मुखौटे पर पाबंदी, नहीं चलेगी चोर बाजारी



• महानगर में मुखौटाबाज कंपनियों के खिलाफ सख्ती
• आयकर विभाग करीब 20,000 कागजी कंपनियों का कर चुका है भंडाफोड़
• इन कंपनियों पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का है कर बकाया
• कानून में हुए बदलाव के कारण मुखौटा कंपनियों के गठन का कारोबार पतन की ओर
• सी०ए० कर रहे हैं इन फर्मों पर पूर्ण पाबंदी का विरोध

प्रकाश पाण्डेय, विशेष संवाददाता, पश्चिम बंगाल। कोलकाता में मुखौटा कंपनियों की जांच में जुटे आयकर विभाग के कुछ युवा अधिकारियों के लिए पिछले तीन साल बेहद मुश्किल भरे रहे। नियमित काम के अलावा उनका ज्यादातर समय दूरदराज के इलाकों में छापा मारने और वित्तीय लेनदेन की परतें उधेड़ने में बीता। मिसाल के तौर पर एक बार विभाग को एक ऐसे लेनदेन का पता चला, जिससे करीब 200 कंपनियों के तार जुड़े हुए थे। हालांकि इस काम में रोमांच भी खूब था। संदिग्धों पर नजर रखने के लिए सोवियत संघ के जमाने के तौर-तरीके आजमाए गए। एक बार तो चाय बनाने वाले एक व्यक्ति पर भी नजर रखी गई। अधिकारियों को शक था कि वह अपराधियों के इशारे पर काम कर रहा था और उनके संदेश एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाता है। एक बार तो ऐसा भी हुआ कि कई फर्जी कंपनियों का एक ही निदेशक था और वह भी कोलकाता की झुग्गियों में रहने वाला। आयकर विभाग ने मुखौटा कंपनियों की जांच लगभग पूरी कर ली है और ऐसी करीब 20,000 कागजी कंपनियों को खोज निकाला है. इन कंपनियों पर करीब 40,000 करोड़ रुपये का कर बकाया है। पश्चिम बंगाल के अन्य उद्योगों की तरह कोलकाता में मुखौटा या कागजी कंपनी का गठन भी अब लगभग खत्म हो गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोलकाता में 2012-13 में 16,000 नई कंपनियों का पंजीकरण हुआ था, लेकिन 2013-14 में यह संख्या 3,000 से भी कम रही। आंकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि पहले कर चोरी के लिए बड़ी संख्या में मुखौटा कंपनियां बनाई जा रही थीं। इन कंपनियों के काम करने का तरीका भी एकदम अनूठा था। मान लीजिए किसी को काले धन से कमाए एक करोड़ रुपये सफेद बनाने हैं। वह कथित एंट्री ऑपरेटर को एक लाख रुपये देता था। ऑपरेटर उस रकम को 10 रुपये के 10,000 शेयरों में बदल देता था। इन्हीं शेयरों को मुखौटा कंपनियों के निदेशक 1000 रुपये के भाव पर खरीद लेते थे। इससे कंपनी की कीमत एक ही झटके में 1 लाख रुपये के बजाय 1करोड़ रुपये हो जाती थी। कई फर्जी कंपनियों के जाल से होते हुए यह पैसा आखिरकार उसके असली मालिक के पास वापस आ जाता था। इसके लिए एंट्री ऑपरेटर अपनी फीस वसूलता था। अक्सर इन कंपनियों के निदेशक चाय बेचने वाले या चपरासी होते थे।

कोलकाता की चार्टर्ड अकाउंटेंट बिरादरी ने इन कंपनियों पर कार्रवाई का स्वागत तो किया लेकिन वे इन कंपनियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगने से उन्हें परेशानी हो रही है. करीब 40 साल से चार्टर्ड अकाउंटेंट का काम कर रहे वी गोयल कहते हैं कि कंपनी कानून या आयकर कानून में मुखौटा कंपनियों का जिक्र नहीं है। यह नाम राजनेताओं और अधिकारियों ने दिया है। इसका आशय ऐसी कंपनियों से है जो सक्रिय नहीं है या ऐसी बीमार निवेश कंपनी हैं, जो अब कारोबार नहीं करती। अगर वे दिवालिया होती हैं तो यह बहुत लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है।

लेकिन वह यह कुबूल करते हैं कि कोलकाता कभी इस तरह की कागजी कंपनियों का गढ़ हुआ करता था और उनकी संख्या हजारों में थी। लेकिन 2012 में कंपनी कानून में धारा 56 (2) जोड़े जाने के बाद मुखौटा कंपनियां बनाना मुश्किल हो गया था। अब अगर कोई कंपनी महंगे शेयर जारी करती है तो उसे उसकी आय माना जाएगा और इसके लिए उसे कर देना होगा। इसलिए 2012 के बाद कोलकाता में शायद ही कोई नई कागजी कंपनी बनी है। अंग्रेजों के जमाने में कोलकाता देश का प्रमुख वित्तीय केंद्र था लेकिन आजादी के बाद यहां एक के बाद एक कई उद्योग खामोशी के साथ खत्म हो गए। और अब मुखौटा कंपनियों का कारोबार ढहने पर खासा हंगामा हो रहा है।

