---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 16 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
विधानसभा चुनाव के बाद 2016 से अब तक एक के बाद दूसरा करते हुए 17 विधायक कांग्रेस छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में चले गए हैं। पंचायत, नगरपालिका और उपचुनाव में लगातार कांग्रेस के नीचे से पांव की जमीन खिसकती दिख रही है। संगठन की दयनीय हालत के साथ ही दल की ओर से यहां किसी तरह का आंदोलन भी नहीं हुआ है। पांच साल पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की थी, इसमें से एक सांसद कांग्रेस छोड़ कर तृणमूल में चली गई है। इसके बावजूद राज्य और देश भर में जितने भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हाल तक हुए हैं, सारी जगह कांग्रेस को तीन से चार सीटें मिलती दिखाई गई हैं। जबकि कई सर्वे में माकपा की सीटें शून्य तक दिखाई जा रही हैं। भाजपा की सीटें भी दो-चार से लेकर सात तक मिलती दिखाई जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस एक बार फिर बंगाल में लोकसभा सीटें जीतने के मामले में दूसरे नंबर का दल रहेगा?
मालूम हो कि 2014 की लोकसभा में कांग्रेस ने 4 और माकपा और भाजपा ने 2-2 सीट पर जीत हासिल की थी। इसी तरह, विधानसभा में कांग्रेस तृणमूल के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर 2016 में उभरा था।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब कांग्रेस का बंगाल में कोई संगठन नहीं है और दल की ओर से आंदोलन के नाम पर कुछ नहीं किया गया है, ऐसे में इतनी सीटें कांग्रेस को कहां से और क्यूं मिलती दिख रही हैं? जबकि सफल ब्रिगेड रैली करने के साथ ही सिंगुर से कोलकाता तक भव्य पद यात्रा करने के साथ ही दूसरे कई आंदोलन से वाममोर्चा ने खासी चर्चा बटोरी थी, उसकी सीटें शून्य बताई जा रही हैं।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का अपना पाकेट वोट बैंक और अल्पसंख्यक वोट बैंक अब भी अटूट है और राहुल गांधी के बाद प्रियंका गांधी के भी दल में आने के बाद यह और मजबूत हुआ है। राज्य के चार जिलों की सात लोकसभा सीटों पर इन वोटों के सहारे ही कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत करती दिख रही है, जबकि वाममोर्चा का ऐसा जनाधार किसी भी सीट पर नहीं दिख रहा है कि वह अपने बूते पर एक भी सीट जीत सके।
गौरतलब है कि लोकसभा के 2014 के चुनाव में कांग्रेस को महज 9.58 फीसद वोट मिले थे, लेकिन चार सीटें जीतने में सफल रही थी। इसके मुकाबले वाममोर्चा को 29.17 फीसद वोट मिलने के बाद भी उन्हें महज दो सीटें मिली थी। पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों की अगर बात करें, तब रायगंज, मालदा उत्तर और दक्षिण, जंगीपुर, बहरमपुर, मुर्शिदाबाद और पुरूलिया की सात लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को 20 से लेकर 50 फीसद तक वोट मिले थे। जबकि बाकी सीटों पर 10 फीसद से कम वोट मिले थे।
सूजापुर के विधायक व मालदा उत्तर लोकसभा सीट के कांग्रेस उम्मीदवार ईशा खान चौधरी का कहना है कि तृणमूल की ओर से प्रचार किया जाता है कि कांग्रेस महज साइनबोर्ड बनकर रह गई है, लेकिन चांचल में राहुल गांधी की सफल रैली से साबित हो गया है कि कांग्रेस का जनाधार मजबूत है।
मालूम हो कि मालदा में महज चांचल पंचायत समिति ही कांग्रेस के पास है, बाकी सारी उनके हाथ से चली गई है। रायगंज की कांग्रेस उम्मीदवार दीपा दासमुंशी को भी उम्मीद है कि भाजपा को पराजित करके केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सरकार का गठन होगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्र भी मानते हैं कि भले ही हमें वोट प्रतिशत कम मिले, लेकिन लोकसभा में सीटें हमें ही मिलेंगी।