---अंशू आंचल,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
संघर्ष और जिंदगी ये दोनों एक दूसरे में इतने घुले मिले हुए हैं कि कभी अलग हो ही नहीं सकते हैं। एक बार को तो दूध से पानी को अलग किया जा सकता है, पर जिंदगी से संघर्ष को अलग करने की सोचा भी नहीं जा सकता।
हां ये सारस्वत सत्य है कि "जिंदगी से संघर्ष को कभी भी अलग किया ही नहीं जा सकता।" क्यूंकि एक बीज को भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। पर ये संघर्ष हमें नजर नहीं आता। ऐसा नहीं है कि ये संघर्ष बहुत छोटा होता है। ये संघर्ष उतना ही बड़ा होता है जितना बड़ा हमारा अपने स्वंय के जीवन को बचाने के लिए एवं भविष्य को सुरक्षित करने के लिए होता है।
यह संघर्ष केवल इंसान के लिए ही नहीं होता है बल्कि इस ब्रम्हाण्ड के हर एक कण और हर एक जीव के लिए है। बस हमें नजर नहीं आता। नजर आता है तो सिर्फ और सिर्फ इंसान का संघर्ष। क्यूंकि हम इंसानों में भावनाएं होती है।
और सबसे बड़ी चीज अभिव्यक्ति की क्षमता होती है हम इंसानों में। अपनी अभिव्यक्ति की क्षमता से हम अपनी बात किसी भी इंसान को बड़ी आसानी से कह सकते हैं और दूसरों की बात आसानी से समझ पाते हैं। इसलिए हम अपने जीवन के संघर्षों को बयान कर सकते हैं।
कभी महसूस कीजिए तो एहसास होगा कि अपनी मां के पेट में एक दिन का भी गर्भस्थ शिशु, अंकुरित होते नन्हें नन्हें बीज, जितने ज्यादा नाजुक होते हैं उतने ज्यादा संघर्ष करते हैं अपने जीवन के लिए। हमसे कई गुना ज्यादा संघर्ष करते हैं अपने अस्तित्व के लिए वो। क्यूंकि उनके लिए तो हवाएं भी अनजान होती है। उन्हे हवाओं की भी आदत नहीं होती है। और इन हवाओं में अपने को ढालने के लिए एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
और फिर संघर्ष की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद वह शिशु बड़ी ही जद्दोजहद के बाद वह शिशु अपनी मां के पेट से बाहर आता है। और शुरु के छः माह उस शिशु के लिए और पूरे घर के लिए बड़े ही संघर्षपूर्ण होते हैं।
और जैसे जैसे हम बड़े होते हैं समझदार होते हैं हमें यह महसूस होता है कि हमारे जीवन में संघर्ष बढ़ने लगा है जबकि ऐसा कुछ भी होता नहीं है। हमें अक्सर ऐसा लगता है कि हमारा संघर्ष बढ रहा है, क्यूंकि हम अपने मस्तिष्क में स्ट्रेश लेते और उसे बढ़ाते चलते हैं। जबकि सच तो यही होता है कि हम जिन भी परिस्थिति में अक्सर पड़ते हैं उसकी आदत हमें कभी नहीं होती है बस हम स्ट्रेश लेते हैं। कुछ हद तक तो स्ट्रेश या तनाव ठीक भी होता है पर अक्सर यह बढ़ने लगता है।
और तनाव का बढ़ना किसी भी मामले में हानि ही देता है और आज कल तो हर एक मामले में हम तनाव ले रहे हैं तनाव ही बढ़ रहा है और इसका परिणाम यह है कि हम तरह तरह की शारिरिक मानसिक बिमारियों का शिकार हो रहे हैं।
यहां तक तो फिर भी ठीक है आजकल सबसे ज्यादा दिमागी टेंशन गर्भिणी मांए ले रही है ये जानते हुए भी कि शिशु पर का टेंशन का बहुत खराब इफेक्ट पड़ रहा है। आए दिन बड़े बड़े डाक्टर के स्टेटमेंट अखबारों और न्यूज चैनलों पर दिखाए जाते हैं कि गर्भिणी माएं अगर टेंशन लेती है तो उसका बैड इफेक्ट गर्भ में पल रहे शिशु पर होता है और बालक का दिमागी और शारीरिक विकास बाधित होता है। और बालक मां के पेट से ही टेंशन वसीयत के रूप में पाता है। एक वजह यह भी है कि बालकों में आजकल मानसिक बीमारी बहुत ही तेजी से फैलती जा रही है। इसलिए ही डाक्टर्स और बड़े बुजुर्ग गर्भिणी मांओ को खुश रहने की सलाह दिया करते थे।। जिससे कि आने वाली संतान हृष्ट पुष्ट हो।
और आज के इस युग में जहां हर तीसरा इंसान हैवी टेंशन और डिप्रेशन का शिकार हो रहा है हमें अपने अन्दर टेंशन से दूर रहने की क्षमताओं का विकास करना होगा।
ऐसी कलाओं को सीखना होगा जो हमें टेंशन से दूर करने में सहायक हों। हल्के म्यूजिक, गार्डनिंग, योगा खेल, किताबें पढ़ना, लेखन और दूसरे तरह के शौक और मंनोरंजन को अपनी जिंदगी में बराबर शामिल करना होगा। जिससे हम काफी हद तक अपने जीवन से टेंशन को दूर कर सकते हैं। और खुद को और अपने परिवार को काफी हद तक टेंशन से होने वाली बीमारियों से दूर रख सकते हैं।