पत्रकारिता का डगमगाता स्वरूप



---योगेंद्र कुमार, औरंगाबाद, 09 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ के रूप में देखा जाता है। इसके सामाजिक उदेश्यों की एक विशिष्ट कायाकल्प व छायाचित्र दर्शाने का उम्मीद बनी रहती है। देश की आजादी में पत्रकारिता ही सार्वभौमिक मापदण्ड था जो कि उस क्रांति में प्रतिबंधित, कारावास व विभिन्न यातनाएं पाने के बाद भी कलमों से अपनी चिंगारियां निकालते रहे। कल भी पत्रकारिता चिंगारी उगलती थी आज भी अंगारे पैदा करते हैं बस वे स्वार्थ में वशीकरण हो कर अपनी नैतिकता को खो कर अनैतिक मूल्यों की ओर चल पड़े हैं।

आज उनकी ज़मीर को याद दिला सामाजिक दृष्टिकोण के तहत उन्हें आईना दिखाने का समय है उनकी अपनी मर्यादा व शक्ति का अनुभव करानी पड़ सकती है क्यूंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति पत्रकारिता ही अगर करप्ट हो जायेगी तो फिर लोकतंत्र कमजोर और स्थिरता की ओर अग्रसर हो जायेगी। ऐसा नहीं हम कहते हैं कि सभी पत्रकार अनैतिक मार्गप्रशस्त हैं कुछ पत्रकार वैसे भी हैं जो अपनी लगन व निष्ठा के अन्तर्गत अपनी गरिमा को बनाये हुये हैं। देश की राजनीतिक व सामाजिक संस्करण को उनके नीति को जनता के सामने प्रदर्शित करना चाहते हैं लेकिन किसी न किसी रूप में उनके ऊपर चौतरफा दबाव बनाया जाता है इससे पीड़ित हमारे समाज में बहुत से पत्रकार हैं, यह भी कारण उनकी हौसलों को खत्म करने में इज़ाफ़ा हुआ है।

लेकिन आज की पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है, अपनी गरिमा व मूल्य को खोते दिखाई दे रहे हैं। आज के पत्रकारीता में चाटुकारिता के परिदृश्य साफ परिलक्षित हैं अफसर व नेताओं की चिलम भरने का कार्य कर रही है। आज की पत्रकारिता अपनी सुख-सुविधा व अपनी स्वार्थ के हिसाब से खबरों को पेश करने में प्रयत्नशील है। अपनी गरिमा को ताख पे रखते हुये हर सीमाओं को लांघने में जरा भी नही संकोच करते हैं। खुद को भावी व अपनी ऊपर तक पहुंच बनाने के लिये स्वार्थक जीवन पाने हेतु आकृष्ट हैं। आज के पत्रकार लोकतंत्र के महापर्व चुनाव को अपनी पॉकेट के हिसाब से गोल्डन समय मानते हैं बहती गंगा में हाथ धोने का अच्छा अवसर मानते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि पत्रकारिता का स्तर किस ओर रुख है।

अभी के हाल के चुनावी माहौल में राजनीतिक पार्टियां को अक्सर आचार सहिंता को तोड़ते देखने को मिलता है बयान बाज़ी सर चढ़ कर शुरू हो जाती है। कुछ नेता देश का माहौल बिगाड़ अपनी रोटी सेकने की कार्य करते है।

"राजनीति आग लगाकर हाँथ सेक रही है,
जातियाँ एक दूसरे पे पत्थर फेंके रही हैं।
इंसान लहलुहान सड़को पे घूम रहे हैं,
इंसानियत मूक बन तमाशा देख रही है।"

हम जानते हैं कि लोकतंत्र में सरकार और पत्रकार दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। बिना पत्रकार के सरकार अधूरी और बिना सरकार के पत्रकार अपंग है परंतु इसका मतलब यह नहीं कि पत्रकारिता खबरों की सौदागरी नहीं न ही उसका सत्ता के साथ शयन है। उसका कार्य सामाजिक जीवंत व कर्यान्वित कार्यों की सच्चाईयों निष्पक्ष, न्यायनिष्ठ, वास्तविक, धर्म निरपेक्ष और निर्विवाद शाश्वत होनी चाहिये क्योंकि पत्रकारिता मानव जीवन का सामाजिक तंत्र का मुख्य अंग है। इसके बिना किसी भी समुदाय मानवता की गरिमा की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पत्रकारिता जागृति उत्पन्न तथा विभिन्न समूहों और व्यक्तियों के बीच सेतु का कार्य करती है। यह हमारी तथाकथित विस्तृत हो गयी संवेदना को खुशद प्रदान करती है।

पत्रकारिता का वह धर्म है जिसका सम्बन्ध जिससे पत्रकारिता का सीधा कर्म से ताल्लुकात होती है, उसे किसी भी विचारधारा व जातिवाद से प्रभावित होकर खबर को नहीं दर्शाना चाहिए।

आज के पत्रकारिता डूबते जहाज के जैसे अंधकार की ओर मुखरित है। उनके निष्ठा का घोर अभाव दिख रहा है जिसे उन्हें अपनी अधिकार व शक्तियों को पहचानते हुये नैतिक मूल्यों को जानकर रिश्वत लेकर खबर छापना अवांछनीय, अमर्यादित और अनैतिक विलक्षणों से दूर होने की आवश्यकता है जिससे जनता के बीच खरे कसौटी पर सार्थक विश्वसनीय बने रहने की आवश्यकता है।





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