---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 04 मई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
देश में तो हाल के दिनों में सत्ता पक्ष के प्रति सभी लोगों के झुकने का रुझान देखा जा रहा है, प्रतिरोध की आवाज पहले के मुकाबले धीमी पड़ती जा रही है। कहावत है कि बंगाल जो आज सोचता है, देश वह 20 साल बाद सोचता है। पश्चिम बंगाल की एक ऐसी पंचायत है, जहां बीते 20 सालों से कोई विरोधी नहीं है। गड़बेता के एक नंबर ब्लाक की तीन नंबर बड़मुड़ा ग्राम पंचायत जिसकी सत्ता होती है, उसकी ही रहती है।
सूत्रों से पता चला है कि पंचायत समिति और जिला परिषद में तो मतदान होता है, लेकिन बड़मुड़ा ग्राम पंचायत की 11 सीटों पर आखरी बार 1998 में मतदान हुआ था। इस बार भी बीते 20 सालों का रुझान जारी है और सभी सीटों पर बगैर किसी मुकाबले के सत्ताधारी दल के उम्मीदवार जीत गए हैं। पंचायत समिति की तीन सीटें भी बिना मुकाबले के सत्तापक्ष की झोली में गई हैं।
पंचायत कानून के मुताबिक विजयी उम्मीदवार जब पंचायत की जिम्मेवारी संभालता है, उसके साथ पराजित उम्मीदवार भी होना चाहिए। जिससे गांव के लोगों को पता चले कि गांव के विकास के लिए सारे लोग एक साथ हैं, नतीजा भले ही कुछ रहा हो। गांव में आम तौर पर इसी तरह होता रहा है। लेकिन इस गांव की कहानी अलग है। गड़बेता एक नंबर ब्लाक के वीडीओ विमल शर्मा का कहना है कि नियम तो है, लेकिन जब कोई विरोधी हो ही नहीं तो क्या किया जा सकता है। मालूम हो कि 1998 में तृणमूल कांग्रेस-भाजपा के गठबंधन ने यहां माकपा को पराजित करके सारी सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2003 में माकपा ने बगैर किसी मुकाबले के जीत हासिल की। तब से विरोधी शून्य उम्मीदवार का सिलसिला यहां जारी है।
हालांकि गांव वालों का मानना है कि सत्ताधारी दल के उम्मीदवार का अपना फायदा होता है। बीते बीस साल के दौरान यहां रास्ते की हालत सुधर गई है, पेज जल की समस्या का समाधान हो गया है और कृषि प्रधान इलाके में बिजली भी पहले के मुकाबले ज्यादा समय तक मिलती है।