दर्द-ए-दास्ताँ : घर को आग लगी घर के चिराग़ से



---अर्श मोनीर, कोलकाता, 28 जनवरी 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

● दुनिया मे वो क़ौमें तबाह हो जाती है जो अपनी जुबान (भाषा) की हिफाज़त नहीं करतीं

बंगाल के अहले उर्दू के लिए भला इस से बढ़कर शर्मनाक और अफसोसनाक बात और क्या होगी कि जिस अदारे (संस्थान) से उर्दू की तरक़्क़ी जुड़ी हो, जिस अदारे के सरबराह बनने वाले लोग या तो उर्दू के बड़े अदीब (साहित्यकार) शायर, प्रोफेसर या भाषा एक्सपर्ट लोग रहे हों वहां अब अंधेरा है। क्या यह बंगाल के अहले उर्दू पर जुल्म नही है?

शायद यह बंगाल का पहला ऐसा उर्दू अदारा है जिसके सरबराह (कर्ताधर्ता) जो खुद को ही अदारे का सर्वेसर्वा कहते हैं वो न तो उर्दू के प्रोफेसर है ना ही किसी प्राइमरी स्कूल के टीचर न ही इनका उर्दू साहित्य से नज़दीक या डोर का कोई रिश्ता है। जहां तक मुझे पता है वो मैट्रिक पास से अधिक कुछ नही होंगे। और दूसरे एक साहब तो ऐसे भी हैं जो एक उर्दू समाचार पत्र के संपादक ज़रूर हैं लेकिन वो उर्दू में दो चार लाइन उर्दू में लिखने के लायक़ भी नहीं पर अफसोस का मक़ाम है कि चोर चोर मौसेरे भाई बने अदारे पर बिराजमान हैं। और दोनों मिल जुल कर उर्दू साहित्य का जनाज़ा बड़े धूम से निकाल रहे हैं।

आप को याद होना चाहिए कि वो हिंदुस्तान का हिंदी साहित्य अकादमी हो या बंगला साहित्य अकादमी उसके सरबराह जो भी बनते हैं वो अपनी जुबान के माहिर होते है। अपनी जुबान, भाषा पर उनकी एक मजबूत पकड़ होती है लेकिन यहां....?अल्लाह रहम करे उर्दू उर्दू वालों पर के हमारे यहां लूल्हे लंगड़े, गूंगे बहरे और अंधे बिराजमान है और उन से पूछने वाला कोई नहीं। और इस से भी एक अफसोसनाक बात यह है कि शहर कोलकाता के उर्दू के एक प्रोफेसर जिनके बारे में कहा जाता है कि उनको यह नौकरी दहेज़ में मिली है वो इन हज़रात की जूतियां सीधी करने में लगे रहते। अगर उनका बस चले तो ये उनके लिए उगालदान उठाने पर भी राजी हो जाएं। यह वही प्रोफेसर हैं जिनका इंतज़ार छात्र अपने क्लास में करते रहते पर यह हैं कि बस अपनी हाज़िरी भर कर ग़ायब रहते हैं। अल्लाह उन छात्रों के मुस्तक़बिल (फ्यूचर) की हिफाज़त फरमाए।

कोलकाता तो इंक़लाब का शहर रहा है लेकिन हाय रे यहाँ के अवसरवादी लोग, उर्दू के टीचर प्रोफेसर सहाफी साहित्यकार सब उर्दू का जनाज़ा उठते देख रहे है पर चुप क्यों हैं पता नहीं।

याद रहे आप की यह खामोशी, आपराधिक व्यक्तित आपकी ज़ुबान, मातृभाषा की हत्या का कारण बनेगा और आने वाली पीढ़ी आप का दामन पकड़ कर आप से पूछेगी आप अहल (योग्य) हो कर भी अपनी मातृभाषा की हिफाज़त के लिए आगे क्यों नही आये? भाषा की तरक़्क़ी में रोड़े अटकाने वालों को रोका नही क्यों?

ज्ञात हो कि "दुनिया मे वो क़ौमें तबाह हो जाती है जो अपनी मातृभाषा की हिफाज़त नहीं करतीं" और मुझे यह भी पता है आप तबाह होने वाली क़ौम नहीं है इसलिए मुझे उम्मीद है कि आप सब मेरी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाएंगे।

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