छोटी सी आशा...



कोलकाता, 04 मार्च 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

छोटी सी आशा, वो आशा जो किसी एक की नहीं है। यह आशा जो लाखों-करोड़ों लोगों की आशा है। यह आशा सकारात्मक आशा है। इस आशा से करोड़ों लोगों को संदेश प्रदान किया जा सकता। मानव धर्म का पाठ पढ़ाया जा सकता है। इस आशा से सामाजिक कार्यों में गति प्रदान की जा सकती है, लोगों को मानव धर्म का बोध कराया जा सकता है जिससे लोग ज्यादा से ज्यादा सक्रिय होंगे। विशेषकर हम सभी की ओर से मदर टेरेसा को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इतिहास में ऐसे कई मनुष्यों के उदहारण हैं जिन्होंने अपना तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित कर दिया। मदर टेरेसा भी ऐसे ही महान लोगों में एक हैं जिनका स्मरण होते ही हमारा हृदय श्रद्धा से भर उठता है और चेहरे पर एक ख़ास आभा उमड़ जाती है। मदर टेरेसा एक ऐसी महान आत्मा थीं जिनका हृदय संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इसी कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनके सेवा और भलाई में लगा दिया। 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया। तत्पश्चात वह आयरलैंड गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। अंग्रेजी सीखना इसलिए जरुरी था क्योंकि ‘लोरेटो’ की सिस्टर्स इसी माध्यम में बच्चों को भारत में पढ़ाती थीं। आयरलैंड से 06 जनवरी 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं थी। वह एक अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उनसे बहुत स्नेह करते थे। वर्ष 1944 में वह हेडमिस्ट्रेस बन गईं। उनका मन शिक्षण में पूरी तरह रम गया था परन्तु उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थी। 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौते हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए। 1946 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने तो कोलकाता शहर की स्थिति और भयावह बना दी। वर्ष 1946 में उन्होंने गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों की जीवनपर्यांत मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कार्य से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इन लोगों में देश के उच्च अधिकारी और भारत के प्रधानमंत्री भी शामिल थे, जिन्होंने उनके कार्यों की सराहना की। मदर टेरेसा के अनुसार, इस कार्य में शुरूआती दौर बहुत कठिन था। वह लोरेटो छोड़ चुकी थीं इसलिए उनके पास कोई आमदनी नहीं थी। उनको अपना पेट भरने तक के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ी। जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके मन में बहुत उथल-पथल हुई, अकेलेपन का एहसास हुआ और लोरेटो की सुख-सुविधाओं में वापस लौट जाने का खयाल भी आया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 07 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, विकलांग, नेत्रहीन, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी। ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर मदर टेरेसा की मृत्यु के समय वर्ष 1997 में 4 हजार से भी ज्यादा ‘सिस्टर्स’ दुनियाभर में लोगों की सेवा में सक्रिय थीं। मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले। ‘निर्मल हृदय’ का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो। निर्मला शिशु भवन’ की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई। सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी असफल नहीं होता, यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई। मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री वर्ष 1962 में और बाद में वर्ष 1980 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें वर्ष 1985 में मेडल आफ फ्रीडम से नवाजा। मानव कल्याण के लिए किये गए कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार ग़रीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था। उन्होंने नोबेल पुरस्कार की धन-राशि को गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया था।

नेशनल क्रिश्चियन मॉयनरिटी फोरम के चेयरमैन बिशप डॉ• आलोक मुखर्जी ने मदर टेरेसा से जुड़े अपने अनुभवों को हमसे साझा किया। उन्होंने बताया कि मैं उनके सम्पर्क में रहा और मुझे उनसे आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। वे हमारे लिए प्रेरणा है। उनके द्वारा किए गए कार्यों को कई पीढ़ियों तक याद किया जाएगा और समाज को एक विशेष संदेश रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेरित करता रहेगा तथा सक्रिय होने के लिए उर्जा प्रदान करेगा। इसी क्रम को गति देने के लिए हम सभी की एक छोटी सी आशा है कि मदर टेरेसा के नाम पर एक मेट्रो रेल स्टेशन का नाम रखा जाए जो उनके प्रति एक श्रद्धांजलि भी होगी। यह छोटी सी आशा सिर्फ एक समुदाय की नहीं है बल्कि विभिन्न आस्थाओं में विश्वास करने वाले विभिन्न समुदाय के लोग एक साथ एक सुर में मानवता के प्रतीक के लिए मांग कर रहे हैं। हम सभी ने विभिन्न कार्यक्रमों के मंचों से इस छोटी सी आशा को गति देने का प्रयास किया है। हमने वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेस से लेकर संसद के पटल तक इसे पहुंचाया है। हमें उस दिन का हार्दिक इंतजार है कि छोटी सी आशा हकीकत बन कर हमारे सामने आए कि मदर टेरेसा के नाम पर एक मेट्रो स्टेशन का नामकरण हो।

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