साहित्यकारों को शब्द से आगे निकलना पड़ेगा :सुभाष राय




...........संतोष यादव,सुल्तानपुर
वरिष्ठ पत्रकार  सुभाष राय के अनुसार मौजूदा वक्त में बाजार के उजाले बीच गहरा अंधेरा है। एक शायर इसी की पहचान करता है। उन्होंने कहा कि कागज पर आग लिखने से आग नहीं लगती,आग के लिये सामग्री जुटानी पड़ती है। इसलिये आज के साहित्यकारों को शब्द से आगे निकलना पड़ेगा। जनता के आन्दोलन के साथ साहित्यकारों को खड़ा होना चाहिये।
       हास्य- व्यंग्य के मशहूर शायर जाहिल सुल्तानपुरी के अदबी सफ़र के पचास साल पूरे होने पर उनके सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए राय ने कहा कि जाहिल की रचनाएँ इस अँधेरे पर प्रहार करके उजाले की उम्मीद जगाती हैं। इस मौके पर उन्होंने जाहिल के काव्य संग्रह " ढाई आखर" और स्व. ताबिश सुल्तानपुरी के संग्रह " दोपहर का फूल" के हिंदी संस्करण का प्रसिद्ध कथाकार देवेन्द्र के साथ लोकार्पण किया।
    राय ने जाहिल सुल्तानपुरी को राजनीति की ठगी को उजागर करने वाला कवि बताते हुए कहा कि जाहिल जनता को प्रेम करना सिखाते है। प्रसिद्ध कथाकार देवेन्द्र  ने कहा कि सुल्तानपुर की चेतना महानगरीय साहित्यकारों से बहुत आगे है।महानगरीय साहित्यकार गोष्ठियों के नाम पर गप्प मारते है और छोटे शहरों के लोग साहित्य को हर पल जीते है एवं गोष्ठियों में गम्भीर रहते है। देवेन्द्र ने कहा कि आज साहित्य जनता से कट गया है। हिंदी के बड़े प्रकाशको पर महानगरो के लेखको का अधिपत्य बढ़ गया है। कस्बाई साहित्यकारो को अगर जगह मिल जाय तो हिंदी का भाग्य उदय हो जायेगा। उन्होंने कहा कि ताबिश सुलतानपुरी की पुस्तक को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करके सुलतानपुर ने साहित्य पर बड़ा उपकार किया है। जाहिल सुलतानपुरी पर अब साहित्य के आलोचकों का ध्यान जा रहा है यह काफी महत्त्वपूर्ण है ।
कृति पर चर्चा करते हुए आलोचक केएनआई महाविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ.राधेश्याम सिंह ने कहा कि जाहिल शब्दों के खिलाड़ी नहीं है, लेकिन लोकतत्व पर उनकी पकड़ जबरदस्त है । जाहिल की रचनाओं का सही मूल्यांकन तब होगा जब उनकी प्रौढ़ रचनायें सामने आ जाएंगी।उन्होंने कहा कि हिन्दी में ताबिश की रचनाओं के सामने आने से उनकी रचनाधर्मिता का विस्तार हुआ है।श्री सिंह ने कहा कि ठेठ अंदाज में अपनी बात कहना जाहिल की विशेषता रही, शब्दों को वे जीना जानते है।जाहिल ने कभी अपने को बड़ा घोषित नही किया।अवधी साहित्यकार जगदीश पीयूष ने कहा कि जाहिल सुल्तानपुरी सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने वाले कवि है। इससे पूर्व अदबी सफर के पचास साल पूरा करने पर जाहिल सुल्तानपुरी को ललिता तिवारी स्मृति न्यास  की तरफ से पच्चीस हजार रुपये की धनराशि,सम्मान पत्र,अंगवस्त्रम् आदि उपहार देकर मुख्य अतिथि सुभाष राय ने सम्मानित किया।
स्व. ताबिश सुलतानपुरी को याद करते हुये उनका  सम्मान उनके पुत्र अंजुम फरोग सिद्दीकी को कथाकार देवेन्द्र ने प्रदान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जाहिल सुल्तानपुरी के गुरु डॉ त्रिभुवन नाथ चौबे ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि गुरु शिष्य से हारना चाहता है।जाहिल को आगे जाता देखकर प्रसन्नता है। उनके प्रति प्रगाढ़ प्रेम ने ही मुझे इस उम्र में भी आने को विवश किया। कार्यक्रम अध्यक्ष ने जाहिल के कालेज में बिताये दिनों को स्मृतियाँ भी ताजा करते हुए कहा कि भारत की साझा संस्कृति में आस्था रखने वाले जाहिल सुल्तानपुरी सर्व धर्म समभाव के अलंबरदार है। समारोह में डॉ.ए.के.सिंह ,डॉ रमेश ओझा, डॉ सुधाकर सिंह ,डॉ.दीपक मेहरोत्रा , डॉ.राजेन्द्र कपूर ,डॉ.सुभाष, समाजसेवी करतार केशव यादव, माबूद अहमद  छत्तीसगढ़ के यूनीवार्ता प्रभारी अशोक साहू, सत्य नरायन रावत,जिला सुरक्षा संगठन के महासचिव सरदार बलदेव सिंह, कमल नयन पांडेय ,डॉ डीएम मिश्र,डॉ. आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप',डॉ.सुशील कुमार पाण्डेय, ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ,डॉ. ओंकार नाथ द्विवेदी,सपा जिलाध्यक्ष प्रो0 राम सहाय यादव,वरिष्ठ भाजपा नेता डा.एम.पी.सिंह दर्शन साहू, लक्मण गांधी, राकेश तिवारी आदि मौजूद थे। आयोजक पत्रकार सत्य देव तिवारी ने आभार प्रदर्शित किया।

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