प्रकाश पाण्डेय, कोलकाता। समूचे देश में शक्ति यानि दुर्गा उपासना की अपनी एक अहमियत है लेकिन खासकर बंगाल की बात करें तो यहां इस पर्व पर आस्था का सैलाब दिखता है। हर तरफ इस दौरान आस्था और वैभव के साथ असीम उत्साह छाया रहता है। रही बात दुर्गा पूजा के इतिहास की तो इस पूजा का वर्तमान स्वरुप करीब चार सदी पुराना है। कहा जाता है कि 16वीं सदी के आखिर में बंगाल के ताहिरपुर के महाराज कंश नारायण ने पहली बार दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन किया था। राजबाड़ी के आंगन को सजा कर उन्होंने मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की थी। इसके बाद 17वीं सदी के शुरुआत में नदिया के महाराज भवानंद और बरीसा के सुवर्ण चौधुरी ने भी दुर्गा पूजा करना शुरू किया। बाद में इस पूजा परम्परा को यहां के बड़े-बड़े जमींदारों ने अपना लिया। दुर्गा पूजा के अवसर पर बलि की परम्परा आम हो चली थी। यहां के राजा-रजवाड़ों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। खुद के हित के लिए कुछ जमींदारों ने अंग्रेजों की खातिरदारी शुरू कर दी और ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों को पूजा में आमंत्रित करने लगे। कोलकाता के शोभा बाजार यानि सुतानुति के महाराज नबकृष्ण देब ने पहली बार साल 1757 में राबर्ट क्लाइव को पूजा में आमंत्रित किया था। बाद में पूजा प्रतिष्ठा का विषय बन गई और महत्वपूर्ण हस्तियों के सामने आमजन की अवहेलना होने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि बाद में चल कर दुर्गा पूजा राजबाड़ियों और जमींदारों की कोठियों से निकल कर सड़कों और मैदानों में मनाई जाने लगी। सार्वजनिक पूजा की बात करें तो पहली बार 20वीं सदी के शुरुआत में हुगली के गुप्तीपाड़ा में हुई, जिसको 12 ब्राह्मण साथियों ने मिलकर किया था। 1910 में बलरामपुर वसुघाट में एक धार्मिक सभा द्वारा सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा मनाने के बाद इसका चलन बढ़ा। इसे बारोबाड़ी पूजा भी कहा जाने लगा। वहीं आजादी के बाद सार्वजनिक पूजा को राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में परोसा जाने लगा और आहिस्ते-आहिस्ते पूरे बंगाल में सार्वजनिक पूजा होने लगी।
आज दुर्गा पूजा का आयोजन इतना भव्य हो चला है कि इसकी तैयारी में महीनों लग जाते हैं। मूर्ति बनाने का काम भी परम्परागत मूर्तिकारों द्वारा काफी पहले से ही शुरू कर दिया जाता है। बंगाल के हर शहर, कस्बे में ये मूर्तिकार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला यात्रा को जारी रखे हुए हैं। मूर्ति निर्माण का कार्य विधिपूर्वक पूजापाठ के बाद शुरू होता है। कोलकाता में परम्परागत मूर्तिकारों की बस्ती में एक प्राचीन रीति चली आ रही है जिसके मुताबिक मूर्ति निर्माण से पहले सोनागाछी की वैश्याओं के आंगन से मिट्टी लेने की परम्परा है और उनके आंगन की मिट्टी को मिलाकर दुर्गा की पवित्र मूर्ति का निर्माण होता है।
कुमोरटोली कोलकाता के मूर्तिकारों का बसेरा है। घुमावदार संकरी गलियां और गलियों के दोनों तरफ दिलचस्प मन मोहक नजारें, इस गली में सदियों से चली आ रही सदृश्य ईष्ट भक्ति परम्परा अपने जीवंत रूप में नजर आती है और इसे साकार करते हैं यहां के मूर्तिकार। पुआल, काठ और मिट्टी से गढ़ी इन आकृतियों को देखकर मन में एक अलग सा उत्साह भरता है और इच्छा होती है कि इन कलाकारों के लिए कुछ किया जाए। ऐसा नहीं है कि ये कलाकार अभावग्रस्त है। बारहो मास इन लोगों के पास काम होता है। जिस जगह मूर्ति बनाई जाती है वहां चारों ओर मिट्टी, पुआल, सांचे और रंगों के कटोरे फर्श पर पड़े दिखे। पास में कुछ लोग बास की फराटी को काटते नजर आए। इन फराटियों को मूर्ति के पीछे लगाया जाता है क्योंकि बड़ी आकृति की मूर्तियों को सहारे की जरूरत पड़ती है। बरसात से मूर्तियों की सुरक्षा के लिए चारों ओर से तिरपाल का घेरा तैयार किया जाता है क्योंकि इन मूर्तियों पर अगर पानी गिरता है तो मूर्तियों को क्षति हो सकती है।
सुबह से शाम तक का वक्त बीताने के दौरान कुमोरटोली के कई रंग देखने को मिले। भोर उषा की किरणों तले सुखद तो वहीं शाम प्रत्युषा की बिम्बों में नहायी कथई सी नजर आई। उलझी घुमावदार सड़के यहां आने वालों लोगों का स्वागत करती है। शाम होते ही मूर्तिकारों की टोली एक साथ बैठकर बैगनी, मूड़ी और चाय का लुत्फ उठाते हैं और इस दौरान यहां के दृश्य को देख ऐसा जान पड़ता है कि खुशियों की इस जमीन पर भाव की गंगा प्रवाहित हो रही हो। अक्सर फिल्मों में हर शानदार दृश्य के लिए गीत होते हैं और उन गीतों का इस्तेमाल दृश्यों के सौन्दरीकरण के लिए किया जाता है। यहां भी ये लोग आपस में मुस्कुराते हुए शाम के वक्त काम से जरा सी फुर्सत मिलते ही यार दोस्तों के साथ गुफ्तगू कर रहे थे और पीछे एफएम पर बांग्ला के गीत बज रहे थे, गीत के बोल थे- ओ रे नील दरिया...
