बहराइच, 28 मई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
चिकित्सा शास्त्र के अनुसार कोलोडियन बेबी का जन्म क्रोमोसोम अर्थात शुक्राणुओं में गड़बड़ी की वजह से होता है। इस रोग में बच्चे के पूरे शरीर पर प्लास्टिक सी परत चढ़ जाती है और बच्चा प्लास्टिक जैसी खाल का दिखने लगता है। धीरे-धीरे यह परत फटने लगती है और असहनीय दर्द होता है। यदि संक्रमण बढ़ा तो उसका जीवन बच पाना मुश्किल होता है। कई मामलों में ऐसे बच्चे दस दिन के भीतर प्लास्टिक रूपी आवरण छोड़ देते हैं। इससे ग्रसित दस प्रतिशत बच्चे पूरी तरह से ठीक हो पाते हैं। उनकी चमड़ी सख्त हो जाती है और इसी अवस्था में जीवन जीना पड़ता है। ऐसे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमज़ोर होती है।
गत 24 मई 2018 को सिरसिया जिला सरवस्ती में एक कोलोडियन बेबी का जन्म हुआ। ऐसी स्थिति में बच्चे के अभिभावक को सकारात्मक इलाज का जवाब कहीं नही मिला। वहीं भिंगा, बलरामपुर व बहराइच अस्पताल पर दस्तक देने पर जवाब मिला कि "हमारे बस का नहीं है।" सभी पीजीआई लखनऊ पर जोर देते नजर आए।
कुछ जानकारों की सलाह पर बच्चे को बेहतर इलाज के लिए महेश चिलड्रेन क्लिनिक "एमसीसी" बहराइच लाया गया व इलाज की प्रक्रिया शुरू की गयी।
बेबी को चाइल्ड केयर सेंटर के इंक्यूवेटर मशीन में रखा गया है। डॉक्टर बेबी को सुरक्षित रखने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। बच्ची की चमड़ी बेहद पतली है। रोना चाहती है तो मुंह की चमड़ी फटने लगती है। बच्ची की आंखें और होंठ सुर्ख लाल हैं। पेट्रोलीयम जेली से पूरे शरीर पर लेप लगाया जा रहा हैं। त्वचा बोहोत ही नाजुक है।
कुछ समय उसे मां के आंचल की गर्मी दी जाती है, जबकि बाकी समय उसे मशीन में ही रखा जाता है। बच्ची मुंह से दूध भी नहीं पी रही है। डॉक्टर फूड पाइप के माध्यम से तरल खुराक दे रहे हैं। चमड़ी से संक्रमण खत्म करने के लिए नारियल पानी व एंटी बायोटिक दवाओं का लेप किया जा रहा है। वर्ष 2014 में भी एआईआईएमएस अस्पताल में एक कोलोडियन बेबी का जन्म हुआ था। तमाम कोशिशों के बाद बच्ची तीन दिन बाद दम तोड़ गई थी।
एमसीसी अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ• शिशिर अग्रवाल ने बताया हैं कि कोलोडियन बेबी का जन्म एक असामान्य घटना है। यह जेनेटिक अर्थात अनुवांशिक है। सामान्यतः महिला व पुरुष में 23-23 क्रोमोसोम पाए जाते हैं। यदि दोनों के क्रोमोसोम संक्रमित हों तो पैदा होने वाला बच्चा कोलोडियन हो सकता है।
डा• शिशिर अग्रवाल ने बताया कि आज पाँचवा दिन है बच्चे का हमारे यहाँ। जब वह आया था तो उसकी सांसे रुक रुक कर चल रही थी और अभी बेहतर हुई है। जीवन रक्षण यंत्र 'वेंटिलेटर' पर बच्चे को रखा गया है व उपचार सही दिशा में जारी है। बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।
वहीं डॉ• शिशिर अग्रवाल ने कहा कि दोबारा ऐसा ना हो इसके लिए बच्चे के माता और पिता की जेनेटिक काउन्सलिंग पी• जी• आई॰ में होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि ऐसा दोबारा होने की 25% सम्भावनाएं होती है।
बता दें कि एनआईसीयू का इलाज महँगा है और चुनौती बहुत बड़ी है। वहीं मानवता का एक महान उदाहरण देते हुए डॉक्टर शिशिर इस बच्चे का इलाज नि:शुल्क कर रहे है।