्टी की तरफ जाना होगा।

कार्यक्रम में बोलते हुए हिन्दी विभाग, महिला महाविद्यालय की प्रो• चन्द्रकला त्रिपाठी ने कहा कि चैती में भारतीय भाव लोक के माध्यमों से सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होते हैं। हमें अपने लोक तथा अपने संगीत की ओर लौटना चाहिए। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो• राजेश्वर आचार्य ने बताया कि चेत जाना और चुन चुन कर अच्छे संस्कारों को अगले वर्ष तक निभाये रखना ही चैती है। फागुन के उल्लास एवं उत्सव के उन्माद के बाद हर प्रकार के आवेग का समन करके जब नया वर्ष आता है वह आपको चेताने के लिए ही आता है कि अब जाग जाइये, सम्भल जाइये। ढेर सारी समर्थ चैतियाँ हैं जो भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य थाती कही जा सकती हैं। इनमें चेतना के सभी आयामों की स्पष्ट झंकार मिलती है।

इस विशेष प्रस्तुति में मालिनी अवस्थी के साथ हारमोनियम पर धर्मनाथ मिश्र तथा तबले पर पंकज राय ने संगत की।

कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के निदेशक डाॅ• विजय शंकर शुक्ल ने किया तथा संचालन भारत अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो• सदाशिव कुमार द्विवेदी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन डाॅ• अमित कुमार पाण्डेय ने किया।

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