--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।
धर्म को लेकर देश ऐसी जगह खड़ा है कि लोगों का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव के पहले देशव्यापी दंगा करवाया जा सकता है। ऐसी हिंसा में जितने ज्यादा लोगों की मौत और नुकसान होगा, राजनीतिक दल उसका उतना ही फायदा उठाने में सक्षम होंगे। लेकिन अभी भी देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो धार्मिक उन्माद में आशा की एक किरण के तौर पर दिखाई देते हैं। ऐसे ही लोगों में एक हैं कृष्णनगर शहर के नाजिरापाड़ा के रहने वाले सिराज शेख, वे काली पूजा भी करते हैं और नमाज भी पढ़ते हैं। अब वे चाहते हैं कि घर में काली मंदिर की स्थापना की जाए जिससे माँ काली को पक्का ठिकाना मिल सके।
सिराज वंश की परंपरा के मुताबिक पूजा करते आ रहे हैं। उनके पिता खुदाबख्श शेख भी इसी तरह पूजा करते थे। उनके पहले खुदाबख्त के पिता हाफिज शेख भी पूजा किया करते थे। अपने घर में हर दिन काली पूजा करने के साथ ही साल मेें दो दिन व्यापक पैमाने पर काली पूजा की जाती है। कार्तिक महीने की काली पूजा के दिन और वैशाख महीने की कालीपूजा में भी जमकर पूजा की जाती है।
इस बारे में सिराज का कहना है कि 19 अक्टूबर को काली पूजा की जाएगी, उस दिन यज्ञ भी किया जाएगा। पहले वे लोग बांग्लादेश में रहते थे, जहां से पूजा की परंपरा शुरू हुई। बाद में देश का विभाजन हुआ और परिवार बंगाल के इस ओर कृष्णनगर में आ गया। पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार में कालीपूजा की जाती है, इस बारे में तो सिराज को मालूम है। लेकिन यह पता नहीं कि पूजा की शुरुआत क्यों और कैसे हुई थी।
हालांकि देश में जिस तरह धार्मिक तौर पर लोगों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश की जा रही है वैसे माहौल में सिराज बंगाल के सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं। हालांकि वे किसी के कहने पर या दिखावे के लिए धर्म का पालन नहीं करते हैं। इसके साथ ही प्रतिदिन कम से कम एक बार मस्जिद में नमाज पढ़ने भी जाते हैं।
इलाके के मुसलमान परिवार भी जानते हैं कि पारंपरिक तौर पर सिराज के परिवार में कालीपूजा की जाती है। इसलिए समाज ने भी उनकी भावनाओं को स्वीकार कर लिया है।
मालूम हो कि कृष्णनगर के नाजिरापाड़ा में सिराज का कच्चा मकान हैं जहां उनका अस्थायी कालीमंदिर है। प्रतिदिन वहीं पूजा करते हैं। इस बार नेीचे की वेदी को पक्का किया है। लेकिन वहां कोई मूर्ति नहीं है। काली की तस्वीरों को रख कर ही पूजा करते हैं। अब वहां पक्का मंंदिर बनाना चाहते हैं। पत्थर की एक कालीमूर्ति उन्हें मिली है। नए मंदिर में उस मूर्ति को स्थापित करना चाहते हैं।
पेशे से दूसरे लोगों के बगीचे या तालाब की देखभाल करने का काम करते हैं। भले ही 77 साल की उम्र में दूसरे काम करने में समस्या होती है लेकिन सिराज इस उम्र में भी काली पूजा मन लगाकर करते हैं। उनका कहना है कि पूर्वजों की परंपरा को तो जान देकर भी निभाना है।