"सपा के पूर्व विधायक अरुण वर्मा भाजपा के मददगार!




..........संतोष यादव,सुल्तानपुर
यूपी में अखिलेश यादव अपनी पार्टी को 2019 के मुकाबले तैयारी में लगे है, तो यहाँ उनके अपने ही लोग धोखा दे रहे है। पार्टी में रहकर पार्टी को कमजोर करने में कोई कसर बाकी नही लगा रहे। सुल्तानपुर जिले की सदर विधानसभा से विधायक रहे अरुण वर्मा ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।जिस भाजपा को सपाई व उनके नेता पानी पी पी कर कोसते है उसी भाजपा की यहाँ सपाई मददगार है।सदर विधान सभा के मोतिगरपुर ब्लाक पर सपा जिलाध्यक्ष प्रो0 रामसहाय यादव के बेटे डॉ0 श्रवण यादव ब्लाक प्रमुख थे। साल भर पहले चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबलें में 23 मत पाकर वह ब्लाक प्रमुख चुने गए थे।पहले टिकट की जद्दोजहद फिर जीत की मारामारी साल भर बाद अविस्वास का सामना यह सब चुनौतियां श्रवण यादव के सामने उनके अपनों ने ही पैदा की थी धीरे धीरे अब उजागर होने लगा है।समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष के बेटे ब्लाक प्रमुख श्रवण के खिलाफ भाजपा सरकार बनते ही भाजपाई उन्हें पदच्युत करने का ताना बाना बुनना शुरू कर दिए थे लेकिन सफलता हाथ नही लग रही थी इधर जब सपा में उनकी सेंध मारी हुई तो काम आसान हो गया।परदे के पीछे रहकर भाजपाइयों ने बीते ब्लाक प्रमुख चुनाव में रनर रहे बसपा के उमेश सिंह व कांग्रेस के अभिषेक सिंह के साथ मिलकर प्रमुख के खिलाफ अविस्वास प्रस्ताव लाने की साजिश रची इस अभियान में सपा के पूर्व विधायक अरुण वर्मा के समर्थक भी साथ हो लिए तो बिपक्षियों के हौसले और बुलंद हो गए।सपा सूत्रो की माने तो पूर्व विधायकअरुण वर्मा शुरू से ही श्रवण यादव की खिलाफत में रहे। इस ब्लाक से तीन लोगों ने पार्टी समर्थन से ब्लाक प्रमुख चुनाव लड़ने का आवेदन किया था उसमें जिलाध्यक्ष के बेटे डॉ0श्रवण यादव जिलाउपाध्यक्ष किशन यादव की पत्नी सरोजा यादव एवं महेंद्र सिंह का नाम शामिल था। पूरे जिले के जब सभी ब्लॉकों से प्रत्याशियों की घोषणा हुई तो मोतिगरपुर की घोषणा रोक दी गई। इससे आहत जिलाध्यक्ष ने खुद ही पार्टी के जिम्मेदार नेताओं से मिलकर चुनाव लड़ने से मना करदिया था इस बात की जानकारी जब सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव तक पहुंची तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि वहां से जिला अध्यक्ष का लड़का ही चुनाव लड़ेगा।तब विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी थी।सूत्रों की माने तो परदे के पीछे से क्षेत्रीय विधायक की ही चाल थी।वे इन्हीं दावेदारों में से हुए अपने खासमखास चेहरे को टिकट दिलाना चाहते थे। लेकिन शीर्ष नेतृत्व के आगे उन्हें कदम पीछे खींचना पड़ा।इस ब्लॉक से निर्वाचित पचास बीडीसी सदस्यों में जातीय समीकरण में आठ ब्राह्मण छः यादव तेरह क्षत्रिय एक मुस्लिम तेरह दलित दो वर्मा सात अन्य पिछड़ा वर्ग के बीडीसी निर्वाचित हुए थे। सदर विधानसभा क्षेत्र से सटी लम्भुआ व कादीपुर विधानसभा से तत्कालीन सपा विधायक संतोष पांडेय एवं राम चंदर चौधरी एमएलसी शैलेंद्र प्रताप सिंह व तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक अरुण वर्मा सहित चारों विधायकों को अपने अपने सजातीय बीडीसी को सपा के पक्ष में लाने की जिम्मेदारी मिली थी लेकिन विधायक अरुण वर्मा अपने दोनों सजातीय मत सपा के पाले में नही ला सके।अपने क्षेत्र में अन्य जनप्रतिनिधियों की यह दखल अरुण वर्मा को नागवार गुजरी।