इन संकीर्ण गलियों से बाहर आते ही आपको गाड़ियों का शोर मानो काटने को दौड़ेगा, लेकिन अंदर धार्मिक उत्सवों के असंख्य रूप और कुम्हारों की कौशल शिल्प की शानदार झांकिया देखने को मिलती है। मेरे सामने मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के अलावा अन्य दूसरे देवताओं और शत्रु राक्षस के धड़ की आकृति रखी थी और वे कुशल हाथों से रंग भरे जाने का इंतजार करते नजर आ रहे थे। बनमाली सरकार लेन के दोनों तरफ मूर्तियों की कार्यशालाएं लगी थी। 300 साल से चली आ रही इस कारीगरी परम्परा में यहां की संस्कृति की झलक के साथ-साथ 18वीं सदी के गुलाम बंगाल की दास्तां की तस्वीर भी देखने को मिलती है। बांग्ला में कुमोर का अर्थ आकार और टोली का अर्थ स्थान होता है यानि आकार स्थल। कुमोरटोली में आज करीब 400 से ज्यादा मूर्तिकार हैं जो देवी दुर्गा की मूर्तियां बनाते हैं। अप्रैल माह की शुरुआत के साथ ही मूर्तियां बननी शुरू हो जाती है। पहले बास की फराटियां काटी जाती है और फिर पुआल की आकृति बंधायी होती है। इसके बाद पवित्र गंगा जल, गोबर, गौमूत्र और थोड़ी सी निषिद्धो पाली से मंगाई गई मिट्टी को एक साथ मिलाकर मिट्टी की गोझाई होती है और शुरू होता है पुआल की बनी आकृतियों पर मिट्टी चढ़ाई। इन मूर्तियों को सम्पूर्ण आकार लेते-लेते 6-7 माह का समय लग जाता है। निषिद्धो पाली वेश्याओं के रहने के स्थान को कहते हैं।
यहां बनी मूर्तियां शहर और देश में ही नहीं बल्कि 90 देशों में भेजी जाती है। बाहर भेजी जाने वाली मूर्तियां ज्यादातर गुमनाम कारीगरों द्वारा बनाई जाती हैं जो तंग घरों में लंबे समय की तपस्या के बाद तैयार होती है। इस इलाके में कुछ प्रसिद्ध दिग्गज कारीगर भी है जिनकी कृतियों को दुर्गोत्सव के दौरान मंडपों में देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। इंद्रजीत पाल मूर्तिकार के साथ-साथ फिल्म मेकर भी है और इन्होंने कई बांग्ला फिल्में भी बनाई है। इंद्रजीत कहते हैं कि वाकई में अगर कुमोरटोली को जानना और समझना है तो आप जनवरी से जून के दौरान यहां की यात्रा करें। मूर्तियों की मनोरम दुनिया की खोज और इसे समझने के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है।
बंगाल में दुर्गोत्सव सबसे बड़ा त्योहार है और अक्टूबर माह में घबराहट और हड़बड़ाहट जैसे हालात होते हैं। यह वक्त मूर्तियों को अंतिम आकार देने का होता है। वहीं उन्होंने बताया कि यहां मूर्ति बनाने वाले ज्यादातर मूर्तिकारों का वास्ता बांग्लादेश से है। कहा जाता है कि ये कलाकार वहीं से आए हैं। यहां आने के बाद पहले ये लोग गोबिन्दपुर गांव में बसे और प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजों ने इनके वंशजों को गोबिन्दपुर से सुतानुति स्थानांतरित कर दिया। तभी से ये लोग यहां मूर्ति बनाने लगे। इन गलियों में शब्दचित्रों का वजूद भी देखने को मिलता है। मूर्तियों के कार्यशालाओं से सटे झुग्गीनुमा घरों में करीबन 200 से ज्यादा परिवार रहते हैं जो मजदूरी कर पेट की आग बुझाते हैं। दैनिक जीवन की तस्वीरें उम्र के हर पड़ाव को सरल ढंग से प्रस्तुत करती है। इस शहर की शिल्पकलाविरासत को यहां की गलियां समझाने के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। गरीबी और समृद्धि दोनों के ही रूप यहां आम हैं। अक्सर विदेशी सैलानी यहां तस्वीर लेने के लिए आते हैं लेकिन वो यहां की मूर्तियों से ज्यादा यहां की गरीबी और कंकालपन की तस्वीरें लेना पसंद करते हैं। इतना ही नहीं हिन्दी सिनेमा में भी इस इलाके के चितेरे दृश्यों को खूब परोसा गया है।
