पॉलिटिक्स... राजनीति.... सेवानीति.... या व्यवसायनीति



पॉलिटिक्स एक अँग्रेजी शब्द है जो हिन्दी शब्दकोष में नीतिकुशल रूप में दर्ज़ है, हम लोग इसे राजनीति ही कहते हैं। हालाकि मुझे राजनीति शब्द पसंद नहीं, तर्क है कि हम राजशाही के अधीन अब नहीं हैं। सन्धि-विच्छेद राजनीति का राज धन नीति होता है अर्थात राज करने की नीति जो प्रजातन्त्र में सटीक नहीं बैठता। यदि कलकत्ता कोलकाता हो सकता है, मद्रास चेन्नई, बंगलोर बंगलुरु तो फिर राजनीति सेवानीति क्यों नहीं की जा सकती। क्या वक़्त सही नहीं है कि राजनीति शब्द को पूर्ण रूप से भंग कर दिया जाये व इसे नये नाम से पुकारा जाये जो इसके चरित्र में निखार ला दे व हम सभी के बीच यह एक अच्छे रूप में स्वीकार किया जाये जो चरित्रवान हो, भाई राजशाही कब की समाप्त हो गयी है इसका एहसास पूर्ण रूप से हो जाये।

राजनीति पेशा में रुचि रखने वाले लोग अपने आप को सेवक कहने का दम भरते हैं परन्तु गहराई में झांक कर देखा जाये तो उत्तर कुछ और ही निकलता है यह हम में से अधिकांश जानते हैं फिए भी...! कुछ एक को छोड़ दिया जाये तो सेवानीति तो मानो विलिप्त है। राजनीति से कोसो दूर रहने वाले कहते हैं कि आज राजनीति ने व्यवसायनीति का विकराल रूप धरण कर लिया है, यदि आप चोरी-चमारी में विश्वास करते हैं, ढोंग करने में महारथ हासिल है, ऐड़ा बन कर पेड़ा खाना चाहते हैं तो राजनीति आप को सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

चुनाव के वक़्त में अपने-अपने किस्मत आजमाने उतरे नये-पुराने नेता घर-घर जाते हैं व अपने पक्ष में मतदान पाने के लिए लोगों के समक्ष अपने हाथ पसारते हैं, मंत्रीगण भी इस सूची हैं। आँखों देखा हाल बया कर रहा हूँ, इन में अधिक मात्रा में वही नेता व मंत्री हैं जिनके घर के बाहर रोजाना लोगों का ताता लगा रहता था उनसे मिलने के लिए घण्टों खड़ा रहने के पश्चात निराशा के साथ वापस चले जाते थे और वही दर-दलाली करने वाले चापलूस जब चाहे तब मिलते व हँसते बाहर निकलते बाँह भाजते शान से चले जाते। जन-सम्पर्क चुनाव के वक़्त तो नज़र आता है परन्तु जीतने के बाद नेताओं से सम्पर्क का भरोसा ईद के चाँद समान हो जाता है। हालाकि यह भी स्पष्ट है कि सभी नेता राजनीति नहीं करते, बहुत सारे सेवनीति के चरित्र को अपनाते हुए कार्य करते हैं व लोगों का उनके प्रति विशेष पहचान और सम्मान होता है। वे सही मायने में जन सेवक होते हैं व सच्चे आस्था के साथ सदा तत्पर दिखते हैं। राजनीति को गिरगिट की तरह भी देखा जाने लगा है क्योंकि वह समय समय पर अपना रंग बदलती रहती है। कुछ गिने चुने नेताओं द्वारा किये गये कार्यों से समय समय पर भरपूर प्रमाण मिलता ही रेहता है क्योंकि पहले के मुक़ाबले हम ज्यादा तत्पर हुए हैं। हालाकि सवाल अभी भी वही का वही है कि हम समझ नहीं पा रहे है कि इसे किस रूप में स्वीकारा जाये। आखिरकार यह है क्या... पॉलिटिक्स... राजनीति... सेवानीति... या व्यवसायनीति...?

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