50 बीडीसी सदस्यों वाली मोतिगरपुर ब्लॉक सदर विधानसभा का हिस्सा है।अरुण वर्मा 2012 में यहाँ से विधायक चुने गए थे।2017 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी सीताराम वर्मा से हार गए थे।वर्ष भर पूर्व हुए ब्लाक प्रमुख चुनाव में सपा के श्रवण यादव त्रिकोणीय मुकाबले में ब्लाक प्रमुख निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सीताराम वर्मा जब यहाँ से विधायक बने और सूबे में उनके दल की सरकार बनी तभी से भाजपाइयों की निगाह सपा जिलाध्यक्ष के बेटे की कुर्सी पर टिक गई थी। जब सपा के लोगों का साथ मिला तो भाजपा की योजना परवान चढ़ी। सुनियोजित ढंग से एक बीडीसी सदस्य पूनम सिंह का इस्तीफा दिलाया गया।माना यह जा रहा है कि पूनम सिंह के इस्तीफे से रिक्त वार्ड से भाजपा विधायक सीताराम वर्मा के प्रतिनिधि लाखन सिंह चुनाव लड़ेंगे।उन्ही के लिए यह सीट खाली कराई गई है। भविष्य में ब्लाक प्रमुख पद के लिए भाजपा से वही उम्मीदवार होंगे। सपा के अंदरखाने चल रही बगावत व भाजपा के गलबहियां करने की दुर्गन्ध जब बाहर आई तभी जिलाअध्यक्ष प्रो0 राम सहाय यादव पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ जाकर इसकी जानकारी अखिलेश यादव को दी थी जिस पर अखिलेश यादव ने बगल बैठे प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम से अरुण वर्मा को फोन कर अविस्वास प्रकरण पर जिलाध्यक्ष के साथ रहने को कहा था। लेकिन अपनी शिकायत से खार खाये अरुण ने वही किया जो मन में था।चार अक्टूबर को अविश्वास की तिथि निर्धारित थी। तीन अक्टूबर की रात्रि तक पूर्व विधायक जिलाअध्यक्ष को मदद का भरोसा देते रहे लेकिन मदद तो दूर की बात रही सुबह ब्लॉक पर उनके समर्थक बीडीसी ब्लाक पहुँचकर अबिस्वास के पक्ष में मतदान कर दिया।यहाँ कुल 50 में से 31सदस्य सदन में आये जिनमें 30 ने अविस्वास के पक्ष में 1ने विरोध में मतदान किया।

*सपा के खिलाफ भाजपा से पहले बसपा का भी साथ दे चुके है पूर्व विधायक अरुण वर्मा*
पूर्व विधायक अरुण वर्मा भाजपा के पहले अपनी पार्टी के खिलाफ बसपा का साथ भी दे चुके हैं। अखिलेश के करीबी होने का दम्भ भरने वाले अरुण की पार्टी में रहकर पार्टी को कमजोर करने की पुरानी फितरत रही है। इस बार सपा के मुकाबले भाजपा का साथ देने वाले पूर्व विधायक इसके पहले पार्टी के खिलाफ बसपा की भी मदद कर चुके हैं। सपा के जिला सचिव रामप्रताप यादव वर्ष 2012 में बसपा के इसी ब्लाक के तत्कालीन ब्लाक प्रमुख राम मूर्ति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की थी तो शुरू में तत्कालीन विधायक अरुण वर्मा ने साथ देने का भरोसा दिया था लेकिन एन वक्त पर अपनी पार्टी के जिला सचिव का साथ देने की जगह बसपा के ब्लाक प्रमुख रहे राम मूर्ति के साथ खड़े हो गए। नतीजा यह हुआ कि राम मूर्ति की कुर्सी तो बच गई लेकिन रामप्रताप को आर्थिक-राजनीतिक क्षति उठानी पड़ी ।रामप्रताप यादव ने अपनी हार का ठीकरा विधायक के सर फोड़ा। प्रदेश कार्यालय तक इसकी शिकायत पहुंचाई हलाकि मामला रफा दफा हो गया। इधर बीते त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में लम्भुआ से जिला पंचायत का चुनाव लड़ रहे सपा युवजन सभा जिलाध्यक्ष परमात्मा यादव के खिलाफ भी अरुण वर्मा पर अपने एक सजातीय उम्मीदवार की मदद का आरोप लगा था।