अगर पत्रकार भी असंतुलित हो जाएं तो फिर इस समाज का क्या होगा !



--ओम प्रकाश सिंह,
कोलकाता-पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

दिल्ली हिंसा पर करीब 10 दिन बाद लिख रहा हूं। हर रोज जब हिंसा फैलती थी और मौत का आंकड़ा बढ़ता था तो मन बेचैन हो उठता था। दिल करता था कुछ लिखूं, पर लगातार फैलती नफरत और मौत का तांडव देखकर डरता था कि कहीं लिखने का कोई और नकारात्मक प्रभाव ना हो। अब नफरत की आंधी लगभग थम चुकी है। लाशें गिनी जा रही हैं और खून की राजनीति करने वाले गिद्ध बोटियां नोचने के लिए मैदान में उतर चुके हैं।

ऐसे समय में समाज के उन बुद्धिजीवी तबके की जिम्मेवारी सबसे अधिक बढ़ जाती है, जो नफरत और सनकीपन की कोढ़ में शांति का मरहम लगाने में सक्षम हैं। पत्रकारों का समूह इसमें विशेष तौर पर अपनी भूमिका निभा सकता है। लेकिन देश में जिस तरह की रिपोर्टिंग आज हो रही है वह विचलित करने वाली है। डरावनी पत्रकारिता चल रही है। नफरतों की आंधी के थम जाने के बाद भी इसे फैलाने का काम आज सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर रहा है। दंगों के पहले और बाद के सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल रिकॉर्डिंग दिखाए जा रहे हैं जिसमें लोग साजिशें रच रहे थे, घरों को तोड़ रहे थे, आग लगा रहे थे और एक दूसरे को मार-काट रहे थे। इसमें दोनों समुदायों के लोग हैं। कुछ चैनलों पर हिंदू समुदाय के लोगों की उदंडता दिखाई जा रही है तो कहीं इस्लामवादियों की। सबसे शर्मनाक बात यह है कि चैनलों ने एक दूसरे से नफरत की टेलीकास्टिंग में होड़ लगा कर रखी है। आप समाचार चैनल खोल कर बैठ जाइए। दिल्ली हिंसा की रिपोर्टिंग देख लीजिए। अगर आपके इलाके में नफरत थम गई है, तब भी एक बार फिर आपके दिलों में आग जलेगी और आप दूसरे समुदाय के खिलाफ दोबारा मारकाट करने के लिए तैयार हो जाएंगे, ऐसी नफरत भरी रिपोर्टिंग टीवी पर हो रही है।

जब मैंने पत्रकारिता जगत में पहला कदम रखा था। तो बहुत कुछ सीखने की शुरुआत भी हुई थी। सबसे बड़ी बात थी कि "बड़ी पावर बड़ी जिम्मेदारियों के साथ मिलती है"। उनका इस्तेमाल भी इसी लिहाज से होना चाहिए कि समाज के बड़े तबके को उसका लाभ मिल सके। हम इसके लिए प्रतिबद्ध थे कि निजी धर्म, जाति, राजनैतिक प्रतिबद्धताओं से पत्रकार को प्रभावित नहीं होना चाहिए। लेकिन नफरत की आंधी में आज सबसे ज्यादा कोई बह रहा है तो वह पत्रकार समुदाय है।

एक दौर था जब साम्प्रदायिक दंगों को हमेशा “दो गुटों के बीच टकराव” लिखते थे, हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी नेताओं के भड़काऊ बयान प्रकाशित या प्रसारित नहीं होते थे। स्क्रीन पर खून और लाशें नहीं दिखाते थे। कोशिश होती थी कि अपने धर्म को अपनी पत्रकारिता में नहीं घुसने दें, विष नहीं फैलने दें, हर शब्द का प्रयोग सावधानी से करें। एथिक्स को कभी पीछे नहीं छोड़ते थे। क्योंकि उसी से प्रेरणा मिलती थी। ऐसा इसलिए कि खबर का नुकसानदेह प्रभाव यथासंभव कम हो। कैसे बुरे प्रभाव को कम करें, यह सोचना पत्रकार का काम है।

अभी देश में सांप्रदायिक भावनाएं उफान पर हैं। ऐसे में अगर पत्रकार भी असंतुलित हो जाएं तो फिर इस समाज का क्या होगा? हम देश के किसी भी एक बड़े तबके को काटकर यहां से बाहर नहीं भगा सकते हैं। जो लोग भी ऐसी भावनाएं फैला रहे हैं, उनका काम आपकी भावनाओं को भड़का कर राजनीति करना है और कर रहे हैं। दोनों तरफ से मासूमों के कंधे पर बंदूकें रखकर चलाई जा रही हैं और हम मासूम लोग सियासतदानों को अपना कंधा देते जा रहे हैं।

दिल्ली हिंसा में जो लोग भी पीड़ित हुए हैं अथवा जिन क्षेत्रों में भी हिंसा फैली थी वहां आज जब धुंध छंट गई है तो साफ दिखता होगा कि किस तरह से कपिल मिश्राओं ने, वारिस पठानों ने नफरतों की आंधी को हवा दी थी और तूफान थम जाने के बाद बिलों में छुप गए होंगे। इनका यही काम है। इनकी दुकानें मासूमों की लाश पर सजती और चलती हैं। आज जब हिंसा थमी है तो दिखता होगा कि मारने-काटने, जलाने-भगाने का जहर फैलाने वाले ये वही धरती के बोझ हैं जो हर चुनाव में आपको बरगला कर आपका वोट लूट लेते हैं और जीतने के बाद नफरतों का जहर भर भर के आपको दंगाई बना देते हैं। दंगाई कोई भी हो किसी भी समुदाय का हो, हमारे समाज पर एक बदनुमा दाग ही होता है। 3 दिनों तक दिल्ली जंगल बन गई थी। इंसान जानवर बने थे और जिसे जहां मौका मिला शिकार किया। क्या यही हम हैं? यह भयंकर सनकीपन का समय है। खतरनाक यह है कि पत्रकार, शिक्षक, लेखक आदि बुद्धिजीवी भी अगर धर्मान्धता की आंधी में खुद को संतुलित नहीं रख सकेंगे तो हम ऐसी जहरीली दुनिया में प्रवेश कर जाएंगे जहां हर कोई एक दूसरे को काट खाएगा।

मुस्लिम कट्टरपंथियों ने आम मुसलमानों को दुनिया से अलग थलग कर दिया है और उन्हें लोगों को डराने वाली एक चीज़ बना दिया है। अब प्रतिहिंसा और प्रतिक्रियावश हिंदूवादियों ने भी यही करना शुरू किया है। दुनिया की सबसे सभ्य, सौम्य, शांत और सहिष्णु समुदाय के देश में उस समय भयानक हिंसा हुई जब डोनाल्ड ट्रंप मेहमान बनकर आए थे। नफरत की आंधी आज हमें ऐसी जगह पर लाकर खड़ी कर चुकी है कि हम अपने लिए ही खतरा बनते जा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे आत्मघाती आतंकी होता है। सियासतदानों ने हमारा ब्रेनवाश किया, हमारे अंदर मजहब का विष भरा और तैयार कर दिया मारने, काटने और मरने के लिए। अब मीडिया वाले इस जहर को लगातार फैलाते जा रहे हैं।

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