---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 01 मई 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल के बारे में आमतौर पर प्रचार किया जाता है कि राज्य की ज्यादातर सीटों पर चौतरफा मुकाबला है, लेकिन एसयूसीआइ तृणमूल कांग्रेस के बाद दूसरा दल है जो अकेले अपने दम पर राज्य की सभी 42 लोकसभा सीटों पर चुनाव मैदान में है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के पास चल या अचल संपत्ति नहीं है, इसके बाद भी कई पैदल चलकर तो कहीं आटो-टोटो किराए पर लेकर प्रचार कार्य में जुटे हुए हैं।
मधूसूदन बेड़ा एक ऐसे उम्मीदवार हैं जो सारे तमलुक में पैदल चलकर प्रचार कार्य कर रहे हैं। बर्दमान पूर्व लोकसभा केंद्र के निर्मल माझी कालना की एक राष्ट्रीयकृत बैंक में ठेका श्रमिक हैं। पुरुलिया जिले के रंगलाल कुमार के हाथ और बैंक खाते में मुश्किल से एक हजार रुपए हैं। बीरभूम की आएशा खातून दल की होल टाइमर (सर्वकालीन कार्यकर्ता) है। दल से मिलने वाले भत्ते के सहारे ही उनका जीवन गुजरता है। अब बीरभूम लोकसभा केंद्र में रास्ते पर पैदल चल कर लोगों से वोट की मांग कर रही हैं।
इस तरह की हालत तकरीबन सभी एसयूसीआइ के लोकसभा उम्मीदवारों की है। इसके बाद भी राज्य की सभी सीटों पर मुकाबले को चौतरफा से पांच तरफा करने की कोशिश है। हालांकि यह बात दीगर है कि तकरीबन सभी उम्मीदवारों को नामांकन के लिए जमा करने वाली 25 हजार रुपए की रकम यार-दोस्तों-रिश्तेदारों व चंदे की रकम से जुटानी पड़ी है। उत्तर कोलकाता से उम्मीदवार विज्ञान बेरा पेशे से डाक्टर हैं और उनका कहना है कि वास्तविक मार्क्सवाद के आदर्श ही उनकी पूंजी है और इसके सहारे ही वे चुनाव मैदान में हैं।
चुनाव के इस दौर में जब धनबल ही प्रमुख है और एक उम्मीदवार नामांकन के लिए रोड शो में ही एक करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम खर्च कर देता है ऐसे में आम उम्मीदवारों के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल काम होता जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी बीते कुछ सालों से मांग कर रही हैं कि चुनाव केंद्र सरकार के खर्चे से किया जाना चाहिए। कुछ साल पहले अगर कोई उम्मीदवार करोड़पति होता था तो उसकी खबरें छपती थी क्योंकि एकाध उम्मीदवार ही करोड़पति होता था, लेकिन अब हालात उलट गए हैं। प्रधानमंत्री से लेकर विरोधी दल के नेता तक ऐसा कोई नहीं है, जो करोड़पति नहीं हो। देश की तो बात ही छोड़िए, बंगाल को गरीब राज्य माना जाता है। अब यहां भी करोड़पति उम्मीदवार को ढूंढने में परेशानी नहीं होती है। उम्मीदवारों की निजी धन - संपत्ति को छोड़ कर बड़े राजनीतिक दलों के लिए डोनेशन पूंजी जुटाने का सबसे बड़ा साधन है। इसे लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं, हाल में कार्पोरेट बांड चालू हुए हैं। हालांकि इसे चुनाव आयोग के निर्देशानुसार ही ग्रहण करना होता है।
करोड़ों के चुनावी खेल में लगभग कंगाली की हालत में एसयूसीआइ के उम्मीदवार जोश-खरोश के साथ चुनाव मैदान में दिख रहे हैं। हालांकि उम्मीदवारों का कहना है कि दल की ओर से उन्हें कई तरह के काम करनेके लिए दिए जाते हैं, इसमें से एक काम चुनाव लड़ना है। इसलिए अपनी सफलता या असफलता का जिक्र करना फिजूल है। 37 वर्षीय निर्मल माझी बर्दमान के बीड़ी श्रमिक आंदोलन के प्रथम दर्जे के नेता हैं। दो साल पहले तक एसयूसीआइ के होलटाइमर थे, लेकिन शारीरिक बीमारी के कारण धन की जरुरत हुई तो एक बैंक में ठेका श्रमिक के तौर पर काम करने लगे। आएशा खातून भी होल टाइमर हैं और दल के भत्ते पर ही गुजारा करती हैं।
बड़े-बड़े दल जहां आर्थिक संकट का रोना रोते हैं, वहीं सचमुच में तंगहाली में गुजर-बशर करने वाले एसयुसीआइ के उम्मीदवार चुनाव प्रचार के लिए धन के संकट से बेफिक्र हैं। एसयूसीआइ के प्रवक्ता अमिताभ का कहना है कि चुनाव हो या नहीं हो, दल का सारा खर्च ही सदस्यों के चंदे और पार्टी समर्थकों से मिलने वाली रकम से चलता है। इस फंड से ही चुनाव का खर्च चलता है। पोस्टर-बैनर से लेकर माइक या दीवार लेखन का खर्च दलके फंड से ही प्रदान किया जाता है।