एक माह पहले (7 जून 2017) इस गली की यात्रा का वर्णन सदृश्य शब्दों में करने के बाद फिर से उन मूर्तियों के हाल को जानना था जिनकी आकृतियों पर मिट्टी के लेप और सांचों की छाप उतार दिए गए थे। इस बार जब गया तो पिछली बार की यात्रा के दौरान मित्र बने मूर्तिकार इंद्रजीत पाल से चाय पर चर्चा हुई और चाय की चुसकियों के बीच इंद्रजीत के साथी मूर्तिकारों के काम को निहारता रहा। मूर्तियों की रंगाई जारी थी। स्प्रे मशीन से तेज गति से उजले रंग मूर्तियों पर बारिश की बूंद की तरह पड़े रहे थे। इंद्रजीत ने बताया कि उन्हें दो बार इस रंग से मूर्तियों की रंगाई करनी पड़ती है। इस रंगाई के एक-दो सप्ताह बाद से स्वरुप रंग की चढ़ाई होती है यानि की आकृति रंग शुरू होता है। इंद्रजीत बताते हैं कि बड़े मूर्तिकारों के पास आर्डर ज्यादा होते हैं इसलिए उन्हें तेजी से काम करना पड़ता है। सितंबर के पहले सप्ताह तक हमें 80 प्रतिशत काम कर लेना होता है। पूरे रंग रोदन के आखिर में हम नेत्र बनाते हैं। मूर्ति निर्माण की यह आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण विधि होती है। इसके बाद केवल कपड़े और गहनों की साज बाकी होते हैं जिसके लिए दो-चार दिन काफी होते हैं। कुछ मंडप वाले महलया के दिन तो कुछ इससे पहले ही मूर्ति की प्रतिष्ठा मंडप में कर देते हैं। गलियां काफी संकरी और घुमावदार है इसलिए यहां से मूर्ति निकालना भी आसान नहीं होता है। मूर्तियों को निकालते वक्त भी काफी सावधानियां बरतनी पड़ती है। फिलहाल के लिए इतनी जानकारी काफी थीे और इससे ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं था। अगली मुलाकात की तारीख तय कर वहां से चलता बना और इस गली में घंटों घुमता रहा।
रमते-रमते लोगों से जानकारियों बटोरता रहा। बंगीय पुनर्जागरण से जुड़े कई प्रसिद्ध शख्सियतों के बारे जानने का मौका मिला जो इसी कुमोरटोली से वास्ता रखते थे, जिसमें नंदराम सेन, गोबिंदराम मित्तर, बनमाली सरकार का नाम प्रमुख रहा है। साल 1959 में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहें पंकज राय भी इसी गली से थे और इस गली में स्थित रायबाड़ी उनके वजूद को आज भी अमर रखे हुए हैं।
अंग्रेजी शासन के दौरान इस इलाके को कुमारटोली व कूमटॉली के नाम से जाना गया। पहचान के रूप में यहां के मूर्तिकारों की मूर्तिकला विश्व स्तर पर विख्यात हुई। यहां की मिट्टी में त्योहारों की खुशबू और बांग्ला मिश्रित हिन्दी चिन्तनशीलता का भाव परिलक्षित होता है और हस्तकला कौशल की बानगी देखने को मिलती है। इस इलाके में निर्मित होने वाली पुआल, काठ और मिट्टी की आकृतियों को देख मानो ऐसा प्रतीत होता है कि ये आकृतियां अब बोल देंगी यानि कह सकते हैं कि यहां जीवन मिट्टी के रूप में अलंकृत होती है।
कुमोरटोली के इतिहास का आगाज 1757 के प्लासी युद्ध के परिणाम के बाद का है। इस युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत हुई। बंगाल और भारत में ब्रिटिश औपनिवेशीकरण की जमीन भी इस दौरान तैयार हुई। जीत के बाद सम्पूर्ण बंगाल में अंग्रेजों का बोल बाला था। विरोध की कोई ध्वनि शेष नहीं बची थी। इसी दौरान कंपनी ने आज के मध्य कोलकाता जो उस समय गोबिंदपुर के नाम से जाना जाता था में फोर्ट विलियम बनाने का निर्णय लिया। जिसकी वजह से वहां की आबादी को स्थानांतरित करने के लिए सुुतानुति गांव को चुना गया। इस गांव के अंतर्गत पड़ने वाले जोरासांको और पाथुरियाघाट जैसे इलाकों में अमीर कहे जाने वाले बंगीय राय साहबों और जमींदारों को बसाया गया। वहीं दूसरी ओर कुमारटोली व कूमटॉली भी इस समय की बसाहट बतायी जाती है। आगे चलकर गोविंदपुर, सुतानुति और कालिकता इन तीनों गांवों को एक कर कलकत्ता महानगर की नींव रखी गई।