दीदी से साहित्य लेखन के दलित लेखक ने मांगा समय



रंजीत लुधियानवी,
कोलकाता, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

दलित साहित्यकार मनोरंजन बैपारी बच्चों के लिए भोजन बनाने का काम करते हैं। एक समय था जब काम के साथ ही वे लेखन का काम भी करते रहते थे। लेकिन अब लेखन के लिए फुर्सत ही नहीं मिलती। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से राज्य के लोगों की शिकायतें और सुझाव मांगने के लिए दीदी के बोल नामक कार्यक्रम की शुरुआत की गई है, जिसमें अभी तक पांच लाख से ज्यादा लोगों ने फोन, इंटरनेट के माध्यम से दीदी तक अपनी आवाज पहुंचाई है। इसमें रसोइया लेखक भी शामिल है, उन्होंने लेखन के लिए अवकाश की मांग की है। दीदी उनकी बात सुनती हैं या नहीं, यह तो बाद की बात है। लेकिन इस आवाज से लेखक की पारिवारिक हालत का पता चलता है कि पेट की आग बुझानेके लिए किस तरह लोग कलम से दूर चले जाते हैं।

खुद को श्रमजीवी लेखक बताने वाले मनोरंजन द हिंदू एवार्ड से लेकर राज्य सरकार का पश्चिम बंग बांग्ला अकादमी, एक प्राइवेट चैनल का अनन्य सम्मान समेत छोटे-बड़े कई पुरस्कार जीत चुके हैं। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाएं पढ़ाई जाती हैं। इतना ही नहीं इतिवृत्ते चंडाल जीवन और बातासे बारूदेर गंध नामक उनके दो उपन्यासों का तो अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ है। बारूदेर गंध उपन्यास तो नौ भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

दक्षिण चौबीस परगना जिले के सोनारपुर थाना इलाके के खुदीराम बसु रोड के रहने वाले मनोरंजन के जीवन में बीते सालों के दौरान कई तरह के परिवर्तन आए हैं, लेकिन उनका पेशा नहीं बदला। 1997 में सरकारी सहायता प्राप्त मुकुंदपुर हेलन केला के मूक-बधिर विद्यालय में एक साधारण रसोइए के तौर पर उन्होंने काम शुरू किया था। आज भी वे वहां प्रतिदिन 150 बच्चों के लिए भोजन बनाते हैं। साल भर प्रतिदिन उन्हें 8 से लेकर 10 घंटे तक काम करना पड़ता है। 50 पार लेखक का यह पहला साल है, जब किसी पूजा विशेषांक में उनकी कोई कहानी या उपन्यास नहीं प्रकाशित हो रहा है। इसके कारण वे दुखी हैं।

उनका कहना है कि पहले जब उम्र कम थी, खाना बनाने का काम पूरा करने के बाद लिखने बैठ जाता था। लेकिन अब लिखने की हिम्मत नहीं होती। चार बड़े चुल्हों के सामने दो बार का भोजन बनाने के बाद लेखन के लिए मानसिक और शारीरिक क्षमता नहीं बचती है। इसके अलावा मेरे दोनो घुटने का आपरेशन भी हुआ है। प्रेशर और सुगर की बीमारी ने भी जकड़ रखा है। इसके साथ ही आंख का भी आपरेशन हुआ है। ऐसे में रसोई का काम करने में समस्या हो रही है, लेकिन कोई मुझे दूसरा काम देने के लिए तैयार नहीं है। बीमारी के कारण कई दिन तक छुट्टी की, जिससे वेतन भी नहीं मिला था। परिवार चलाने के लिए मजबूर होकर दोबारा भोजन बनाने लगा हूं।

मुख्यमंत्री के सचिव से लेकर राज्यपाल तक गुहार लगाई है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब सोशल मीडिया में दीदी के बोल कार्यक्रम में अपनी आवाज पहुंचाई है। उनकी पुकार काफी वायरल हुई है, लोगों ने उनके पोस्ट को शेयर भी किया है। उनकी आवाज फिजाओं में गुंजने लगी है और दलित लेखक को उम्मीद है कि शायद उन्हें लिखने के लिए कुछ समय मिल जाए और दीदी रसोइए के बजाए किसी और काम को सौंपे।

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