---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 08 अप्रैल 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल में मई महीने में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में क्या तृणमूल कांग्रेस बगैर मुकाबले के चुनाव जीतने का नया रिकार्ड कायम कर सकेगी ? विरोधी दलों की ओर से पंचायत चुनाव के लिए हो रहे नामांकन और नाम वापस लेने की तारीख के बारे में चिंता जताते हुए कहा जा रहा है कि विरोधी दलों को नामांकन दर्ज करने से रोका जा रहा है। इससे यह आशंका प्रकट की जा सकती है कि सत्ताधारी दल ज्यादा से ज्यादा सीटें बगैर किसी मुकाबले के जीत सकता है। हालांकि सत्ताधारी दल का कहना है कि विरोधी दलों की ओर से लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। उन लोगों के पास चुनाव लड़ने वाले लोग ही नहीं हैं।
मालूम हो कि राज्य में बगैर मुकाबले के पंचायत चुनाव जीतने का रुझान कोई नया नहीं है। 1978 में बगैर मुकाबले के जीती जाने वाली सीटों की संख्या 338 थी, यह 1983 में 332 हो गई थी। लेकिन 1988 में बगैर मुकाबले जीती जाने वाली सीटों की संख्या 4200 हो गई। इसके बाद भी यह रुझान जारी रहा और 1993 में 1716, 1998 में 680, 2003 में 6800, 2008 में 2845 सीटें बगैर किसी मुकाबले के एक दल की झोली में गई थी। पांच साल पहले 2013 में 6274 सीटें बगैर किसी मुकाबले के एक दल को हासिल हुई थी।
गौरतलब है कि राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के तहत मतदान होता है। कुल मिलाकर 23 जिला परिषद की 825 सीटें हैं। जबकि 335 पंचायत समिति की 9217 सीटें हैं। इसके साथ ही ग्राम पंचायत 3354 हैं, इसके लिए 48,650 सीटे हैं। राज्य चुनाव आोग के आकड़ों के मुताबिक करीब पांच करोड़ 80 लाख मतदाता 43,067 मतदान केंद्रों के 58,467 मतदान बूथों पर मतदान करेंगे।
राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि बगैर मुकाबले के 1978 में महज 0.73 फीसद सीटों पर फैसला हुआ था, पांच साल बाद इसमें महज 0.1 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन इसके बाद रुझान बढ़ने लगा। आंकड़े बताते हैं कि 1988 में 8.90 फीसद सीटें बगैर मुकाबले के जीती गई थी। हालांकि अभी तक रिकार्ड 2003 में कायम हुआ था, जब 11.00 फीसद (6800) सीटें बगैर मुकाबले के एक दल के पास चली गई थी। पांच साल पहले 2013 में 10.66 फीसद (6274) सीटें बगैर मुकाबले के जीती गई थी। लेकिन 2003 का रिकार्ड नहीं टूटा था। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार बगैर मुकाबले के सीटों का नया रिकार्ड कायम होगा, जो कभी नहीं टूटेगा ? वाममोर्चा ने 1977 में राज्य में सत्ता संभालने के बाद पंचायत व्यवस्था को मजबूत किया था। माकपा के शासन के दौरान हिंसा, लूटपाट, धांधली, बगैर मुकाबले के सीटें जीतने के आरोप के बारे में एक वरिष्ठ माकपा नेता का कहना है कि तब दूसरे दलों का संगठन मजबूत नहीं था। कई जगह वे उम्मीदवार ही खड़ा करने के लिए लोगों को तलाशने में नाकाम रहते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं, विरोधियों को नामांकन भरने से रोका जा रहा है। तृणमूल के शासन में हुगली, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा, वीरभूम, बर्दवान समेत दक्षिण बंगाल में लगभग बगैर मुकाबले के जीत दर्ज की जा रही है।
हालांकि तृणमूल कांग्रेस की ओर से आरोप को निराधार बताते हुए कहा जा रहा है कि विरोधी दलों की ओर से हमारे लोगों से ज्यादा नामांकन भरे गए हैं। इसके बाद भी कांग्रेस और माकपा हमारे दल की छवि को खराब करने के लिए आरोप लगा रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक गुरुवार तक तृणमूल कांग्रेस ने ग्राम पंचायत के लिए 5900, विरोधियों ने 5800 (भाजपा 3900, माकपा 1400, कांग्रेस 500), पंचायत समिति के लिए तृणमूल कांग्रेस 916, विरोधी दल 884 (भाजपा 600, माकपा 230, कांग्रेस 54), जिला परिषद के लिए तृणमूल 29, विपक्ष 74 (भाजपा 40, माकपा 19, कांग्रेस 15) सीटों के लिए नामांकन दाखिल कर चुका था।