---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 22 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
कोलकाता उत्तर लोकसभा सीट हदबंदी के बाद अस्तित्व में आई और तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय ने 2009 में माकपा के मोहम्मद सलीम को और 2014 में भाजपा के राहुल सिन्हा को पराजित करके जीत हासिल की थी। इस बार फिर वे चुनाव मैदान में हैं। भाजपा के पुराने उम्मीदवार ही उनके सामने हैं लेकिन माकपा ने कनीनिका बोस घोष और कांग्रेस ने सैय्यद शाहिद इमाम को चुनाव मैदान में उतारा है। शिव सेना ने श्रावंती दास को चुनाव मैदान में उतार कर मुकाबले को रोमांचक बना दिया है।
मालूम हो कि 2009 में तृणमूल कांग्रेस को यहां 52.50 फीसद वोट मिले थे, जबकि माकपा को 40.5 फीसद वोट मिले थे। भाजपा के तथागत राय के महज 4.22 फीसद वोट मिले थे। लेकिन 2014 में देश भर में मोदी लहर के कारण भाजपा की ओर से किए गए धुंआधार प्रचार के कारण यहां वोटों में तो भारी हेरफेर हुआ लेकिन जीत तृणमूल कांग्रेस को ही मिली। तृणमूल कांग्रेस को 35.94, भाजपा को 25.88, माकपा को 20.50 और कांग्रेस को 13.68 फीसद वोट मिले थे। कोलकाता में माना जा रहा है कि पांच साल पहले वाली मोदी लहर नहीं है और नोटबंदी, जीएसटी के कारण खासा प्रभाव दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की उम्मीदें कांग्रेस के वोटों पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस को मिलने वाले वोट ही तय कर सकेंगे कि यह सीट किसकी झोली में जाएगी।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कोलकाता उत्तर लोकसभा सीट पर 14 लाख 37 हजार 812 मतदाता हैं और इसमें तीन लाख 20 हजार अल्पसंख्यक मतदाता हैं। करीब इतने ही तीन लाख 40 हजार हिंदी भाषी मतदाता इस लोकसभा में रहते हैं। यहां के 60 वार्ड में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा है और 52 वार्ड सत्ताधारी दल के कब्जे में हैं। वाममोर्चा और भाजपा के तीन-तीन और कांग्रेस के 2 पार्षद हैं। कोलकाता नगर निगम में इस लोकसभा के तहत वार्डों की बात अगर की जाए, तब पांच मुस्लिम पार्षद हैं और यहां से 10 हिंदी भाषी पार्षद हैं।
विधानसभा की अगर बात की जाए तो सभी सात विधानसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है। दूसरे नंबर के उम्मीदवारों की बात अगर की जाए, तब 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा महज एक जोड़ासांकू सीट पर दूसरे नंबर पर रहने में सफल रही थी।इसके अलावा सभी छह विधानसभा सीटों पर कांग्रेस-वाममोर्चा का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था।
माना जाता है कि उर्दू भाषी मतदाताओं में अभी भी कांग्रेस का ही समर्थन किया जाता है और राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के आने के कारण कांग्रेस में लोगों का जोश देखा जा रहा है। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से तृणमूल कांग्रेस पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप लगाया जाता है। ऐसे में अल्पसंख्यक मतदाता कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में विभाजित होते हैं तो भाजपा को वोट बढ़ सकते हैं, लेकिन अगर एकजुट होकर तृणमूल को वोट दें तो सत्ताधारी दल की शानदार जीत हो सकती है। हालांकि माना जा रहा है कि अल्पसंख्यक मतदाता जिस तरह कांग्रेस, तृणमूल और माकपा में बंटे हुए हैं, उसी तरह हिंदी भाषी मतदाता भी तीनों दलों में बंटे हुए हैं। तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण जहां देश के साथ ही महानगर का कारोबार भी तबाह हो गया, इसलिए व्यापारी वर्ग भी भाजपा के खिलाफ मतदान करेगा। बागड़ी मार्केट में राज्य सरकार की भूमिका की यहां काफी प्रशंसा हुई थी। दूसरी ओर भाजपा मोदी, कांग्रेस राहुल और अल्पसंख्यक वोट और माकपा अपने पुराने मतदाताओं को लुभाने में लगी है।