--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।
बाबा बंदा सिंह बहादुर अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन कोलकाता की ओर से पहली बार धार्मिक यात्रा का आयोजन करते हुए तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब के दर्शन की योजना बनाई गई तो लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई। पहले लोग हजूर साहिब के लिए सड़क मार्ग से जाते थे, तब कम से कम 15 दिन का समय लगता था। लेकिन तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने देश भर में धार्मिक स्थलों को जोड़ने की परियोजना के तहत जब सांतरागाछी - नांदेड़ साहेब एक्सप्रेस ट्रेन का संचालन शुरू किया तब से यह मार्ग लोगों के लिए आसान हो गया। इससे कुछ लोग हर साल दर्शन के लिए जाने लगे हैं। हालांकि अभी भी जैसे सारे तीर्थ बार - बार, गंगासागर एक बार कहा जाता है ठीक उसी तरह हजूर साहिब के दर्शन भी सिख जीवन में एक बार करने की कामना करते हैं।
सफर के बारे में बताने से पहले यह जान लेगा उचित होगा कि आखिर लोग क्यों वहां जाना चाहते हैं। संचखंड श्री हजूर साहिब, अबिचल नगर नांदेड़ (महाराष्ट्र) सिख धर्म के पांच तख्त (पीठ) में एक खास स्थान रखता है। हिंदुओं के लिए काशी, मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना की तरह सिख धर्म में हजूर साहिब का अपना ही मुकाम है। बताया जाता है कि दशम पिता श्री गुरू गोविंद सिंह जी ने कहा था कि अपने पुत्रों का वे 60 साल की उम्र तक यहां इंतजार करेंगे।
महाराष्ट्र की पावन भूमि का सिख इतिहास में खास स्थान है। दशवें सिख गुरू गोविंद सिंह जी माता-पिता, चार साहिबजादों (पुत्रों) को देश, कौम और धर्म के लिए कुर्बान करने के बाद यहां पहुंचे थे और पटना साहिब में प्रकाश ग्रहण (जन्म) करने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना करने के बाद उनके अंतिम दिन यहीं गुजरे। नांदेड़ में दशम पिता ने शारीरिक गुरू की प्रथा को समाप्त करते हुए श्री गुरू ग्रंथ साहिब को सिखों का अनंत काल तक गुरू घोषित किया। इस बारे में सिखों की ओर से किए गए सवाल के जवाब में उन्होंने फरमाया-
आगिया भई अकाल की, तबै चलायो पंथ।
सब सिखन को हुकम है गुरू मानियो ग्रथ।।
गुरू ग्रंथ जी मानियो, प्रगट गुरां की देह।
जो प्रभ को मिलबो चहे, खोज शबद मै लेह।।
इसके साथ ही माधव दास बैरागी का बैराग्य समाप्त करके बंदा सिंह बहादुर बनाया और पंजाब विजय के लिए खासला फौज के साथ रवाना किया। इसके बाद वे अपना नश्वर शरीर त्याग कर परमात्मा में विलीन हो गए।
सांतरागाछी से नांदेड़ पहुंचने के बाद गुरुद्वारा प्रबंधन की ओर से स्टेशन से गेस्ट हाउस तक लेकर जाने के लिए मुफ्त बस सेवा का इंतजाम किया गया है। यहां ठहरने के लिए एसी कमरों की खास व्यवस्था है। इसके बाद यहां से लोग किराए की बसें लेकर आसपास के गुरुद्वारों के दर्शन के लिए रवाना हुए।
बाबा बंदा सिंह बहादुर अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन कोलकाता के अध्यक्ष मेघा सिंह सिद्धू ने बताया कि करीब 80 लोगों का जत्था यहां से रवाना हुआ जिसमें भारी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। इस दौरान तख्त श्री हजूर साबिह, गुरूद्वारा संगत साहिब, गुरुदवार मालटेकड़ी साहिब, गुरुद्वारा शिकार घाट, गुरुद्वारा हीरा घाट, गुरुद्वारा बंदा घाट साहिब, गुरुद्वारा नगीना घाट साहिब के दर्शन तो किए ही जत्था दर्शन के दौरान कर्नाटक भी जा पहुंचा।
मालूम हो कि गुरुद्वारा नानक श्री साहिब, बिदर (कर्नाटक) में बहुत हील रमणीय और मन मोहित करने वाले वातावरण में स्थित है। श्री गुरू नानक देव जी अपनी दूसरी उदासी (यात्रा) के दौरान नांदेड़ से होते हुए यहां पहुंचे, तब इलाके में पेय जल का संकट था। इलाका निवासियों की विनती के बाद उन्होंने अपने चरण से एक पत्थर उखाड़ा जिसके नीचे से निर्मल और शीतल झरना बहने लगा। यह शुद्ध, निर्मल जल आज भी अनवरत बह रहा है और एक समय सारे इलाके की जलापूर्ति यहीं से होती थी।
जत्थे ने नांदेड़ में धार्मिक स्थलों के दर्शन करने के साथ ही शानदार नगर कीतर्न देखने का सौभाग्य भी हासिल किया। दशम पिता के घोड़ों के वंशज घोड़, उनके सशस्त्र के भी लोगों ने दर्शन किए। इस मौके पर गुरुद्वारा गोविंद बाग साहिब के नजदीक मनमोहक विशाल बाग में लेजर शो लोगों के मन-मस्तिक पर अमिट यादें छोड़ गया।
फेडरेशन की ओर से संगत को लेकर आने व जाने से लेकर ठहरने तक का सारा इंतजाम मुफ्त में किया गया था। ट्रेन में चाय, नाश्ता, भोजन का भी समुचित प्रबंध किया गया। सचखंड में कई लोगों ने अमृत पान करके खालसा पंथ में प्रवेश किया।