नोटबंदी के बाद हावड़ा और हुगली के दो परिवारों के थम ही नहीं रहे आंसू



---रंजीत लुधियानवी, हावड़ा/हुगली, 09 नवम्बर 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

हावड़ा जिले के उलबेड़िया के बासुदेवपुर के सनत बाग और हुगली जिले के चुंचूड़ा के बूड़ो शिवतला के अनिल घोष के परिवार का भले ही एक दूसरे के साथ कोई संबंध नहीं है, लेकिन दोनों परिवारों के दुख का कारण एक ही है। नोटबंदी के बाद घर में रखे गए रद्दी हो चुके कुछ पुराने नोटों को बदलने के लिए दोनों परिवारों के मुखिया ने लाइन लगाई थी और उनकी मौत हो गई।

नोटबंदी के दो साल बाद भी हावड़ा की कल्पना बाग की जिंदगी संभल नहीं सकी है। दो बेटियां अपने दो भाइयों को आज भाईफोटा के मौके पर फोटा देना चाहती थी, लेकिन परिवार के पास इतनी भी पूंजी नहीं कि हिन्दु धर्म के त्योहार का पालन कर सकें। छोटी बेटी अपने पति के साथ इस मौके की जरुरतें पूरी कर रही थी। दरिद्र हो चुकी कल्पना हालांकि दो साल पहले ऐसी हालत में नहीं थी। 30 दिसंबर 2016 को सनत बैंक की लाइन में नोट बदलने के लिए गए थे। इसके दूसरे दिन ही छोटी बेटी का विवाह था, लेकिन उनकी लाइन में ही मौत हो गई।

बासुदेवपुर के नुरूल्ला गांव में मानसिक विकलांग दो बेटों और बड़ी बेटी के साथ कल्पना रहती है। पति की मौत के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दो लाख रुपए की आर्थिक मदद की थी। लेकिन वह रकम छोटी बेटी की शादी में ही खर्च हो गई। गीतांजलि परियोजना में मिली रकम से घर के कुछ हिस्से का विस्तार किया है। पहले 100 दिन के प्रोजेक्ट में काम करती थी, लेकिन वह काम अब बंद हो गया है।

इसी तरह की कहानी चुंचूड़ा के बुड़ोशिवतला के साधन घोष की है। उनका कहना है कि नोटबंदी को लेकर देश को भले ही जितने फायदे का गुणगान किया जा रहा हो, लेकिन मेरा तो परिवार ही तबाह हो गया है। पिता डाकघर में नोट बदलने के लिए लाइन लगाने के बाद बीमार हो गए और उनकी मौत ने परिवार के हालात बदल दिए। पिता की मौत के बाद किसी तरह की क्षतिपूर्ति की रकम भी नहीं मिली। 8 नवंबर 2016 को बूड़ोशिवतला डाकघर के सामने लाइन में अनिल घोष की मौत हो गई थी। अवकाश के बाद सूद की रकम से परिवार चलता था। उनकी पत्नी प्रतिमा का कहना है कि नोटबंदी के कारण पति आतंकित हो गए थे, एमआइएस की रकम समय पर नहीं मिली तो परिवार का क्या होगा। ऐसी बातों से चिंतित डाकघर गए लेकिन घर नहीं लौटे। अनिल की पुत्रवधु मौमिता का कहना है कि मोदी ने तो कहा था कि गरीबों के बैंक खातें में रुपए आएंगे, लेकिन वह रुपए कहां गए?

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