गिरिजा देवी के नाम होगा चौकाघाट सांस्कृतिक संकुल का नाम - मुख्यमंत्री



--- हरेन्द्र शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी।

☆ ठुमरी की रानी अप्पा पर रहा काशी का ठप्पा .....

☆ राजकीय सम्मान से काशी में होगा अंतिम संस्कार

☆ बनारस संगीत घराने का आईकॉन चला गया - प्रो• विश्वम्भरनाथ मिश्र

काशी की तेवर और काशी की कलेवर रहीं बनारस घराने की शास्त्रीय संगीत साधिका गिरजा देवी 'अप्पा' का मंगलवार की रात कोलकाता में ह्रदय गति रुक जाने से निधन हो गया। 'अप्पा' को मंगलवार की सुबह बीएम बिरला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां इलाज के दौरान 88 वर्ष की उम्र में गिरिजा देवी अंतिम सांस ली। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार गुरुवार को काशी में होगा। बुधवार को एक दिवसीय बनारस दौरे पर आये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शोक व्यक्त करते हुये कहा कि गिरिजा देवी के रुप में संगीत के एक युग का अंत हो गया। चौकाघाट स्थित सांस्कृतिक संकुल का नामकरण गिरजा देवी के नाम पर करने की घोषणा की। उनकी मृत्यु की खबर से पूरे देश के संगीत घरानों एवं शुभेच्छुओं में शोक की लहर दौड़ गई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित देश के विशिष्ट विभूतियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत एवं ठुमरी गायन को नया आयाम देने में 'अप्पा' का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ख्याल गायिकी को आसमान देने के साथ ठुमरी, चैती, कजरी, टप्पा और होरी गीत पर महारथ हासिल था। यही वजह रही कि गिरिजा देवी को ठुमरी की रानी कहा जाता है। अप्पा की ठुमरी पर काशी का ठप्पा रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत से उनका गहरा नाता है। उनकी गाई कई ठुमरी लोगों की जुबान पर रहती है।

वर्ष 1946 में वैवाहिक सूत्र में बंधने के बाद गायन के क्षेत्र में उन्हें अपनी दादी और मां की विरोध का भी सामना करना पड़ा था। वर्ष 1951 में उन्होंने बिहार में अपना पहला मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। उनका नाता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भी था, 1990 में संगीत एवं मंच कला संकाय में वह अतिथि प्रोफेसर के रुप में कला साधकों को सांगितिक दिशा देने का भी काम किया।

गिरिजा देवी 'अप्पा' को 1989 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण व 2016 पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। 1972 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1977 पद्मभूषण - 1989, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप-2010 5 महा संगीत सम्मान अवार्ड-2012 से सम्मानित किया जा चुका है।

गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी में हुआ। पिता रामदेव राय एक ज़मींदार थे, जो संगीत प्रेमी थे। पांच वर्ष की उम्र में गिरिजा देवी के लिए संगीत की शिक्षा की व्यवस्था कर दी गई थी। गिरिजा देवी के पहले संगीत गुरु पंडित सरजू महाराज थे। नौ साल की उम्र में पंडित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। फिल्म में भी किया काम गिरिजा देवी ने कम उम्र में ही हिंदी फिल्म "याद रहे" में अभिनय किया था। गिरिजा देवी के निधन के बाद देश ने शास्त्रीय संगीत की विरासत को खो दिया।

◇ बनारस संगीत घराने का आईकॉन चली गयीं

गिरिजा देवी के निधन से मर्माहत संकटमोचन मंदिर के महंत एवं अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के अध्यक्ष प्रो• विश्वम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि विगत दिनों तुलसीघाट स्व• शारदा सहाय फाउंडेशन की ओर से आयोजित सम्मान, समारोह में उन्होंने अपने सम्मान में कहा कि मैं काशी की लड़की हूं और तुलसीघाट मेरा घर है यहीं से मैं संगीत की सफर में निकली हूं। यह मेरा सम्मान नहींं काशी की घराना संस्कृति और विद्या का सम्मान है। प्रो• मिश्र ने कहा कि संकट मोचन संगीत समारोह की वह निशा नहीं भूलता। हमारे जैसे हजारों लोगों के दिलों में वह बसती थीं। मृदंगम के जादूगर मेरे दादा स्व• पं• अमरनाथ मिश्र को वह हमेशा भैया कहकर पुकारती थीं। उन्होंने कहा कि इसी साल संकटमोचन संगीत समारोह में आई थीं। मैनें जब संकटमोचन संगीत समारोह के लिए आमंत्रित किया तो उनका जवाब था "जबले जीयब तबले हम आईब"। ऐसा तो उनका बनारस और बनारसियत से मोह था। अब असल में बनारस संगीत घराने का आईकॉन चला गया। अक्सर यह कहा जाता है कि संगीतज्ञ अपनी विद्या शिष्यों में नहीं बांटते पर गिरिजा देवी की लंबी शिष्य परंपरा है। उन्होंने अपनी विद्या खूब बांटी। इन दिनों वह कोलकाता में संगीत रिसर्ट एकेडमी में संगीत बनारस घराने के संगीत की शिक्षा दे रही थी। उन्होंने कहा कि गिरिजा देवी के निधन से बनारस के संगीत घराने की परंपरा की आखिरी कड़ी भी टूट गई। दरअसल वे अन्य सभी से एकदम अलग थीं, जो भी उनसे मिला वह उनका हो कर रह गया। प्रख्यात शास्त्रीय गायक पं• राजन- साजन मिश्र ने कहा कि गिरजा देवी संगीत साधिका के साथ ही एक सहज, सरल और जिंदादिल इंसान थीं।

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