ममता का मत प्रतिशत बढ़ा परन्तु मिशन 2021 मुश्किल भरा



---ओम प्रकाश सिंह, कोलकाता, 25 मई 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

राजनीति में एक कहावत काफी प्रचलित है- दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। वैसे तो लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम पूरे देश में एनडीए के लिए अप्रत्याशित रहा है लेकिन बंगाल ने जो परिणाम दिया है वह अचंभित करने वाला है। इसकी वजह यहीं सदियों पुरानी कहावत है। एक तरफ जैसे देशभर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सारे राजनीतिक विरोधियों ने हाथ मिला लिया था उसी तरह बंगाल में ममता बनर्जी के हाथों सरकार गंवाने वाली वापमंथी पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने दुश्मन भाजपा का साथ देकर ममता को शिकस्त दे दी है। 42 लोकसभा सीटों वाले बंगाल में 2014 में 2 सीटों पर कब्जा जमाने वाली भाजपा 18 सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है जबकि 34 सीटों पर कब्जा करने वाली ममता बनर्जी नित तृणमूल कांग्रेस 12 सीटें खोकर 22 पर आ गई है।

सबसे बुरी दशा वाममोर्चा की है। राज्य में 34 सालों तक राज करने वाली वामपंथी पार्टियों का सूपड़ा साफ हो गया है। 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में देशभर में कांग्रेस की लहर के बावजूद पार्टी ने 6 सीटें जीत ली थी। लेकिन इस बार राज्य की 42 में से एक भी सीट पर खाता नहीं खोल सकी और अधिकतर सीटों पर तीसरे या चौथे नंबर पर रही है। जबकि कांग्रेस जिसने 2014 में 4 सीटें जीती थी, इस बार 2 पर सिमट गई है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा के लिए हमेशा बंजर रहने वाला बंगाल दिल खोलकर वोटों की बारिश वाली भूमि बन गया है?

● 2014 की तुलना में बढ़ा है ममता का मत प्रतिशत

सूबे में भले ही भाजपा ममता बनर्जी से 12 सीटें छीनने में सफल रही है लेकिन मत प्रतिशत पर गौर करें तो 2014 के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस के मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है। 2014 में तृणमूल कांग्रेस को 39.05% वोट मिले थे और 34 सीटों पर कब्जा जमाया था जबकि इस बार 43.28% वोट मिले हैं लेकिन सीटों की संख्या घटकर 22 हो गई है। तृणमूल कांग्रेस के वोट में 4.25% की बढ़ोतरी दर्ज की गई लेकिन 12 सीटें कम हो गई हैं।

भारतीय जनता पार्टी को 2014 में 17.02% वोट मिले थे और केवल 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि इस बार भाजपा का मत प्रतिशत बढ़कर 40.25% हुआ है और 18 सीटों पर कब्जा जमा चुकी है। यानी भाजपा के मत प्रतिशत में 23.23% की बढ़ोतरी हुई है और सीटें (16) बढ़ी हैं।

● माकपा का सूपड़ा साफ

मत प्रतिशत बढ़ने के बावजूद तृणमूल की सीटें घटने की आखिर क्या वजह हो सकती है? तो इसका जवाब है माकपा के वोटों का भाजपा की ओर खिसकाव। राज्य में 35 सालों तक शासन करने वाली वामपंथी पार्टियों की मुख्य पार्टी माकपा का मत प्रतिशत केवल 6.28% है और बाकी घटक दल जैसे फॉरवर्ड ब्लॉक (0.42), सीपीआई (0.40) और आरएसपी (0.36) का मत प्रतिशत जोड़े तो यह आंकड़ा बढ़कर 7.46% पर पहुंच रहा है। जबकि 2014 में यह 29.71% था। यानी माकपा का मत प्रतिशत 22.25% घटा है। इसीलिए सीटों के हिसाब से माकपा का सूपड़ा साफ हो गया है।