• मुखौटा कंपनियों की परिभाषा को लेकर विशेषज्ञों में माथापच्ची

मुखौटा कंपनियों की परिभाषा पर भ्रम की स्थिति दूर करने में कानूनी जानकारों एवं कंपनी संचालन से जुड़े विशेषज्ञों को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। दरअसल हाल में ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड ने 331 ऐसी कंपनियों के कारोबार पर प्रतिबंध लगाने का हुक्म दिया था। कई लोगों का कहना है कि सही उद्येश्य और अवैध गतिविधियों के लिए परिचालन में आईं मुखौटा कंपनियों में पहचान किया जाना आवश्यक है। कानूनी विशेषज्ञों की एक राय यह भी है कि इन प्रतिबंधित 331 कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू होने से पहले इन्हें उनका पक्ष रखने का एक मौका अवश्य दिया जाना चाहिए। जानकारों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर मुखौटा कंपनियों का इस्तेमाल वैध माना जाता है और इन्हें किसी तरह की कर चोरी या नियामकीय प्रावधान के खिलाफ नहीं माना जाता है। फिनसेक लॉ एडवाइजर्स के संस्थापक संदीप पारेख कहते हैं, 'भारत में मुखौटा कंपिनयों का विधिवत जिक्र नहीं है और न ही न्यायिक पैमाने पर इनके लिए कोई प्रावधान है।' प्रॉक्सी एडवाइजरी कंपनी इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर एडवाइजरी सर्विसेस की मुख्य परिचालन अधिकारी हेतल कहती हैं कि केवल मुखौटा कंपनी रखना किसी अवैध गतिविधि का परिचायक नहीं है। उनका मानना है कि पूंजी बाजार नियामक को वाजिब और मनी लॉन्डरिंग (धन शोधन) या अन्य अवैध गतिविधियों के उद्देश्य से खड़ी की गईं मुखौटा कंपनियों में विभेद के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। हालांकि जानकारों का कहना है कि समस्या लेन-देन पर आंकड़े जुटाने और वाजिब एवं गैर-वाजिब लेनदेन में अंतर पता करने की है। इनगवर्न रिसर्च के साथ जुड़ी सौम्या दास कहती हैं कि किसी कंपनी और शेल कंपनियों में अंतर के लिए सेबी या कंपनी मामलों के मंत्रालय दो में किसी एक को एक अधिसूचना लानी चाहिए। वह कहती हैं कि प्रभावित कंपनियों को एक्सचेंज से बातचीत की अनुमति दी जानी चाहिए और उन्हें यह बताने का मौका मिलना चाहिए कि उन्हें क्यों मुखौटा कंपनी के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जाना चाहिए।

परिचालन मानदंडों जैसे एकल राजस्व, परिसंपत्ति, कर्मचारी क्षमता और अन्य परिचालन मानकों के आधार पर मुखौटा कंपनियों की परिभाषा तय किए जाने का नियम तय होना चाहिए। दलाल कहती हैं, 'आसानी से समझ में आने वाले परिचालन मानदंडों के आधार पर नियामक ऐसी कंपनियों की परिभाषा आसानी से तय कर सकते हैं।' कानून के जानकारों का कहना है कि कंपनी पंजीयक (आरओसी) के स्तर पर एक वाजिब और फर्जीवाड़े में लिप्त मुखौटा कंपनियों की पहचान करना मुश्किल है। कंपनी कानून 2013 के तहत आरओसी को दो परिस्थितियों में कंपनियों का नाम हटाने का अधिकार है। पहली स्थिति तब पैदा होती है जब पंजीयन होने के एक साल के भीतर कंपनी कारोबार शुरू नहीं कर पाती है और दूसरी स्थिति तब खड़ी होती है जब कोई सक्रिय कंपनी लगातार दो वित्त वर्षों तक कारोबार नहीं करती है। कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स के प्रबंध निदेशक पवन कुमार विजय कहते हैं, 'कानून में गैर-कार्यशील कंपनियों की वैध कारोबारी आवश्यकताएं समझने का प्रावधान दिया गया है और कंपनी कानून, 2013 में निष्क्रिय कंपनियों की की संकल्पना का उल्लेख है।' कुछ जानकारों का मानना है कि इस मामले में पूंजी बाजार नियामक की स्थिति कानून तौर पर कमजोर हो सकती है। कोछड़ ऐंड कंपनी के कॉर्पोरेट पार्टनर चंद्रशेखर थांपी का कहना है कि सेबी का कदम सेबी अधिनियम, 1992 की धारा 11 (4) के खिलाफ हो सकता है। प्रावधान के अनुसार, 'निदेशकमंडल ऐसे आदेश पारित करने से पहले या बाद में ऐसी इकाइयों को उनका पक्ष रखने का अवसर देगा।' कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण इस आधार पर सेबी का आदेश खारिज कर सकता है। कुछ विशेषज्ञ उस कानूनी आधार पर भी सवाल उठा रहे हैं, जिनके आधार पर सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों को संदिग्ध मुखौटा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