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक जॉन जेपन्याह होलवेल के आदेश पर कंपनी में कार्यरत मजदूरों के लिए अलग-अलग इलाकों में बस्तियां बसाई गई। जैसे सुरीपाड़ा में शराब विक्रेताओं की बस्ती, कोल्हूटोला में तेल पेरने वाले की बस्ती, चुत्तरपाड़ा में बढ़इयों की बस्ती, अहीरीटोला में चरवाहों की बस्ती और कुमारटोली में कुम्हारों की बस्ती। ज्यादातर कारीगरों की आबादी उत्तर कोलकाता में ही बसी, क्योंकि उन्हें 19वीं सदी में बड़ाबाजार से किन्हीं वजहों से बाहर कर दिया गया था और आगे चलकर इस इलाके में मारवाड़ी कारोबारियों का कब्जा हो गया। मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाले कुम्हार कुमोरटोली जो सुतानुति के अंतर्गत पड़ता था के पास इसलिए बसे की उनके घरों के पास गंगा नदी के होने की वजह से उन्हें आसानी से मिट्टी मिल जाया करती थी और वे लोग मिट्टी से देवी-देवताओं की मूर्तियां को गढ़ने का काम करते थे। यहां की एक सड़क नंदराम सेन के नाम पर है, जो ब्लैक डिप्टी के रूप में प्रसिद्ध थे और 1700 में कोलकाता के पहले कलेक्टर बने थे। गोबिंदराम मित्तर का विशाल घर जो लगभग 16 एकड़ में फैला था इसी कुमोरटोली में था। इसके अलावा बनमाली सरकार के नाम से भी यहां सड़क है। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही पहचाने जाते हैं और यहां के लालों ने खुद को विश्वड़ स्तर पर साबित भी किया है। चाहे वो बंगीय पुनर्जागरण से जु़ड़ी शख्सियत हो या फिर यहां के मूर्तिकार। सिटी ऑफ जॉय के नाम से मशहूर इस महानगर का दुर्गोत्सव समूचे विश्वय में प्रसिद्ध है और इसके साथ ही प्रसिद्ध हैं यहां के कलाकार जिनकी कृतियों को देखकर बरबस ही मुंह से निकल जाता है- वाह!
सिनेमा पर चर्चा होते ही जुबान पर सत्यजीत रे होते हैैं। साहित्य और खासकर कविताओं के लिए टैगोर का नाम अनिवार्य है। ठीक उसी प्रकार मूर्तिकला की जब कभी भी चर्चा होती है तो महानगर की कुमोरटोली को दरकिनार कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। क्योंकि ये यहां की विरासत का एक अहम हिस्सा हैं। साधना और कठोर परिश्रम के बाद मां की प्रतिमा तैयार होती है। आंधी-तूफान, बरसात, धूप से बचा कर यहां के कलाकार खुद के तयखानेनुमा घरों में हल्की रौशनीतले दुर्गा की मूर्तियां बनाते हैं।
साथी मूर्तिकार इंद्रजीत की कार्यशाला से कुछ कदम के फासले पर चायना पाल का कुटीनुमा आशियाना देखने को मिला। चायना एक महिला कलाकार हैं और उनकी गढ़ी मूर्तियां बहुत ही मशहूर हैं। यहां कम ही महिलाएं मूर्तियां बनाती हैं। चायना से मुलाकात अपने आप में खास रहा। पहल तो वो एक महिला कलाकार थी इसलिए और फिर उनकी दिल खोल अंतर संवाद का तरीका मुझे बेहद पसंद आया। अति व्यस्तता की घड़ी में भी उन्होंने घंटे भर का वक्त निकाल मुझसे बात की, बातचीत के इस सिलसिले में उन्होंने परिवार और परिवार के सदस्यों की रूचि से जुड़ी व उनके शिल्पकार बनने के सफर को चंद शब्द में ही बयां कर दिया। उनके परिवार में दो भाई और तीन बहने थीं जिनका इस काम में दिल नहीं लगता था। ऐसे में परिवार के इस परम्परा को बचाना कठिन हो गया था और वो इसका खात्मा नहीं चाहती थी। इसलिए उन्होंने शिल्पकारी को चुना और मूर्तियां बनाने लगी। कुमोरटोली की गलियों में पुरूष मूर्तिकारों की संख्या बहुत ज्यादा है और जब चायना महज 16 साल की थी तभी से इस काम में जुट गई थी। चायना कहती है कि पूर्वजों से वरदान स्वरुप मिली इस कला को किसी तरह से जीवित रखना था सो लगी रही। साल 1994 मेरे लिए पीड़ादायक रहा क्योंकि मेरे बापी यानि पिताजी बहुत बीमार रहने लगे