● कांग्रेस ने भी खोया है जनाधार

इसी तरह से कांग्रेस ने इस बार राज्य में 5.61% वोट हासिल किया है जबकि 2014 में कांग्रेस को 9.58% वोट मिले थे। यानी कांग्रेस के मत प्रतिशत में भी 3.97% की कमी आई है। इसीलिए कांग्रेस चार सीटों (बहरामपुर, जंगीपुर, मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण) में से केवल दो (बहराममपुर और मालदा दक्षिण) पर कब्जा रख सकी।

● नए मतदाताओं का वोट भाजपा को

भाजपा की बढ़त में बहुत हद तक नए मतदाताओं का भी हाथ है। अगर भाजपा और तृणमूल के बढ़े हुए मत प्रतिशत को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा है (23.23+4.25) 27.48%। इसी तरह से अगर माकपा और कांग्रेस के घटे हुए वोट को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा है 26.22% जो भाजपा और तृणमूल के बढ़े हुए मत से 1.26 प्रतिशत कम है। 1.26% मतदान उन युवाओं का है जिन्होंने पहली बार मतदान किया। चुनाव आयोग ने बताया था कि इस बार पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 12 लाख मतदाता पंजीकृत हुए थे जो राज्य की कुल आबादी (करीब 10 करोड़) के 1.2 फीसदी हैं।

तस्वीर स्पष्ट है कि माकपा और कांग्रेस का घटा हुआ वोट भाजपा और तृणमूल में विभाजित हो गया है। अब अगर पारंपरिक मतदाताओं की बात की जाए तो राज्य में कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं को तोड़कर ही ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी बनाई थी इसलिए बहुत हद तक यह संभव है कि तृणमूल का जो 4.25% मत बढ़ा है वह कुछ कांग्रेस और कुछ नए मतदाताओं से मिला है। नए मतदाताओं में से अधिकतर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किए हैं क्योंकि सबसे अधिक नए मतदाता सीमावर्ती क्षेत्रों में पंजीकृत हुए थे और भारत बांग्लादेश सीमा से सटे लोकसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी में बहुत अच्छी जीत हासिल की है।

इधर माकपा के मत प्रतिशत में आई पूरी कमी भाजपा के खाते में चली गई है। यानी राज्य में वामपंथी मतदाताओं ने पूरी तरह से टूट कर भाजपा के पक्ष में मतदान कर दिया और यही ममता बनर्जी के लिए जीती हुई सीटें भी हारने की वजह बनी है। लेकिन यह पहली बार नहीं होगा कि लेफ़्ट का वोटर भाजपा को वोट कर रहा है। अगर हम पिछले 20 सालों का रिकॉर्ड देखें तो हमें पता चलेगा कि लेफ़्ट का वोटर पिछले दस सालों में तृणमूल की तरफ़ भी खिसका है और भाजपा की तरफ़ भी मुड़ा है।

● 2014 में ही होने लगा था वामपंथी वोटों का पलायन

अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि जब पहली बार वामपंथी कार्यकर्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया था वह साल था 2014 का जब 2009 के मुक़ाबले वामपंथ का शेयर 13% गिरा (43 से 30) लेकिन तृणमूल का शेयर केवल 9% बढ़ा (31 से 40)। इसका मतलब क्या हुआ बाक़ी का 4% कहाँ गया? उस साल कांग्रेस का वोट शेयर भी पहले के मुक़ाबले 3% कम हुआ। स्पष्ट है कि लेफ़्ट और कांग्रेस का यह मिलाजुला 7% वोट जो तृणमूल में नहीं गया, भाजपा में गया जिसका वोट शेयर उस साल पहले के मुक़ाबले 11% बढ़ गया। यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो वामपंथियों ने ममता के हाथों 2011 में अपनी सरकार गंवाने का बदला भाजपा का साथ देकर लिया है। सबसे खास बात यह है कि अगर यहीं स्थिति बनी रही तो ममता के लिए 2021 का विधानसभा चुनाव काफी मुश्किल भरा होने वाला है।

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