गंगा स्वच्छता अभियान एक तपस्या ही है – रियाज़ अहमद



गंगा को धरती पर लाने के लिए भागीरथ ने हिमालय पर अन्न जल छोड़कर कड़ी तपस्या की थी। उनके पूर्वज कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गये थे। गंगा ही उनका उद्वार कर सकती थी। कठोर तपस्या का ही फल था कि कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचकर गंगा ने भागीरथ के पूर्वजों का उद्वार किया। वहाँ से गंगा बंगाल की खाड़ी में समाविष्ट हुई, उसे आज हम गंगासागर कहते है। आज-कल गंगा स्वच्छता अभियान की बात ज़ोरों पर है। मैं आपको सच्चे दिल से बता दूँ कि गंगा स्वच्छता अभियान एक तपस्या ही है। सच्चे मन से की जाने वाली तपस्या। आज-कल तो गंगा स्वच्छता अभियान मात्र सीमेंट बालू गिट्टी से बने ठोस घाटों पर ही दिख रहे हैं। 4 से 5 बाल्टी पानी से सफाई कर फूल मालाओं से सजावट कर दीप जलाते हुए गंगा आरती कर अखबार की सुर्खियों में आ जाने से पूरी हो जाती है। समुद्र की गहराई इतनी है कि उसके आधार को समझना कठिन है वहीं गंगा की गहराई मानो जान से पड़ती है। इन बातों का जिक्र हावड़ा नगर निगम के वार्ड संख्या 59 के पार्षद व कभी बाली म्यून्सीपालिटी के विरोधी दल के नेता के रूप में जाने जाते रियाज़ अहमद ने जगन्नाथ घाट व शिमुल ताला घाट पर भ्रमण दौरान कहा। उन्होने घाट पर पड़े कूड़ों के बीच जाकर एक एक फेकी गयी वस्तुओं को दिखाते हुए कहा कि देखिए.... क्या यही है गंगा स्वच्छता की परिभाषा ?

उन्होने बताया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली माँ माटी मानुष सरकार ने हमेशा से ही विकास कार्यों को प्राथमिकता दी है। राजीव बनर्जी, फिरहाद हकीम, हावड़ा नगर निगम व मेयर डा० रथीन चक्रवर्ती के अथक प्रयास ही है जो आज दक्षिण हावड़ा के घाटों की रूप-रेखा बदल गयी है। वही उत्तर हावड़ा के बांधाघाट तक कार्य हुए हैं और आगे भी कार्य जारी रहेगा।

शिमुल ताला घाट के ठीक निकट ही तट पर रहने वाले लोगों के कर्मों से भी उन्होने अवगत करवाया। हूगली नदी के तटों को धीरे धीरे मिट्टी से भरते हुए अपने लिए अवैध कब्जा किया जा रहा है। एक ओर जहां ज्वार-भाटा के कारण हूगली नदी के किनारों पर मिट्टी के ढेर हो जाते है वही नाववाले अपनी रोजी-रोटी के लिए भाटा के वक़्त लोगों को अपने नाव पर बैठाने के लिए अवैध रूप से उनके द्वारा निर्मित माचा (जेटी) का प्रयोग करते हैं जिसे फिलहाल रोक दिया गया है, कारण हाल ही में हुए एक दुर्घटना के मिली कुछ दिनों के लिए सीख। पोर्ट ट्रस्ट द्वारा हूगली नदी में नाव चलाने के लिए नाववालों से राजस्व लेकर अनुज्ञापत्र दिया जाता है परन्तु ज्वार-भाटा से हुए मिट्टी के ढ़ेरों को हटाने या कहें मिट्टी कटाई का नित्यक्रम कार्यविधि आज कल दिखाई नहीं देता है। वही कुछ नाववालों ने बताया कि जब भाटा का असर बिल्कुल कम हो जाता है है तो अधिकांश जगहों पर नदी की गहराई लगभग 30 फीट होती है और कहीं कहीं बीच नदी में मिट्टी व बालू के टापू भी दिखने लगते हैं। हमारे तंत्र की कार्य-विधि पर आज भी सवाल बनता है....!

पार्षद रियाज़ अहमद ने गंगा स्वच्छता अभियान पर अपनी बात रुखते हुए कहा कि यदि सही मायने में गंगा को स्वच्छ रखना है तो वैसे लोगों को भी साथ लेकर चलना होगा तो गंगा से जीते है, गंगा से सीखते हैं, गंगा से जिनकी रोजी है, गंगा से जिनको रोटी मिलती है व गंगा को जो भली-भांति समझते हैं।

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