थे। बापी के बाद अब परिवार में कोई भी मूर्तिकार नहीं था। पुरुष प्रधान इस पेशे में मेरे लिए पैर जमाना आसान नहीं था। बापी के मौत के बाद हमारे ग्राहक भी छटकने लगे थे और उन्हें मुझ पर भरोसा नहीं था कि मैं बारीकी से काम कर पाऊंगी। इस कला की बारीकियों को सीखने और समझने में मुझे बहुत समय लग गया। लेकिन आज यहां के कलाकारों के बीच चायना दशभूजा के नाम से मशहूर हैं। आज चायना उनके पिता और दादा की तरह ही मूर्तियां बनाती है। मौजूदा समय में 10 कारीगर उनके साथ काम कर रहे हैं और वो सभी कारीगरों का ध्यान रखती है। दशहरा के समापन के बाद वो अपने साथी कलाकारों के साथ घुमने भी जाती है।
महिला को प्रसिद्धी और प्रशंसा यूं ही नहीं मिलती उसे लड़ना पड़ता है समाज और सामाजिक रूढ़ियों से, और चायना के कुछ साहसी कार्यों की वजह से उन्हें कई बार आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। पारम्परिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए उन्होंने एक किन्नरों के समूह के लिए अर्धनारीश्वीर के रूप में दुर्गा की मूर्ती बनाई थी। उनके इस बेबाकपन कार्य की मीडिया में सराहना हुई लेकिन साथी कलाकरों और स्थानीय बाशिंदों ने उन पर परम्परा तोड़ने का आरोप लगाया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हर किसी को दुर्गा की अराधना करने का अधिकार है। ऐसे में किन्नर को क्यूं नहीं, भेदभावपूर्ण वातावरण की वजह से ही हम बिखर रहे हैं जोड़ने की पहल करने वालों को तो आलोचनाओं का सामना करना ही पड़ेगा लेकिन इससे घबड़ाकर भागने से भी काम नहीं चलेगा।
एक बात आम है कि जब कभी भी कुमोरटोली की बात होती है तो मिट्टी से सराबोर, बिना कमीज के, पसीने से लथपथ शख्स की तस्वीर सामने होती है। उस तस्वीर के इर्द-गिर्द महिला नहीं होती लेकिन चायना ने खुद को साबित किया और अपना एक अलग मुकाम बनाया। यह पूछे जाने पर की आपका नाम थोड़ा विचित्र है इसका अर्थ क्या है पर वो हंसते हुए कहीं कि बांग्ला में चायना का मतलब है, नहीं चाहिए। वो अपने मां-बाप की चौथी संतान थी और इसके बाद उनके परिजनों को बेटियां नहीं चाहिए थीं इसलिए उनके मां-बाप ने उनका नाम चायना रख दिया। आज इसी अनचाहे नाम में चायना का वजूद है।
इंद्रजीत के साथ मुलाकात की अगली तारीख तय हो गई थी (22.07.2017) और मैं समय का पाबंद हूं। आसमान अंधकार में तब्दील हो चुका था बादल गरज रहे थे लेकिन मुझे किसी भी हालत में वहां पहुंचना था सो पहुंचा और इस तूफानी बरसात में मुझे देख इंद्रजीत हंस पड़े और उसने मेरे स्वागत किया और कहा चाय खाबेन। छतरी होने के बावजूद थोड़ा भीग गया था और बरसात में कोई चाय के लिए कहे तो ना भी कहे नहीं बनता है। कुछ समय बाद एक साथी मूर्तिकार ने चाय लाया और मिट्टी के भाड़ में चाय दिया। चाय भी पी रहा था और कार्य प्रगती को भी निहार रहा था अब मूर्तियों की रंगाई शुरू हो गई थी यहां तक की कई मूर्तियों के नेत्र भी बनकर तैयार हो गए थे। कुछ देर बात इंद्रजीत से पूछा की मूर्तियों की आंखें तो आखिर में बनने की बात आपने कहीं थी पर उन्होंने कहा कि जिन मूर्तियों को आप देख रहे हैं ये मूर्तियां बाहर जाएंगी। मां दुर्गा के पैर में आलता लगाते एक औरत को देखा तो उठकर उसकी तरह चला गया। सवाल पूछे जाने पर उसने कहा कि हम इन मिट्टी की मूर्तियों मिट्टी नहीं समझते बल्कि ये हमारे घर की बेटी होती है और बेटी की विदाई के दौरान उसकी साज तो होती ही है। सुनकर अच्छा लगा और अब मुझे कुछ खास नहीं जानना था इसलिए प्रणाम पाती कर चलता बना।
शिल्पा भारती और प्रसिद्ध कलाकार स्वर्गीय श्री गोरा चंद पाल
