पहली बार बजट से मतदाताओं ने लगा रखी हैं लंबी-लंबी उम्मीदें



---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 29 जनवरी 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के बाद ब्रिगेड में 23 दल के नेताओं की महारैली, प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश और अगले कुछ ही महीनों में होने वाले अति महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार की ओर से बजट पेश किया जाना है। साल भर पहले तक 2019 के चुनाव में मोदी सरकार की वापसी को लेकर ज्यादातर लोगों को संदेह नहीं था, लेकिन अब आम तौर पर माना जा रहा है कि चुनाव बाद नई सरकार आएगी। माना जा रहा है कि मौजूदा सरकार का यह अंतिम बजट है और सत्ता बचाने के लिए वह पांच साल पहले किए वादे, जिसे बाद में जुमला कह दिया गया, जरुर पूरा करेंगे। कई विरोधी दल मांग कर रहे हैं कि सरकार को ‘पूर्णांग बजट’ के बजाए ‘वोट आन एकाउंट’ पेश करना चाहिए जिससे चुनाव बाद सत्ता में आने वाली नई सरकार को पूरा बजट पेश करने का मौका मिल सके। केंद्र ‘वोट आन एकाउंट’ या ‘बजट’ कुछ भी पेश करे, देश के साथ ही राज्य और महानगर के लोगों को पहली बार लग रहा है कि अच्छे दिन वाला बजट पेश हो सकता है। किसान, मजदूर, छात्र, नौकरीपेशा से लेकर व्यापारी समेत हर तबके के लोगों को लग रहा है कि पांच साल में पहली बार लोगों की इच्छा के मुताबिक बजट पेश हो सकता है।

सत्ता में आने के बाद केंद्र ने अनुदान बंद करने के लिए कई तरह के कदम उठाए थे। इसके तहत राशन की दुकानों पर सबसिडी वाला राशन तकरीबन ज्यादातर राज्यों में बंद कर दिया गया। एलपीजी की कीमतों में वृद्धि के साथ ही सबसिडी छोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया और भारी संख्या में लोगों ने सबसिडी छोड़ भी दी। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बीते सालों के दौरान अंधाधुंध वृद्धि हुई। खाद की कीमतों से लेकर किसानों के काम आने वाली सभी चीजें इतनी महंगी हो गई हैं कि लोगों की हालत खराब है। पेशे से किसान प्रवीर विश्वास का मानना है कि बजट में कर्ज माफी, डीजल की कीमतों में कमी, खाद की कीमतों में कमी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को सबसिडी के दायरे में लाने वाली परियोजनाओं का एलान किया जा सकता है।

नौकरी पेशा वर्ग को उम्मीद है कि बीते पांच साल के दौरान महंगाई से जैसे उनकी कमर टूट गई है, इस बजट में उन्हें राहत जरुर मिलेगी। अमरीक सिंह के मुताबिक आठ लाख रुपए सालाना की आय वालों को गरीब मानते हुए सरकार ने सामान्य वर्ग के लोगों को 10 फीसद आरक्षण के दायरे में ला दिया है। ऐसे में आयकर में छूट कम से कम आठ लाख रुपए तक हो होनी ही चाहिए। उनका मानना है कि सत्ता में आने के पहले भाजपा ने आयकर छूट में दायरा बढ़ाने का वादा भी किया था। इसी तरह, चंदन का कहना है कि मनमोहन सरकार ने न्यूनतम पेंशन एक हजार रुपए कर दी थी, लेकिन यह काफी नहीं है। इसलिए न्यूनतम पेंशन 5000 से लेकर 7500 के बीच होनी चाहिए, कई संगठन इस तरह की मांग भी कर रहे हैं।

शताब्दी की जगह ‘टी 18 ’ ट्रेन (जिसका नाम वंदे भारत एक्सप्रेस रखा गया है) चलाई जा रही है, कहा जा रहा है कि राजधानी-शताब्दी को यह ट्रेन कई मायनों में पीछे छोड़ देगी। धीरज के मुताबिक इस ट्रेन का प्रस्तावित किराया शताब्दी से 40 फीसद ज्यादा करने की खबर है। केंद्र को तेज रफ्तार ट्रेनें चलाने के साथ ही पहले से चल रही रेलगाड़ियों की गति बढ़ाने से पहले उन्हें तय स्पीड पर चलाने का बंदोबस्त करने, कम से कम ट्रेनों को रद्द करने, तत्काल की बुकिंग से समय में वृद्धि करने के साथ ही यह एलान करना चाहिए कि एक निश्चित समय से ज्यादा ट्रेन देरी से नहीं चलनी चाहिए। उनका सुझाव है कि 24 घंटे के सफर वाली ट्रेन अधिकतम दो से ढाई घंटे (दस फीसद), 48 घंटे वाली ट्रेन अधिकतम चार से पांच घंटे, इससे ज्यादा समय की ट्रेनों को इसी तरह कुल सफर के अधिकतम 10 फीसद से ज्यादा देरी होने पर आरक्षित ट्रेन यात्रियों को 10 फीसद के हिसाब से किराया वापस किया जाना चाहिए। इसके साथ ही रद्द ट्रेन के यात्रियों को उसी टिकट पर आगामी 24 से लेकर 48 घंटे के भीतर दूसरी ट्रेन में सफर की सुविधा देनी चाहिए।

व्यापारी वर्ग का मानना है कि एक व्यापारी एक वोट को लेकर अभियान चलाया जा रहा है। व्यापार में आ रहा दिक्कतों को दूर करने के लिए ऐसा दबाव बनाया जा रहा है। आगामी एक फरवरी को महानगर में बैठक के बाद इस बारे में रणनीति तय की जाएगी, लेकिन उनका मानना है कि चुनाव के पहले व्यापार की दिक्कतों को कुछ हद तक ही सही, दूर किए जाने की उम्मीद है।

वामपंथी संगठनों की ओर से हाल में दो दिवसीय भारत बंद का आयोजन किया था। प्रदीप का कहना है कि न्यूनतम मजदूरी या वेतन को लेकर किए गए आंदोलन के मद्देनजर कहीं भी, किसी भी शर्त के तहत काम करने वाले की न्यूनतम मजदूरी या मासिक वेतन 18 हजार तो होना ही चाहिए। उनका मानना है कि चुनाव के मद्देनजर प्राइवेट संस्थाओं की नकेल कसते हुए केंद्र न्यूनतम वेतन का प्रावधान लागू कर सकता है।

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