नतीजा यह हुआ कि यहाँ से परमात्मा यादव चुनाव हार गए।यही नही करौंदीकला से पार्टी के ब्लाक प्रमुख पद के लिए घोषित प्रत्याशी शिवप्रसाद यादव के खिलाफ भी अरुण पर बसपा प्रत्याशी की मदद का आरोप लगा था इस भितरघात के चलते पार्टी प्रत्याशी शिव प्रसाद यादव एक वोट से चुनाव हार गए थे।अरुण वर्मा की कार्यशैली से और भी कई सपाई चेहरे है जिनमे विरोध के स्वर प्रस्फुटित होने लगे है।कुछ तो इनकी वजह से सपा से दूर भी हो रहे है। इसी सदर विधान सभा से विधायक रहे पूर्व मंत्री राम रतन यादव की गणना यहाँ जमीनी नेताओं में होती है 2017 के विधानसभा चुनाव के मध्य में पूर्व मंत्री सपा छोड़कर बसपा में चले गए इसके पीछे की वजह उन्होंने विधायक की कार्यशैली बताया था।
*सत्ता जाते ही समाजवादी पार्टी से मोहभंग*
ब्लाक प्रमुख पद के लिए सपा से टिकट चाहने वालों का सत्ता जाते ही सपा से मोह भंग हो गया।कल तक जो चेहरे सपा में जीने मरने की कसमें खाया करते थे आज वही सत्ता जाते ही भाजपा खेमे में जा खड़े हुए। समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष किशन यादव की पत्नी सरोजा यादव समाजवादी पिछड़ा वर्ग संघ के जिलाअध्यक्ष राम मूर्ति निषाद की पत्नी साथ ही सपा के सक्रिय सदस्य पूर्व में पार्टी से प्रमुख पद के लिए उम्मीदवारी करने वाले महेंद्र सिंह ने भी समाजवादी पार्टी के खिलाफ मतदान किया।
*भूल गए अखिलेश यादव के एहसान,सपाई ही खड़ा कर सवाल*
सपा कार्यकर्ता पूर्व विधायक की कार्यशैली को लेकर सवाल खड़ा कर रहे है।एक बुजुर्ग का कहना था कि अखिलेश यादव ने 2012 के चुनाव में कार्यकर्ताओं के विरोध को दरकिनार कर कम उम्र में ही सदर सीट से टिकट देकर अरुण को विधायक बनाया था। अरबो रूपये विकास के लिए दिए थे। जब विधायक पर एक युवती से बलात्कार बाद हत्या का आरोप लगा तो उसे भी दरकिनार कर 2017 के चुनाव में 25 साल की उम्र में ही दुबारा टिकट दिया। यही नही दो बार माननीय अखिलेश जी चुनाव प्रचार करने भी आये फिर भी 25 हजार वोट से अरुण हार गए। वह बुजुर्ग नेता यही नही रुका कहा कि विधायक रहते अरुण वर्मा अपनी विधान सभा अन्तर्गत आने वाले तीन ब्लाक कूरेभार जयसिंहपुर मोतिगरपुर में ब्लाक प्रमुख पद पर एक भी प्रमुख न जिता पाये। पार्टी के जिलाध्यक्ष प्रोफेसर राम सहाय यादव के वेटे श्रवण यादव एक पड़ोसी विधान सभा क्षेत्र के विधायक संतोष पांडेय व एमएलसी शैलेन्द्र प्रताप सिंह राम चंदर चौधरी व पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं पदाधिकारियों की मदत से मोतिगरपुर के ब्लाक प्रमुख बन गए थे।हमारी विधान सभा के तीन ब्लाक में से एक ही पर पार्टी का ब्लाक प्रमुख था उसे अपनों ने ही हटा दिया।
*अपनों ने ही दिया धोखा-सपा जिलध्यक्ष*
बेटे का ब्लाक प्रमुख पद जाने के बाद भी सपा जिलाध्यक्ष प्रो0 रामसहाय यादव अपनी जुबां खोलने को तैयार नही है।काफी कुरेदें जाने के बाद इतना ही बोले कि कुर्सी जाने का गम नही है अपनों ने पीठ में छूरा घोपा कष्ट इस बात का है।वही ब्लाक प्रमुख रहे जिलाध्यक्ष के बेटे डॉ0 श्रवण यादव पूर्व विधायक पर भाजपा के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप लगाया और कहा राष्ट्रीय अध्यक्ष को इससे अवगत कराएंगे।
अरुण वर्मा से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उनका फोन ही नही उठा।

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