काशी मंथन : भारतीय पहचान- एक निरंतर यात्रा व खोज



काशी,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शताब्दी कृषि प्रेक्षागृह में काशी मंथन की ओर से 'भारतीय पहचान- एक निरंतर यात्रा व खोज' विषय पर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद आरिफ़ मोहम्मद खान के वक्तव्य का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में आरिफ़ मोहम्मद खान ने भारतीय संस्कृति की परंपरा कुछ मूल बिंदुओं में निरूपित होते हुए भी निरंतर प्रवाहमान है, इसकी इसी विशेषता के कारण ये कभी मृतप्राय या अवरुद्ध नहीं हुई। भारतीय संस्कृति की इसी ख़ूबी को अल्लामा इक़बाल ने बड़े सुंदर शब्दों में लिखा है कि 'यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा'। औपनिवेशिक काल में भारतीय संस्कृति को समझने के क्रम में भूल ज्यादा हुई धर्म का अनुवाद रिलिजन कर दिया गया, लेकिन जब आप इनके अर्थों को समझने का प्रयास करेंगे तो इसमें कोई साम्य ही नहीं।

ऋग्वैदिक ऋचा को संदर्भित करते हुए उन्होंने कहा कि ये धरती ये ब्रम्हाण्ड किसने बनाया इसे कौन चला रहा है? क्या ऊपर कोई है जो इसे चला रहा है या वो भी ये सोच रहा कि ये ब्रम्हाण्ड कौन चला रहा है? इन ऋचाओं में लिखी पहेली को जब आप समझने का प्रयास करेंगे तो ये आपके आध्यात्मिक विकास, आपके वैज्ञानिक विकास दोनों में मदद करेगी। इस संस्कृति में किसी को पराया नहीं समझा गया, अच्छे विचार जिनसे भी मिले, जहाँ से भी मिले उन्हें पूरी सहृदयता के साथ अपनाया गया। भारतीय संस्कृति इसकी भाषा आदि सबको समझने में लगातार भूल हुई उदहारण के लिए 'दान'। दान का अनुवाद चैरिटी कर दिया गया लेकिन क्या इसकी भावना का अनुवाद हो पाया। दान को भारतीय परिप्रेक्ष्य से समझें तो ये खुद को मिले आशीर्वादों को दूसरों से साझा करना होता है। जबकि पश्चिमी समाज में इसे खुद के संसाधनों में से दूसरों को हिस्सा देना। मुझे नहीं लगता इस दुनिया में किसी भी भाषा के शब्दों का अनुवाद दूसरी भाषा में उसके असल मायनों, भावनाओं में संभव है। कन्फ्यूसियस ने भी कहा है - सही शब्दों का चयन कर्मों का सार है।

कपिलदेव आहूति संवाद में एक प्रसंग है जिसकी शिक्षा है हर जीवंत आत्मा को ऐसे देखो जैसे मंदिर है, क्योंकि भगवान हर किसी के अंदर है। जो सम्मान, जो प्यार आप भगवान को देते वो हर जीवात्मा को दीजिये। हमें सबसे पहले ये समझने का प्रयास करना होगा कि हम अपनी पहचान को कैसे समझना चाहते हैं? भारत ने एक राष्ट्र के तौर पर हमें कैसे समझा होगा? भारत ने शायद उत्तर में हिमालय, दक्षिण में सागर और और इसके बीच के भूभाग में बसने वाले बच्चों को भारतीय समझा होगा।

आपको इस देश की संस्कृति समझनी है तो देखिए इसकी परम्पराओं को यहाँ राजाओं से ज्यादा ऋषियों का सम्मान रहा है। भारतीयों में राज से ज्यादा त्याग के प्रति आकर्षण रहा है। हमारे आदर्श वो रहे हैं जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर अपना जीवन ज्ञान, अध्यात्म की साधना में लगा दिया। हाल-फिलहाल में डॉ• कलाम इसके बड़े उदाहरण रहे। हमें ये भी समझना होगा कि हमारी संस्कृति की विविधता, विभिन्नता नहीं। इसने हमें कमजोर नहीं बल्कि ताकतवर बनाया। मैंने देखा है उत्तर भारत के शहरों कस्बों में कैसे महिलायें शुक्रवार को मस्जिद से निकलते हुए नमाजियों से अपने बच्चों को फूँकवाना चाहती ताकि उनके रोग दूर हों, उनके ऊपर नेमत रहे। बताइये ये विविधता हमारी कमजोरी है क्या? ये तो एक संस्कृति के तौर पर हमारे हृदय की विशालता को दर्शाता है।

