वाराणसी, 23 अक्टूबर 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
भोजपुरी अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा कार्यक्रम श्रृंखला ‘जनपद और संगीत’ के अंतर्गत ‘लोक विरासत और सांस्कृतिक पहचान’ विषय पर एक संवाद का सत्र आयोजित किया गया। इस विषय पर विश्वविद्यालय के छात्रों से संवाद के लिए भोजपुरी, असमिया, बांग्ला के साथ अनेक भाषाओं में गीतों को अपनी आवाज़ देने वाली सुप्रसिद्ध लोक गायिका कल्पना पटवारी मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो• प्रदीप कुमार मिश्रा, आई•आई•टी• बीएचयू ने की। इस अवसर पर केंद्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल द्वारा मुख्य अतिथि कल्पना को अंग वस्त्रम के रूप में भोजपुरी अध्ययन केंद्र का ‘गमछा’ भेंट कर सम्मानित किया।
अपनी बात शुरू करते हुए कल्पना ने कहा कि मैं अपने आप को सिर्फ गायिका के रूप में नहीं देखती हूँ। मैं अपनी मातृभाषा के लिए नहीं बल्कि किसी और के मातृभाषा के रूप में देखती हूँ। आसाम में अनेक भाषा अनेक ट्राइब खत्म होती जा रही है। मेरी यात्रा भूपेन हजारिका से शुरू होती है और भिखारी ठाकुर में समाहित होती है। अनेकता में एकता को इसी तरह समझाया जा सकता है। म्यूजिक को अध्ययन की तरह नहीं देखा गया। लोक धुनों के साथ ही लोक की वह संवेदना धीरे धीरे खत्म हो रही है। उसके प्रति हमें जागरूक होना पड़ेगा। भोजपुरी को लेकर कोई भी आंदोलन फेसबुक पर दो शब्द लिख देने से पूरा नहीं होगा।
इस अवसर पर भिखारी ठाकुर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर को मैं तीन रूप में देखती हूँ। एक गीत के रूप में, एक नाटककार के रूप में और एक लोक कलाकार के रूप में देखती हूँ। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य में स्त्री बहुत लिबरल होकर अपनी बात कह सकती है लेकिन शास्त्र में यह आज़ादी नहीं है। वहां पुरुष वर्ग का कब्ज़ा है। इस बात पर चिंता व्यक्त की कि 'लागल जोबना में चोट' को वह साहित्य के लिए कहेंगे कि 'लागल करेजवा में चोट', जबकि जोबना व करेजवा में बहुत अंतर है। इस अवसर पर पूर्वी, विरहा, प्रसव गीत के साथ उन्होंने अन्य कई गीत प्रस्तुत किये और कहा कि भोजपुरी में योजना बद्ध आन्दोलनकी जरूरत है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो• पी• के• मिश्रा ने कहा कि भोजपुरी गर्व करने की भाषा है। उसके गीतों व साहित्य में जीवन की विपुलता है। उसे उद्यम की भाषा बनाने पर जोर किया जाना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर बीएचयू के वित्त अधिकारी श्याम बाबू पटेल ने कहा कि भोजपुरी भाषा व जनपद में विविधता है।इसमें जीवन का सरल प्रवाह मिलता है।
स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि भोजपुरी संस्कृति में लाठी के बाद गमछा का बहुत बड़ा महत्व है। किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वह अपनी विरासत को कितना संभाल पा रहा है। उन्होंने कहा कि कल्पनाजी ने रसिक श्रोता के साथ सहृदस्य श्रोताओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया है।
इस कार्यक्रम का संचालन रुद्रप्रताप सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो• चम्पा कुमारी सिंह ने दिया। विश्वविद्यालय का कुलगीत सौम्या वर्मा, अमित और मनोहर ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर प्रो• शैलेन्द्र कुमार शर्मा, देवरिया के सिद्धार्थ मणि त्रिपाठी, मुम्बई से परवेज के साथ ही केंद्र के छात्र, छात्राओं के साथ ही विश्वविद्यालय के अनेक विभागों के छात्रों की उपस्थिति बनी रही।