वाराणसी, 24 अगस्त 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पोलेंड से भारत में, पूर्व राजदूत टोमाज़ लूकासुजुक ने भारत और चीन के संबंधों पर मध्य यूरोपिय देशों के परिपेक्ष्य में व्याख्यान दिया। साथ ही उन्होंने चीन की वन वेल्ट वन रोड नीति को विस्तार से व्याख्याित करते हुए इसे द्वतिय विश्वयुद्ध के बाद का नया मार्शल प्लान करार दिया। उन्हेंनें हिंद महासागर में निर्वाध व्यापार और रणनीतिक विस्तार को चीन और भारत के संदर्भ में आंकड़ों के साथ संदर्भित किया। टोमाज़ लूकासुजुक आज मालवीय शांति अंनुसंधान केंद्र द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के मुख्य अतिथि के रूप में उपरोक्त बाते कह रहे थे जिसे यूनेस्को चेयर द्वारा आयोजित किया गया था।
भारत के रणनीतिक एवं शांति चिंतन परंपरा की ही तरह चीन के पास भी एक शांति चिंतन की बौद्धिक एवं वैचारिक विशाल परंपरा रही है। सौहार्द एवं स्थिरता पर आधारित चीनी शांति विमर्श का ही एक व्यापक प्रकटीकरण वन बेल्ट वन रोड की नीति में हुआ है। नई सहस्त्राब्दि के आरंभ के साथ ही चीन ने अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को जमीनी स्तर पर रूपांतरित करने हेतु अपने बौद्धिक विरासत का पुनःअविष्कार किया एवं कन्फयुशियस लाओत्से एवं शून जू जैसे रणनीतिक चिंतकों को विदेश नीति व्यवहार में समग्रता से प्रयोग करने लगे। हमें चीन के उपर अकादमिक एवं रणनीतिक अध्ययन एवं शोध की गुणात्मक एवं परिमाणत्मक रूप से तत्काल बृहत संख्या में जरूरत है जिसपर हमारे नीति निर्माताओं को तत्काल प्रभाव से ध्यान देना चाहिए।
उपरोक्त चिंताओं को आज दिल्ली विश्वविद्यालय से विशिष्ठ वक्ता एवं चीन अध्ययन की ख्याति प्राप्त विदूषि डा• रित्यूषा मणि तिवारी अभिव्यक्ति दे रही थीं जिनका विशिष्ठ व्याख्यान यूनेस्को चेयर एवं मालवीय शांति अनुसंधान केंद्र के तत्वाधान में समाज विज्ञान संकाय के संबोधि सभागार में आयोजित किया गया। उन्होंने एक दिवसीय कार्यशाला के प्रातःकालीन सत्र में चर्चा का प्रारंभ विदेशनीति के आंतरिक जड़ों की देशज तलाश करने की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए किया। डा• रित्युषा तिवारी का मानना था कि हमें ज्यादा विस्तार समग्रता एवं गहराई में चीन को समझने एवं उनकी वैध सुरक्षा एवं आर्थिक चिंताओं को समझने की जरूरत है तभी हम उसके प्रभावों की रणनीतिक काट ढूंढ पाएंगे। उन्होंने एक स्वतः सक्रिय एवं स्वयं संचालित परिणामदायी कार्यशील चीन नीति बनाने की जरूरत को रेखांकित किया एवं जोर देकर कहा कि दोनों देशों को सभ्यतागत मूल्यों में ऐसी समानताएं हैं जिनको आधार मानकर स्थिरता एवं सौहार्दमय वातावरण सीमाओं पर सृजित किया जा सकता है। उनका मानना था कि हमें सीमाओं की ही तरह संस्कृति का भी परिमाणीकरण करना चाहिए और इसके वैचारिक अवदानों को विदेश नीति व्यवहार में शामिल किया जाना चाहिए।
आगत अतिथि का स्वागत एवं विषय प्रवेश केंद्र समन्वयक एवं यूनेस्को चेयर प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम का संचालन डा• मनोज कुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र, छात्राएं, शोधकर्ता एवं अध्यापक प्रमुख रूप से मौजूद थे। प्रो• अजय प्रताप सिंह, विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग, प्रो• केशव मिश्र, प्रो• बिंदा परांजपे, डा• सुनीता सिंह, डा• अजय कुमार यादव, डा• प्रशांत कुमार इत्यादि ने परिचर्चा में छात्र-छात्राओं के साथ व्यापक रूप से भाग लिया। इस अवसर पर संयुक्त कुलसचिव मयंक एन सिंह ने स्मृति चिन्ह भेंट कर पूर्व राजदूत को सम्मानित किया।