हमें अपने अंदर के हीनता बोध को खत्म कर अपने संस्कृति को समझने का नज़रिया विकसित करना होगा। हमारे यहाँ मुसलमान तेज़ी से अरबी संस्कृति के तरफ आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन अपनी अरबी, फारसी संस्कृति में भारतीय संस्कृति की अहमियत कितनी है इसे आप समझना चाहते हो तो आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पंचतंत्र उनके यहाँ सबसे ज्यादा प्रचलित किताबों में से एक है।

हम कहते हैं कि भारत विश्व गुरु था या ये फिर बनेगा लेकिन इसके साथ हम ये भूल जाते हैं कि ये वापस विश्वगुरु बनेगा कैसे इसके लिए हमें क्या करना होगा? पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्से से अध्ययन के लिए लोग भारत आते थे, भारतीय संस्कृति के अध्ययन के लिए नहीं बल्कि अपने स्थानीय संस्कृति, परम्पराओ के अध्ययन के लिए। हमें वापस से अपनी क्षमताओं को ऐसा बनाना होगा तभी हम विश्वगुरु बन पाएंगे। हमारे देश में तो ऐसे महात्माएँ पैदा हुई जिन्होंने कहा कि देह तो सिर्फ एक पड़ाव भर है, आत्मा चैतन्य है। हमें उस चैतन्यता को पाना है लेकिन हम तो भौतिकताओं में ही उलझे रह जाते हैं।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में वरिष्ठ पत्रकार व फर्स्टपोस्ट हिंदी के सलाहकार संपादक अजय सिंह ने आरिफ मोहम्मद खान से भारत की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की। जिसमें ट्रिपल तलाक से लेकर भारतीय राजनीति के विभिन्न दौरों की चर्चा की। शाहबानों प्रकरण और अयोध्या के ताले खुलने के घटनाओं पर बेबाकी से बोलते हुए उन्होंने कहा कि ये दोनों घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं, राजीव गांधी के समय ये डील का हिस्सा थी जिसे इंद्र मल्होत्रा, बिपन चंद्रा, रामचंद्र गुहा ने अपनी किताबों में विस्तार से उल्लेखित किया है। राजनीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कोई कहता है कि वो आपके हालात बदल सकता है तो वो गलत है। आपके हालात सिर्फ आप बदल सकते हैं, ये आपके हाथ में है। शिक्षा वो ताक़त है जिससे आप सब बदल सकते हैं।

इस अवसर पर अथितियों व श्रोताओं का स्वागत काशी मंथन के संयोजक व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त कुलसचिव मयंक नारायण सिंह ने "हाऊज द जोश" बोलते हुए कहा जिसपर श्रोताओं ने पूरी जिंदादिली के साथ "हाई सर" नारे से उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि काशी मंथन का लगातार यह प्रयास है कि हम अपने देश, अपने समाज इसकी संस्कृति को समझने के लिए अपनी अंतर्दृष्टि विकसित करें।

कार्यक्रम के अंत में डॉ• धीरेंद्र कुमार राय ने कार्यक्रम का सारांश पेश किया। इस अवसर पर कार्यक्रम का संचालन चंद्राली मुखर्जी व धन्यवाद ज्ञापन डॉ• सुमिल तिवारी ने किया। अदीति सिंह, विक्रान्त कुश्वाहा, हर्षित श्याम जायसवाल, विशाल सिंह, पंकज सिंह, राज दुबे, रजीत बघेल, अभय ठाकुर, राहुल सिंह सहित प्राध्यापक, विद्यार्थी उपस्तिथ थे।

ताजा समाचार

National Report



Image Gallery
इ-अखबार - जगत प्रवाह
  India Inside News