उपन्यास 'महानिर्वात में कोलाहल' पर चर्चा



लखनऊ, 24 मार्च 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

जनवादी लेखक संघ लखनऊ की ओर से कैफ़ी एकेडमी में तरुण निशांत के उपन्यास 'महानिर्वात में कोलाहल' पर चर्चा आयोजित की गई। चर्चा के आरंभ में तरुण निशान्त ने आत्मकथ्य प्रस्तुत करते हुए अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने समाज की विसंगतियों को गिनाते हुए देश के विकास में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी बाधा माना। भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था में फैल चुका है जिसको खत्म कर पाना कठिन लगता है। इसीलिए यह उपन्यास उन्होंने बाज़ारवाद और भ्रष्टाचार पर केन्द्रित किया है। पहले पाठक के रूप में विचार व्यक्त करते हुए राजेन्द्र वर्मा ने कहा कि उपन्यास की रचना के दौरान तरुण जी से उपन्यास के सहमति-असहमति के बिन्दुओं पर चर्चा होती रही। इसे बेहद व्यवस्थित ढंग से लिखा गया है।

कथाकार रामनगीना मौर्य ने उपन्यास को स्त्री केन्द्रित उपन्यास मानते हुए उसकी विशेषताओं को चिन्हित किया। आलोचक नलिन रंजन सिंह ने उपन्यास को भ्रष्टाचार केन्द्रित मानते हुए भी उसे विफल संबंधों की कहानी कहा। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की चकाचौंध में टूटते व्यक्तियों की एक शृंखला है इसमें। उर्वशी का चरित्र नहीं होता तो इसके स्त्री विरोधी उपन्यास हो जाने का भी खतरा था। फिर भी अपने कथा प्रवाह और उद्देश्य की सफलता के कारण इसे एक सफल उपन्यास कहा जा सकता है। कथाकार शैलेन्द्र सागर ने उपन्यास के कई बिंदुओं पर तनाव की कमी को रेखांकित किया। कई जगह वक्तव्य लंबे हो गए हैं। कई कथासूत्र आपस में जुड़ते नहीं हैं, इसीलिए उनके औचित्य पर भी सवाल उठता है। कथाकार अखिलेश ने तरुण निशान्त को एक मुठभेड़ करता हुआ कथाकार कहा। उन्होंने उपन्यास के शीर्षक पर चर्चा की और इसे संबंधों के विघटन के दूसरे पाठ के रूप में देखने का आग्रह किया। उपन्यास में भ्रष्टाचार प्रतीकात्मक रूप में अधिक है। उपन्यास के अध्याय के आरंभ में लिखी टिप्पणियों की जरूरत नहीं है, इससे कहानी खुल जाती है। यह एक आवेश में लिखा गया उपन्यास है। कथाकार शिवमूर्ति ने तरुण निशान्त के उपन्यास के शिल्प-भाषा की प्रशंसा की। उपन्यास में विवरण, वर्णन, चित्रण, बिंबविधान सब अच्छा हुआ है। पहला उपन्यास ही त्रुटिहीन है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने उपन्यास को एक ईमानदार व्यक्ति का आर्तनाद कहा। लेखक ने भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या के रूप में प्रस्तुत किया है और उसे गद्दारी माना है। लेखक ने समाज को ईमानदार और भ्रष्ट जैसे दो भागों में विभाजित किया है और वह ईमानदारी के पक्ष में खड़ा है। उसका कथ्य एक बड़ी सच्चाई है। यह मध्यवर्गीय भारतीय समाज की व्यापक चिंताओं का उपन्यास है। यद्यपि यह आर्थिक भ्रष्टाचार के अलावा भ्रष्टाचार के अन्य मुद्दों पर ध्यान कम देता है। यह एक अराजनीतिक उपन्यास है, इसलिए इसके फलक सीमित हो जाता है। उम्मीद है अगले उपन्यास में इन कमियों को पूरा करेंगे।

संचालन करते हुए ज्ञान प्रकाश चौबे ने उपन्यास के कुछ अंशों का पाठ करते हुए उपन्यासकार के लक्ष्यार्थ को स्पष्ट किया। अंत मे धन्यवाद ज्ञापन डॉ• संध्या सिंह ने किया।

इस अवसर पर नरेश सक्सेना, विजय राय, सुभाष राय, अनिल त्रिपाठी, सुधाकर अदीब, संजय मिश्र, कौशल किशोर, दयानंद पाण्डेय, बंधु कुशावर्ती, रामकठिन सिंह, अखिलेश श्रीवास्तव, भगवान स्वरूप कटियार, अवधेश श्रीवास्तव, संध्या सिंह, कल्पना पाण्डेय, प्रताप दीक्षित, नूर आलम, संदीप कुमार सिंह, देवनाथ द्विवेदी, सीमा राय द्विवेदी, आभा खरे, सुशीला पूरी, रजनी गुप्त, शीला पाण्डेय, उषा राय, अनिल रंजन भौमिक, राजेश कुमार, के•के• वत्स, संजय चौबे, प्रतुल जोशी, अरुण सिंह, माधवी मिश्रा, अनूप मणि त्रिपाठी, अनिल श्रीवास्तव, माधव महेश, गोपाल नारायण श्रीवास्तव, कुंती मुखर्जी, शरदिंदु मुखर्जी, कुसुमलता पाण्डेय, विपिन शर्मा, श्याम अंकुरम, महेन्द्र भीष्म, अखिलेश मयंक आदि तमाम साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

ताजा समाचार

National Report



Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News