प्राइवेट बसों में वेतन व्यवस्था को लेकर उठने लगे हैं सवाल



---रंजीत लुधियानवी, हावड़ा, 15 जुलाई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

हावड़ा जिले के दक्षिणी हिस्से में जीटी रोड पर बकुलतला से इंडियन आयल का तीन किलोमीटर का रास्ता तय करने के लिए कभी-कभार किसी प्राइवेट बस को 55 मिनट का समय लगता है तो किसी समय यह रास्ता महज तीन से चार मिनट में तय हो जाता है। शनिवार की सुबह मिलने पहुंचे एक पत्रकार मित्र ने बताया कि तीन किलोमीटर पैदल चलकर आते तो शायद इतने समय में पहुंच जाते जितना समय 61 नंबर रूट की बस से आने में लगा है।

हावड़ा के लोगों के लिए जाम तो जैसे एक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। आलमपुर से आंदुल तक भी महज तीन किलोमीटर का ही रास्ता है। लेकिन 61 नंबर रूट की बस को वहां पहुंचने में 30 मिनट से लेकर 50 मिनट तक लग जाते हैं। जबकि हावड़ा से जाने वाली बस आंदुल से आलमपुर तक तीन-चार मिनट में ही पहुंच जाती है। यह हालत सिर्फ प्राइवेट बस की हो ऐसा नहीं है। तेज रफ्तार से चलने के लिए चालू की गई मिनी बस, जिसका किराया प्राइवेट बस से सदैव एक रुपए ज्यादा रखा जाता है वह भी चींटी की रफ्तार से चलती है। आलमपुर से चलने वाली मिनी बस की हालत भी ऐसी ही है।

कभी तीन मिनट तो उसी रास्ते पर कभी 50 मिनट में बस के चलने के कारण हावड़ा ही नहीं राज्य भर में प्रतिदिन हादसे होते रहते हैं। एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब कहीं कोई हादसा नहीं हुआ हो। प्राइवेट बसें पहले तो चलती नहीं हैं और जब रफ्तार पकड़ती हैं तो किसी को देखती नहीं है। बीते कुछ सालों के दौरान चलाई गई सफेद रंग की बसों की हालत भी ऐसी ही है। मौड़ीग्राम से चलने वाले 7 नंबर रूट की बस मौड़ीग्राम से विद्यासागर सेतु तक पहुंचने में ही एक घंटा से ज्यादा का समय लगा देती है। हालांकि रास्ता मुश्किल से चार -पांच किलोमीटर से कुछ ही ज्यादा होगा।

हावड़ा में तो कहावत मशहूर है कि बसें चीटीं की गति से रेंगती हैं, फिर कछुए की तरह जहां मर्जी रूक जाती हैं। कभी कंडक्टर चाय, कभी बीड़ी-सिगरेट पीने और ड्राइवर को पिलाने का पुण्य कार्य करता है तो कभी बस में 5-10 पानी की बोतलें भरता रहता है। यह सारा कुछ समय बिताने के लिए नहीं कारोबार के सिलसिले में ज्यादा मुनाफा हासिल करने क लिए किया जाता है। लोगों को भले ही लगे कि ड्राइवर-कंडक्टर समय बर्बाद कर रहे हैं, ड्राइवर की नजर शीशे पर लगी होती है। जैसे ही पीछे से किसी दूसरे बस के आने की ­झलक मिली नहीं कि बैल गाड़ी की तरह चलने वाली बस हवाई जहाज से ज्यादा रफ्तार पकड़ लेती है। अब बस की चपेट में आने वाली की किस्तम की उसकी जान जाए, हाथ पैर टूटे या सुरक्षित बच जाए।

तकरीबन 25 साल पहले तत्कालीन परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती से जब उनके घर में विशेष बातचीत चल रही थी, उन्हें समस्या के बारे में बताया था। उनका कहना था कि सारी समस्या की जड़ कमिशन है। जब तक कमिशन बंद नहीं हो जाता, तब तक ऐसे ही चलता रहेगा। उन्होंने कहा था कि कमिशन व्यवस्था बंद करके वेतन व्यवस्था चालू की जाएगी। इसके बाद प्राइवेट बस सेवा में सुधार आ जाएगा। सात साल पहले राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भी ऐसी ही बाते सुनने को मिली थी। अब तय किया गया है कि वेतन व्यवस्था चालू की जा रही है। हालांकि पहले एक जुलाई, बाद में 15 जुलाई और फिर 1 अगस्त से यह व्यवस्था चालू करने का एलान किया गया है।

फिलहाल बस चलाने वाले ड्राइवर, कंडक्टर जब तक काम करते हैं, उन्हें कमिशन मिलता है। ड्यूटी अगर नहीं है तो कुछ नहीं मिलता। कुछ दिन की छुट्टी होने पर साथियों से 10-20 रुपए मांग कर गुजारा करना पड़ता है। हालांकि कमिशन आकर्षक है, टिकटों की कुल बिक्री का 24 फीसदी कंडक्टर-ड्राइवर को मिलता है। सामान के पैसों से लेकर बगैर टिकट कम पैसे लेने की ऊपरी कमाई अलग है। जबकि खलासी को एक फीसद मिलता है। दो दरवाजे वाली बस में ड्राइवर को 12, कंडक्टरों को 6-6 फीसदी, एक दरवाजे वाली बस में ड्राइवर को 14 और कंडक्टर को 9 फीसदी कमिशन, खलासी को 200-250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हैं।

ज्वायंट काउंसिल आफ बस सिंडीकेट के नेता तपन बनर्जी का कहना है कि बस का किराया राज्य सरकार तय करती है, बस में कब कौन ड्राइवर और और कंडक्टर होगा यह यूनियन तय करती है। बस मालिक को मालूम ही नहीं होता कि आज बस में कौन कंडक्टर होगा और कौन ड्राइवर, जबकि हमें वेतन देने के लिए कहा जा रहा है। बनर्जी नहीं मानते है कि कमिशन के कारण ही दुर्घटनाएं होती हैं। उनका कहना है कि राज्य के पांच जिलों में कमिशन व्यवस्था नहीं है, लेकिन वहां भी हादसे होते हैं। कई बस मालिकों का कहना है कि सरकारी बसों में वेतन व्यवस्था होने के बावजूद भी एक्सीडेंट होते हैं।

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