जनकवि को याद करते



---के• विक्रम राव, अध्यक्ष - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

5 नवम्बर 1998 को बाबा नागार्जुन अनंत में विलीन हो गये थे। मगर यादों में बने हैं। मौजूदा माहौल में तो विशेषकर। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी पर अक्सर कड़कती पंक्तियाँ लिखने वाले बाबा नरेंद्र मोदी पर भी अपना गुस्सा आज व्यक्त करते। पर तनिक नरमी से, क्योंकि मोदी उठे हैं अभावों से। अन्य की भांति अमीरी से, पैराशूट से नहीं उतरे हैं।

उस दिन, करीब तीन दशक बीते, दिल्ली से हम चार चंडीगढ़ में एक श्रमजीवी पत्रकार अधिवेशन में शिरकत करने सड़कमार्ग से चले। पानीपत के पास पता चला बाबा नागार्जुन की तक़रीर हो रही थी। हम सब श्रोताओं में शामिल हो लिए। स्थानीय भाषा पर बाबा की टिप्पणी बड़ी निश्छल लगी। वे बोले, “पूरब से जब हिंदी चली थी तो गाढ़ी दाल जैसी थी। आते-आते फीकी हो गई।” हमने कान लगाकर सुना। जयदेव और विद्यापति की ललित कोमलकांत पदावली के निष्णात बाबा ने ‘त, थ, ध’ के स्थान पर “ट, ढ, ण” के उचारण का जिक्र किया। वे बोले, “ यहाँ की हिंदी गड़ती है। कानों को भाती नहीं।”

बाबा वही बोलते थे जो उनकी जीभ पर आ जाता था। पूछा भी था उन्होंने : “क्यों हकलाऊँ ?” मलिका-ए-बर्तानिया एलिजाबेथ द्वितीय की राह में जब प्रधान मंत्री ने पलक पांवड़े बिछा दिये थे तो बाबा की पंक्ति “आओ रानी, ढोयेंगे हम पालकी ! यही हुई है राय जवाहर लाल की !!” रातोंरात मशहूर हो गई थी। प्रयागराज के कवियों में प्रधान मंत्री की मुस्कान पाने की जब होड़ लगी रहती थी, तो बाबा ने क्या लिखा ?

“वतन बेचकर पण्डित नेहरू फूले नहीं समाते हैं,
बेशर्मी की हद है फिर भी बातें बड़ी बनाते हैं।
अंग्रेजी, अमरीकी जोकरों कि जमात में हैं शामिल,
फिर भी बापू की समाधि पर झुक-झुक कर फूल चढ़ाते हैं।”

विप्लव और विद्रोह के बाबा पर्याय थे। इसीलिए हम श्रमजीवी पत्रकारों के अजीजतरीन रहे। कई बार जेल गये, अंग्रेजों की और कांग्रेसियों वाली भी। लोकनायक जयप्रकाश के संघर्ष के दौरान हम कैदियों के नारे में उनकी आवाज भी शामिल थी: “दम है कितना दमन में तेरे, देखा है और देखेंगे।” लेकिन जब सत्तावाली नचनिया के सामने नेताओं को लिपलिपाते देखा तो बाबा का मोह भंग हो गया। इसके पूर्व पिता-पुत्री पर वे मन्त्र कह चुके थे : “ॐ भ्रष्टीकरण, तुष्टीकरण, पुष्टीकरण। ॐ गद्दी पर आजन्म वज्रासन !”

शिवभक्त गोकुल मिश्रा की पांचवीं जीवित संतान बाबा थे। अतः वे देवघर के वैद्यनाथ को पसंद करते थे। उनका नाम उसी देव पर रखा गया था। तो कविताओं में उन्हें ताण्डव अच्छा लगना स्वाभाविक ही था।

बाबा मार्क्सवादी भी रहे, मगर काशी जाकर “वैदेह” नाम रख लिया। बाबा नागार्जुन ने एक वामपंथी पत्रिका के विशेषांक के लिए इंटरव्यू में कहा भी था कि “यदि ये भारतीय जनवादी लोग राष्ट्र के प्राचीन प्रतीकों का उपहास न उड़ाते, उन्हें स्वयं अपना लेते, तो ये कथित दांये बाजू वाले इन जनप्रिय चिन्हों को हथिया नहीं सकते थे।” वे चाहते थे कि ये रूसोन्मुखी भारतीय कम्युनिस्ट देश को भी जानने का प्रयास करें, रूचि लें। मगर कौन समझाये इन डांगेवादियों से माओवादियों तक के हिन्दुस्तानियों को कि देश की माटी कैसी होती है ? इसीलिये वे उससे कटे रहे। धूल जैसे उड़ते रहे।

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