वहीं सरकार ने संदिग्ध मुखौटा कंपनियों के खिलाफ अभियान छेड़ने के बाद अब सीमित दायित्व वाली साझेदारी कंपनियों की बढ़ती तादाद पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। पिछले दो-तीन सालों के दौरान एलएलपी कंपनियों की तादाद में काफी तेजी आई है ऐसे में नए कंपनी कानून के तहत अनुपालन जरूरतों के जरिये इन पर नियंत्रण बनाने की कोशिश की जा रही है। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जून 2017 तक 94,304 सक्रिय एलएलपी थी। कॉरपोरेट वकीलों के मुताबिक हर महीने औसतन 2,500 से3,000 एलएलपी पंजीकृत होते हैं। नांगिया ऐंड कंपनी के पार्टनर विकास गुप्ता कहते हैं, 'कंपनी रजिस्ट्रार अपनी पंजी से निष्क्रिय और पुराने एलएलपी को हटा रहे हैं।'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए अपने भाषण में कहा था कि सरकार ने तीन लाख से अधिक मुखौटा कंपनियों की पहचान की है और ऐसी करीब 175,000 कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है। सरकार ने मुखौटा कंपनियों के जरिये काला धन को वैध बनाने के खिलाफ अभियान छेड़ा है। सरकार का ध्यान इस पर तब गया जब पिछले एक साल में एलएलपी की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हुई और इस साल मार्च में यह संख्या 3,518 के स्तर पर पहुंच गई। इस साल अप्रैल से जून तक एलएलपी कंपनियों के गठन में कोई कमी नहीं देखी गई और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के मुताबिक तीन महीने में ऐसी 8,019 कंपनियों का पंजीकरण हुआ। कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले साल नवंबर में ज्यादा मूल्य वाले नोटों की नोटबंदी से एलएलपी को प्रोत्साहन मिला है। अप्रैल-जून अवधि में इन एलएलपी के कारोबार के एक विश्लेषण के मुताबिक इनमें से ज्यादातर कारोबारी सेवाएं (46 फीसदी), विनिर्माण और व्यापार (प्रत्येक 12 फीसदी), समुदाय, निजी और सामाजिक (9फीसदी), निर्माण (8 फीसदी), रियल एस्टेट और किराया देने (6फीसदी) आदि सेवाओं से जुड़ी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कारोबारों और दूसरी सेवाओं में एलएलपी के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है।

अप्रैल 2014 में कंपनी कानून, 2013 के प्रभावी होने के साथ ही मौजूदा कंपनियों को एलएलपी में बदलने और नई एलएलपी कंपनियों के गठन का रुझान बढ़ा है। इस साल जून तक करीब 6,000 कंपनियां एलएलपी कंपनी में तब्दील हुई हैं। कुछ कंपनियों के एलएलपी में बदलाव के लिए किसी सरकारी मंजूरी की जररूरत नहीं होती है। न्यूनतम अनुपालन और नियाकीय जरूरतों की वजह से कारोबार मालिकों का एलएलपी के प्रति आकर्षण बढ़ा है। सालाना आधार पर एलएलपी को सालाना रिटर्न दाखिल करने के साथ ही अकाउंट और ऋण चुकाने की क्षमता का विवरण देना होता है। बाकी सारी फाइलिंग एलएलपी के साझेदारों में बदलाव, सेवानिवृति, इस्तीफा, पते आदि में बदलाव की स्थिति में होता है। पिछले दो सालों में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने एलएलपी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के लिए नियमों को उदार बनाने के साथ ही विदेशी साझेदारों की नियुक्ति की अनुमति भी दी है जिसकी वजह से इसके लिए आकर्षण बढ़ा है। हाल ही में आरबीआई के संशोधन की वजह से एलएलपी के लिए बाह्य व्यावसायिक उधारियां की अनुमति भी मिली है जिनमें मसाला बॉन्ड भी शामिल है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में एलएलपी को एफडीआई का एक बड़ा हिस्सा मिलने की उम्मीद है। सीमित दायित्व वाली साझेदारी कानून, 2008 की धारा 75 और नियमों के मुताबिक अगर एलएलपी दो सालों तक या इससे अधिक समय तक कोई कारोबार या पेशे की शुरुआत नहीं करते हैं तो कंपनी रजिस्ट्रार स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई कर सकता है।

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