शिल्पा भारती की नींव प्रसिद्ध कलाकार स्वर्गीय श्री गोरा चंद पॉल ने रखी थी। साल 1950 के बाद से भारत में मुख्य रूप से पश्चिकम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मूर्तियां बनाने और मूर्तियों के निर्माण की यात्रा शुरू हुई। कला की उच्च गुणवत्ता और अभिनव कार्यों के बुते बंगालियों ने देश व विदेशों में ख्याति अर्जित की। आज विदेशों में खासकर अमेरिका, इग्लैड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड में यहां की मूर्तियां भेजी जा रही है। ज्यादातर दुर्गा, काली, जगद्धात्री, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, राधा-कृष्ण, गणेश, विश्वरकर्मा के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों, प्रसिद्ध लेखकों आदि जैसे अन्य धार्मिक और गैर-धार्मिक मूर्ति की मांग लगातार बनी रहती है। इस संस्था के निर्माता श्री गोरा चंद पॉल भले ही इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनके द्वारा किए गए बेमिसाल प्रयास कला के स्तर और पारंपरिक कारोबार की गुणवत्ता को स्थापित किया है। उनके पुत्र गौर चंद्र पाल, गोपाल पॉल और परिवार के अन्य सदस्य व साथी मूर्तिकार गोरा चांद पाल से प्रेरित होकर गोरा चंद पॉल एंड संस को स्थापित किया और गोरा चंद पॉल एंड संस से ऑन लाइन मूर्तियों की बुकिंग भी होती है।
कुमोरटोली की रायबाड़ी
मशहूर फुटबालर केष्टो पाल के दामाद और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान पंकज राय के चचेरे भाई राधु राय उम्र के 75 पड़ाव पर हैं और अपने पैतृक निवास कुमोरटोली स्थित 8, अभय मित्रा स्ट्रीट में रहते हैं। कुमोरटोली के बारे में राधु बताते हैं कि कोलकाता की प्रतिष्ठित दुर्गा पूजा के लिए सबसे बड़ी मूर्ति यहां तैयार की जाती हैं।
इस इलाके में स्थित राय-बाड़ी-रायस के घर के रूप में जाना जाता है। राय परिवार और क्रिकेट की बात करे तो यह परिवार कोलकाता का पहला क्रिकेट परिवार था, जिसमें एक से ज्यादा क्रिकेटर हुए। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे पंकज राय जो 1951 से 1960 के बीच 43 टेस्ट मैच खेले, यहां तक की 1959 में लॉर्ड्स के मैदान में पंकज राय ने एक टेस्ट में भारत का नेतृत्व भी किया था। पंकज के भाई अंबर ने 1969 में चार टेस्ट मैच खेले और बेटे प्रणब ने 1982 में दो टेस्ट मैच खेले।
पंकज के अन्य दो भाई निमाई और गोबिंदो प्रथम श्रेणी के क्रिकेट में बंगाल की तरफ से प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि कई अन्य सदस्यों ने क्लब स्तर का क्रिकेट खेला। परिवार में कोई कमी नहीं है लेकिन उनके कुमोरटोली स्थित आवास को माकपा शासनकाल के दौरान हेरीटेज लिस्ट में डाल दिया गया था जिसके खिलाफ परिवार के सदस्यों ने हाईकोर्ट में अपील की और तब जा कर कोर्ट ने हेरीटेज को कटवाया।
परिवार के पूर्वज गंगाराम एक चतुर व्यापारी थे और वे अपनी चतुराई से ढाका के निकट भाग्यकुल के जमींदार बनें। इसी दौरान ब्रिटिशरों द्वारा उन्हें राय उपनाम मिला। तब भाग्यकुल अविभाजित बंगाल का हिस्सा था। बाद में परिवार कोलकाता आ गया। कलकत्ता आने के बाद रायस 8, अभय मित्रा स्ट्रीट स्थित दो मंजिले मकान में रहने लगे। इसी परिवार के बेटे थे पंकज राय जो बंगाल क्रिकेट में एक किंवदंती बन गए।
आज इस राय बाड़ी को देख ऐसा लगता है कि इस ऐतिहासिक इमारत को मरम्मत की जरूरत है। परिवार में पैसे की कोई किल्लत नहीं है लेकिन आपसी खिचतान में राय मेशंन की उम्र ढलती जा रही है और ढल रही है राय परिवार के बेटों की सांसों की लकीरें। राधु बताते हैं कि इस इमारत के कमरों और आंगन में कई यादें बसी है जो बीते कल की यादों को ताजा करती है। राधु के अनुसार 1950 के आसपास कुमोरटोली में मूर्तियां बननी शुरू हुई। हालांकि पहले भी यहां मूर्तियां बनती थी लेकिन उतनी ख्याति नहीं थी। पुराने लोग हमे बताया करते थे कि मां शारदा का भी इन गलियों से वास्ता था उनके परिवार के कुछ लोग इन गलियों में रहा करते थे। रामकृष्ण परमहंस भी यहां अक्सर आते थे।
