होलिका उत्सव



प्राचीनकाल से रंगों का त्योहार “होली” भारतवर्ष का मुख्य पर्व रहा है। होली पूर्व होलिका दहन होली के इतिहास को उजागर करता है। होलिका दहन का आयोजन पहले कुछ विशेष जगहों पर हुआ करता था परन्तु आजकल अधिकांश गली मोहल्लों में इसका प्रचलन शुरू हो गया है। कुछ विशेष जगहों पर आयोजन होने के कारण भीड़ भी ज्यादा हुआ करता था परन्तु अधिकांश गली मोहल्लों में इसके आयोजन प्रचलन से भीड़ की मात्र घट कर सीमित हो गयी है।
मध्य हावड़ा स्थित गोपाल चन्द मुखर्जी लेन में आयोजित होलिका दहन का इतिहास लगभग 150 साल पुराना हैं। हो सकता है हावड़ा के इतिहास में यह एक स्थान रखता हो। इस होलिका दहन के आयोजन में रामेश्वर मालिया लेन, जी टी रोड, बोन बिहारी बोस रोड, नेताजी सुभाष रोड, चिंतामणि दे रोड व घोष पाड़ा के निवासी सम्मिलित होते हैं। हावड़ा जन कल्याण मंच (सामाजिक संस्था) द्वारा आयोजित इस होलिका दहन में लगभग 1500 लोगों की आस्था सहित उपस्थिति होती है। संस्था के अध्यक्ष अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि इस प्रथा का शुभारंभ टेकड़ीवाल परिवार ने किया था व आज भी सबसे पहले पूजा उन्ही का परिवार करता है, पूजा हनुमान जी की होती है। तत्पश्चात सभी साम्मिलित लोग एक एक कर पूजा करते हैं। ज्ञात हो इस आयोजन का स्थल ठीक हावड़ा शिक्षा सदन के मुख्य द्वार के सामने ही कुछ दूरी पर है।
होलिका दहन के विशेष मुहूर्त पूर्व से सफल आयोजन तक वहाँ उपस्थित पुरुष, महिलाएं, बच्चों ने होली पर आधारित राजस्थानी गीत पर नृत्य करते हुए इस उत्सव को एक विशेष व महत्वपूर्ण दिशा दी। अपनी संस्कृति का परंपरागत पालन करते हुए तदान्तर पीढ़ी को भी इस में सम्ममिलित किया गया।

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