हरित क्रांति ने धरती का पानी सोख लिया है : डॉ• कन्हैया सिंह



लखनऊ,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।

हरित क्रांति ने धरती का पानी सोख लिया है। रसायनों से धरती बंजर होती जा रही है। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैया सिंह ने कृषि के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था नेफेड के तत्वावधान में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में आयोजित ‘हरित क्रांति के पश्चात किसान और किसानी’ विषयक एक संगोष्ठी में व्यक्त किया। डॉ• कन्हैया सिंह ने महात्मा गांधी की इस बात का समर्थन किया कि यंत्र विष-यंत्र हैं। उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिक, कवि व लेखक डॉ• रामकठिन सिंह के लेखन ही नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन में पूरा गंवई-गंध मिलती है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में न्यायमूर्ति डी• पी• सिंह ने कहा कि जिस देश में शिक्षकों का सम्मान नहीं होता वह देश विकास नहीं कर सकता है। मैं मानता हूँ कि शिक्षकों को अधिकतम सुविधाएँ मिलनी चाहिए। आज आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। शासन ही तय करता है कि इस देश को हमें किस तरह बनाना है। मैं कहता हूँ कि जमींदारी प्रथा अभी किसी ना किसी रूप में आज भी जारी है। उन्होंने कई अनुभव बाँटे। उन्होंने कहा कि प्रदूषण हमें लगातार नुक़सान पहुँचा रहा है। पानी में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ती जा रहा है। पश्चिम के देशों में इस मामले बहुत तगड़ा जुर्माना है, पर अपने यहाँ सब अच्छी चीज़ें भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।

इस अवसर कृषि वैज्ञानिक और साहित्यकार डॉ• रामकठिन सिंह की पुस्तक ‘गाँव, किसान और मैं’ का विमोचन भी हुआ।

‘हरित क्रांति के पश्चात किसान और किसानी’ विषयक हुई इस संगोष्ठी में बड़ी सार्थक चर्चाएँ हुईं। कृषि वैज्ञानिक व विशिष्ट अतिथि डॉ• ए• के• सिंह ने कहा कि रासायनिक खाद डालने से कोई बीमारी नहीं होती है। श्री सिंह ने कहा कि यूरोप में तो भारत की तुलना में कई गुना उर्वरकों का प्रयोग किया जाता और इसका कोई पुख़्ता सबूत नहीं मिलता कि रासायनिक खादों से कैंसर जैसी घातक बीमारियाँ होती हैं। किसानों को बाज़ार को देखते हुए काम करना चाहिए उसमें निजी किसान संगठन बहुत प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

किसानों समस्याओं पर अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि आज किसानों की वही स्तिथि है जो आज के बदलते परिवेश में मां-बाप की हो रही है। उन्होंने कहा कि कितना आशावादी हो जाइए फिर भी यह भ्रम ही लगता है। ज़मींदारी प्रथा तो किसानों के लिए काला समय था। वह बड़े दुर्दिन भरे दिन रहे हैं। किसानों पर तब कितने कर लगते थे।उन्होंने कहा कि भारत सोने की चिड़िया कभी नहीं था। यह गीत-कविताओं में रहा होगा तो रहा होगा। उन्होंने सवाल किया कि आख़िर स्वाधीनता के बाद तो कम से कम किसानों की हालत बदलनी चाहिए, लेकिन क्यों नहीं बदली?

उन्होंने कहा कि खेत में किसान की उपज की क़ीमत औने-पौने दामों में ख़रीदा जाता है। शिवमूर्ति ने कहा कि जितना संगठित किसानों के शोषक हैं, उतना किसान नहीं हैं। किसान की हालत पहले से ही ख़राब है, आज भी बहुत अच्छी नहीं है। उन्होंने मीडिया और नेताओं, दोनों के लिए कहा कि ये दोनों कोई किसान के साथ नहीं हैं। शिवमूर्ति ने कहा कि मीडिया की नज़र में ‘कुत्ते का रेस्क्यु आपरेशन’ किसान समस्याओं से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसानों की फ़सलों का ‘मिनिमम स्पोर्ट प्राइज़’ लागू होती है जबकि अन्य उत्पादों का अधिकतम खुदरा मूल्य दिया जाता है। यदि किसानों की मेहनत का ही उचित मूल्य नहीं मिलेगा तो जितना अधिक वह उत्पादन करेगा, उतना ही घाटा सहन करेगा। आश्चर्य है किसान के लिए सेंसेक्स नहीं सल्फ़ास की गोली है। वे एक गीत का उद्धरण देते हैं, “देसवा होइ गा सुखारी, हम भिखारी होइ गय ना....” किसान का दर्द अकथ कहानी है।

कहानीकार डॉ• देवेन्द्र ने कहा कि यह किताब उस समय आयी है जब गाँव-किसान संसद और साहित्य यह विषय लगभग ग़ायब है। उन्होंने कहा कि यह किताब ग्राम्य-जीवन का ऐक्स-रे रिपोर्ट सरीखी है।

डॉ• रामकठिन सिंह ने कहा कि ज़्यादातर किसान पेशेवर तरीक़े से खेती नहीं करते हैं। यदि पेशेवराना तरीक़े से किया जाय तो उत्पादन दोगुना हो सकता है। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के बाद सकारात्मक बदलाव तो हुए ही, इसी के साथ चुनौतियाँ भी खड़ी हुईं। पर्यावरण बदलाव बड़ी चुनौती है।

कमलेश राय ने किसान-पीड़ा को रेखांकित करता “विधिना खेतवे में पसरा परान....”भावपूर्ण गीत भी सुनाया।

इस अवसर पर सब्ज़ी विज्ञान के विशेषज्ञ हरिहर राम, डॉ• अमिता दुबे आदि ने अपने विचार रखे।

इस अवसर पर विधि-वेत्ता से लेकर साहित्यकार, कृषि वैज्ञानिक, पत्रकार और किसानों ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन डॉ• शिवमोहन सिंह और धन्यवाद ज्ञापन कमलेश राय ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में किसान, साहित्य प्रेमी व गणमान्य जन शामिल हुए।

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