ढाकियों से पटे सियालदह व हावड़ा स्टेशन



कोलकाता। ढाक की थाप के बिना दुर्गापूजा का जश्न अधूरा सा महसूस होता है। ढाक एक तरह का ढोल है, जो दुर्गापूजा का अभिन्न अंग है। आदिशक्ति की आरती के समय इसे बजाने का खास महत्व है। इसकी ध्वनि ढोल-नगाड़े जैसी होती है। वैसे दुर्गापूजा बड़े वर्ग के लिए आस्था का विषय हो सकता है लेकिन कुछ लोगों के लिए यह त्योहार सीधे तौर पर रोटी से जुड़ा हुआ है। पूजा पंडालों में ढाक बजाने वाले ढाकी इसी वर्ग से हैं जिन्हें साल भर दुर्गा पूजा का बेसब्री से इंतजार रहता है। अब जबकि त्योहार की शुरुआत हो चुकी है, महानगर के प्रवेश द्वार सियालदह व हावड़ा स्टेशन पर जिलों से आए सैकड़ों ढाकियों का जमावड़ा लग गया है।

रंग-बिरंगा पहनावे में ये सभी ढाक पर ताल ठोक रहे हैं तो लोगों के पांव भी बरबस थिरकने लग रहे हैं। दरअसल बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान ढाक के साथ धुनी रमाने की पुरानी परंपरा रही है। 

बाकुंड़ा से आए जयंत पाल ने बताया कि जब हम कोलकाता आते हैं तो पूरा परिवार हमारे लौटने का इंतजार करता है। दुर्गापूजा के दौरान समूह में प्रति व्यक्ति चार से पांच हजार रुपये तक कमा लेता है। मालूम हो कि ढाकियों के समूह में कम से कम तीन या चार सदस्य होते हैं जिनमें से एक थाल बजाता है जबकि दो या तीन अन्य ढाक बजाते हैं। 32 वर्षीय संजय दास बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने ढाक बजाना शुरू किया था। यह उनकी आजीविका बन गई और लंबे समय तक बनी रही, लेकिन अब इसमें भविष्य नहीं दिख रहा इसलिए वे इसे पूजा के दौरान ही बजाते हैं। बाकी के महीनों में अन्य काम किया करते हैं।

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