सुतानुति राजबाड़ी - इतिहास और इतिहास के पन्नों में अंकित पूर्व की भौगोलिक मानचित्र की पड़ताल इसलिए भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है कि उस इतिहास में पूर्व की व्यवस्थाएं और उस दौरान की जीवन शैली की नक्काशी उसी ऐतिहासिक मानचित्र में छुपी होती है। उसके तह तक जाकर बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है और कल की व्यवस्थाओं को जान समझ उसकी मौजूदा व्यवस्थाओं से तुलना कर नवीन तर्क व रेखाएं खींची जा सकती है। इसी कुछ जानने और समझने की कड़ी में यायावर की तरह घुमते-घुमते उत्तर कोलकाता स्थित शोभा बाज़ार राजबाड़ी जा पहुंचा। खैर, विशेष अंतर संवाद के लिए तो कोई नहीं मिला लेकिन राजबाड़ी के आसपास रहने वाले बुजुर्गों से इस राज घराने से जुड़ी कई बातें जानने को मिली। जैसे इस राज घराने की नींव साल 1737 में महज 35 साल की उम्र में राजा नबकृष्ण देब ने रखी। भारतीय इतिहास और साहित्य में रासो परम्परा का जिक्र भी मिलता है इस परम्परा में राजा के दरबारी कवियों व साहित्य प्रेमियों द्वारा उनका गुणगान किया जाता है। भले ही राजा कायर ही क्यों न हो लेकिन उसके दरबारी कवि अपने शब्दों से उसे महान प्रतापी सिद्ध करते रहे हैं। इस सफर में मेरी किसी दरबारी कवि से मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन जिस बुजुर्ग से मिला उन्होंने जिस तरीके से इस राज घराने की प्रशंसा की उससे यह तो साबित हो रहा था कि वो तो नहीं लेकिन उनके पूर्वज जरूर इस घराने से जुड़े होंगे और ये उस जुड़ाव की भावभिव्यक्ति ही था।
बार-बार नाम पूछे जाने पर भी पता नहीं क्यूं वो अपना नाम मुझे नहीं बता रहे थे लेकिन अचानक से एक लड़का जिसकी उम्र शायद 25 साल होगी उसने इन्हें देख, ओ रामू काकू कह संबोधित किया। खैर, दोनों की उम्र में एक बड़ा फासला था फिर भी उस लड़के ने रामू काकू क्यूं कहा समझ में नहीं आया। ये सवाल बेतुका हो सकता है पर मैंने उस बुजुर्ग जिसे लड़के ने रामू काकू कहा था से पूछा तो उन्होंने कहा- सोबाई ऐई नामे आमाके डाके। अब मुझे उनका नाम पता चल गया था। विषय से भटकाव न हो इसको ध्यान में रखते हुए फिर से मैं राजा नबकृष्ण देब और उनके राज घराने पर लौट आया। आगे जिस तरह से उन्होंने राजा नबकृष्ण देब के बारे में बताना शुरू किया उसे सुन तो ऐसा लगा मानो वे खुद ही राजा के साथी मित्र रहें थे। लेकिन आखिर में उन्होंने यह कह कर अपनी बातों को मजबूती दी कि ये बातें उनके पिता और दूसरे लोगों की मुंह से उन्होंने सुना था। राजा नबकृष्ण देब स्वभाव से विनयशील थे और काफी कम समय में उन्होंने ज्यादा संपत्ति अर्जित कर ली थी। बताया जाता है कि सिराज-उद्दौला के अंग्रेजों से हार के पीछे उनकी अहम भूमिका रही थी। राजा नबकृष्ण देब ने अपने जीवनकाल के दौरान दो राजबाडियों का निर्माण करवाया था। आज इस गली का नामकरण राजा नबकृष्ण देब के नाम पर हो गया और लोग 35, राजा नबकृष्णा स्ट्रीट से इस राजबाड़ी को जानने लगे हैं। इस राजबाड़ी को बाग ओला बारी भी कहते हैं। प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से के दोनों खम्भों पर दो शेरों की आकृति बनी हुई है। इसे खुद राजा नबकृष्ण देब ने बनवाया था जिसे बाद में उनके दत्तक पुत्र राजा गोपी मोहन देब ने अपने विरासत में मिला लिया। गोपी मोहन देब राधाकान्ता देब के बेटे थे। बाद में राजा नबकृष्ण देब के यहां पुत्र का जन्म हुआ जिसके लिए राजा ने एक अलग राजबाड़ी बनवाया जो बड़ी राजबाड़ी से चंद कदम के फसले पर स्थित है और उसे छोटे राजबाड़ी के नाम से जाना जाता है। जिसका मौजूदा पता 33, राजा नबकृष्णा स्ट्रीट है। कहा जाता है कि राजा नबकृष्ण देब ने अपने जैविक पुत्र राजकृष्ण और उनके वंशज को छोड़ दिया था।
