सोनभद्र,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
सोनभद्र की आदिवासियों की समस्या पर बनी 46 मिनट की टेलीफिल्म, सोनांचल की दृश्य को पुनर्जीवित जर देता है, भू माफियाओं के चंगुल में फसा मंगरु अपनी जमीन को बचाने में मुंह का निबाल भी बेचने को मजबूर हो जाता है, पग पग पर सभ्य लोग इनका शोषण करते है। आखिर में न्याय मांगते मांगते न्याय का सांझ हो जाता है, ये आदिवासी इसी को अपनी नियति समझ लेते है।
उभ्भा की वर्तमान घटना को समझने के लिए ये फ़िल्म एक उदाहरण है। जब सोनभद्र में जमीन बंदोबस्त करने के लिए एक सर्वे सेटलमेंट एजेंसी बिठाई गयी थी जिसने बाहरी दबंग, सफेदपोशों, कथित समाजसेवियों के लिए ही काम किया, निरीह, भोले भाले आदिवासियों को उनके ही हाल पर छोड़ दिया बदले में प्रकृति पदत्त भूमि जिस से वे लकड़ी काटकर, मकई उपजाकर, महुआ बीनकर गुजर करते, विषम परिस्थिति में घास की रोटी खाते, गंदे नाले की पानी पीते ..वो आखिर निवाला भी छीन कर अमीरों को देने लगे, और अति तो तब हो गयी जब इन्हें ही नक्सल समझने लगे। देश की मुख्य समाज से दूर ये आदिवासी आज भी इन समस्याओं से जूझ रही है।
सोनभद्र के पत्रकार नितेश भारद्वाज द्वारा लिखित निर्देशित फिल्म "सांझ भईल" में आदिवासियों के कई बुनियादी समस्याओं को दिखाने का प्रयत्न किया गया है, जिसे सरकारी महकमा चाहकर भी दूर नही कर रही।
विश्व आदिवासी दिवस पर यह फ़िल्म यूट्यूब चैनल भारद्वाज टेलीमीडिया पर रिलीज किया गया है, 2004 में बनी यह फ़िल्म आज भी उस दर्द को ठीक ठीक बयां कर रही है, इस फ़िल्म में सभी कलाकार स्थानीय है जिनमे पंडित राजेन्द्र उपाध्याय, स्व• प्यारेलाल, विष्णुकुंवर, डॉ• अश्विनी सहाय, अनिल राय आदि कई कलाकार ने अपना योगदान दिया है।
● सांझ भईल
https://youtu.be/5vd7tVf3bGo