पत्रकारों का विरोध जुलूस



---उमेश तिवारी, हावड़ा, 30 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

24 अप्रैल को हावड़ा नगर निगम के कर्मचारियों और हावड़ा जिला अदालत के अधिवक्ताओं के बीच निगम के अन्दर बाइक लगाने की घटना को लेकर जमकर मारपीट हुई थी। इस घटना को कवर करने पहुँचे इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मिडीया के 10 पत्रकारों और फोटोग्राफरों पर वकीलों द्वारा हमला करने के विरोध में सोमवार 29 अप्रैल को पत्रकारों ने हावड़ा जिलाशासक चैताली चक्रवर्ती को एक ज्ञापन सौंपा।

इससे पहले बंकिम सेतु के समीप 100 पत्रकार और फोटोग्राफर इकट्ठा हुए। यहां से यह जुलूस हावड़ा थाना, हावड़ा जिला अस्पताल होते हुए जिलाशासक के कार्यालय तक गई। जिलाशासक ने मामले पर गंभीरता से विचार करने का आश्‍वासन दिया। उल्लेखनीय है कि हावड़ा नगर निगम के अन्दर हावड़ा जिला अदालत के एक अधिवक्ता जबरन बाइक लगा रहे थे जिसका विरोध वहाँ के सुरक्षाकर्मियों ने किया। इस बात को लेकर निगम के कर्मचारियों और हावड़ा जिला अदालत के अधिवक्ताओं के बीच मारपीट हुई। दोनों ओर से पत्थरबाजी भी हुई। इस घटना में दोनों पक्षों के करीब 15 लोग घायल हो गये थे। घटना की जानकारी मिलते ही हावड़ा थाना की पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और निगम कर्मचारियों को निगम के अन्दर बंद कर दिया और अधिवक्ताओं से वापस जाने की अपील करती रही लेकिन वे निगम के कर्मचारियों से उन्हें सौंपने की बात करते रहे।

इसी बीच किसी ने अफवाह उड़ा दी कि एक चैनल में गलत खबर प्रसारित की जा रही है। उसी वक्त उक्त चैनल के पत्रकार सुनित हलदार वहां पहुँच गये। सुनित को देखते ही बिना कुछ समझे उसपर सैकड़ो अधिवक्ताओं ने हमला कर दिया और उसे पटकर पीटा। उन्हें छुड़ाने गए दूसरे पत्रकार भी घायल हुए।

अधिवक्ताओं ने फोटोग्राफर कुणाल मल्लिक, दीपान घोषाल और 60 वर्षीय अभिजीत बनर्जी को भी नहीं छोड़ा। इसके अलावा अधिवक्ताओं ने मिडीया एण्ड प्रेस कार्नर पर ताला जड़ने और पत्रकारों को पीटने की धमकी दी। इस घटना पर पत्रकारों ने जिलाशासक से न्याय की गुहार लगायी है। सबसे बड़ा प्रश्‍न है कि क्या अधिवक्ताओं को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार है? अधिवक्ताओं पर पुलिस लाठी चार्च करती है तो पुलिस दोषी और अगर अधिवक्ता पत्रकारों को पीटे तो यह उनका अधिकार है। यह अधिकार उन्हें किसने दिया। 60 वर्षीय उस बूढ़े फोटोग्राफर का क्या दोष था जिनके साथ बेटे के उम्र के अधिवक्ताओं ने मारपीट की। एक छोटी से घटना को लेकर जिस तरह से हावड़ा कोर्ट के अधिवक्ताओं ने पूरे बंगाल के अदालतों में होनेवाले कामकाज को ठप्प कर दिया, क्या इसे उचित कहा जा सकता है?

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