आज यह राजबाड़ी बंगाल की संस्कृति का केंद्र बन चुका है। राजा नबकृष्ण देब ने पारम्परिक बंगाली संस्कृति को बरकरार रखने और अंग्रेजी संस्कृति के प्रवाह को वेगवान बनाने के लिए अपनी अनुमति दे रखी थी। बंगीय पुनर्जागरण में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। पहली बार भव्य व धूमधाम से दुर्गा पूजा करवाने श्रेय ही राजा नबकृष्ण देब को ही जाता है। लॉर्ड क्लाइव और वॉरेन हेस्टिंग्स जैसे कई प्रसिद्ध अंग्रेज अफसरों को उन्होंने अपने राजबाड़ी दुर्गा पूजा में आमंत्रित किया और वे लोग सहृदय पूजा में शामिल भी हुए थे। इस राजबाड़ी के दुर्गोत्सव में महान साधक रामप्रसाद, ठाकुर रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, सिस्टर निवेदिता, राजा राममोहन राय, देबेन्द्रनाथ टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महानुभाव शिरकत कर चुके हैं।
इस राजबाड़ी के प्रांगण में कई प्रसिद्ध नर्तक जैसे मिस रंघम, नूर बख्श, मलकाजान, गोहर जान जैसी नामचीन हस्तियों ने प्रदर्शन किया है। साल 1897 में जब स्वामी विवेकानंद शिकागो से लौटे थे उस समय यहां के राजा बिनोई कृष्णा देब बहादुर ने उनका नागरिक सम्मान किया था।
बंगाल जो आज सोचता है उसे देश कल स्वीकारता है। बंगाल के नवजागरण को ज्यादातर इतिहासकार इसी तरह से देखते रहे हैं। आधुनिक सोच और सामाजिक रूढ़ियों के खात्मे का इतिहास भी यही से शुरू होता है। सामाजिक सुधार, स्वराज्य और आधुनिक साहित्य की पहली बीच इसी जमीन पर रोपी गई और बाद में इसका प्रचार-प्रसार पूरे देश में हुआ। दुर्गा पूजा की ऐतिहासिकता भी बंगाल से ही जुड़ी है। इस परंपरा की शुरुआत यदि बंगाल से हुआ है तो इसका यहां के नवजागरण से क्या रिश्ता है? ऐसे तो नवजागरण आधुनिक आंदोलन की चेतना रही है, जबकि दुर्गोत्सव इसके उलट परंपरा का हिस्सा है। बंगाल के आधुनिक जीवन में दुर्गोत्सव की परंपरा का चलन दरअसल आधुनिकता में परंपरा का एक बेहतर प्रयोग है।
दुर्गोत्सव को शक्ति उपासना के रूप में देखा जाता है। जैसे महाराष्ट्र के नवजागरण में लोकमान्य तिलक की ओर से प्रतिष्ठित गणेशत्सव का पर्व और 20वीं सदी में प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया की ओर से चित्रकूट में रामायण मेला की स्थापना। तिलक और लोहिया को भारतीय स्वराज्य और समाज का बुलंद स्वर माना गया है। भारतीय आधुनिकता के विकास के ये दोनों प्रवक्ता रहें इसके बावजूद सांस्कृतिक स्तर पर दोनों पारम्परिक भी थे।
बंगाल एक छोर पर बेहद आधुनिक है तो दूसरे छोर पर अत्यंत पारम्परिक अपनी सांस्कृतिक चेतना की विरासत के प्रति सचेत भी और ये सब हमारे जीवन में सामाजिक न्याय की प्रतीक हैं। महिषासुर यदि अन्याय, अत्याचार का प्रतीक है तो दुर्गा शक्ति, न्याय और हर अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार की।
यह आकस्मिक नहीं है कि साल 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अचूक राजनीतिक बुद्धिमत्ता को देखकर अटल बिहारी वायपेयी ने उन्हें दूसरी दुर्गा कहा था। यह दुर्गा कोई सांस्कृतिक मिथ नहीं, बल्कि हर औरत के भीतर अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार का एक धधकता लावा है।