वाराणसी-उत्तर प्रदेश,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
महामना मालवीय मिशन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ईकाई द्वारा ‘कोविड-19: वैश्विक सन्दर्भ मे महामना की भारतीय जीवन दृष्टि’ विषयक राष्ट्रीय वेबिनार के तीसरे दिन का आरंभ महामना मालवीय मिशन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इकाई के महामंत्री विजयनाथ पांडेय के स्वागत भाषण से हुआ। वेबिनार के तीसरे और आखिरी दिन, समापन सत्र सहित कुल तीन सत्रों का आयोजन किया गया।
वेबिनार के छठे सत्र में "स्वच्छ्ता एवं पर्यावरण के प्रति महामना के दृष्टिकोण" विषय पर वक्ताओं ने विचार रखे। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो• पृथ्वीश नाग, पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने बताया कि मालवीय जी पर्यावरण को लेकर के काफी सजग थे तथा उन्होंने हर की पौड़ी, उत्तराखंड से लेकर काशी तक अविरल गंगा के लिए जीवन पर्यंत कार्य किया। प्रो• नाग ने आगे मानव पर्यावरण एवं सामाजिक भूगोल के विभिन्न पक्षों को गहनतापूर्वक व्याख्यित किया। उन्होंने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग की अवधारणा मानवी भूगोलशास्त्र और समाजशास्त्र में कोई नई अवधारणा नहीं है। वर्तमान में जनसंख्या घनत्व व शहरीकरण के कारण सोशल डिस्टेंसिंग कठिन हो चुका है। कोरोना वायरस के प्रसार के आधार पर पुरे देश को 3 क्षेत्रों में विभाजित करते समय भौगोलिक स्थिति एवं जनसंख्या घनत्व को भी विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
सत्र के दूसरे मुख्य वक्ता डॉ• उपेंद्र कुमार त्रिपाठी, अध्यक्ष, वेद विभाग व समन्वयक, वैदिक विज्ञान केंद्र एवं अध्यक्ष, महामना मालवीय मिशन का•हि•वि•वि• इकाई ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपराएँ बहुत प्रगतिशील रही हैं, हमने हमेशा स्वच्छता को महत्व दिया। हम सभी पर्यावरण रूपी पंचमहाभूतों से घिरे हुए हैं। वेदों में यज्ञ और अग्निहोत्र का वर्णन है जो कि पर्यावरण के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है। अग्नि को दी हुई आहुति सौरमंडल को प्राप्त होती है सौरमंडल में मेघ का निर्माण होता है, यही मेघ हमें वृष्टि के रूप में प्राप्त होता है और यह वृष्टि अन्न उत्पादन में सहायक होती है। इस प्रकार यह पर्यावरण चक्र चलता रहता है जोकि जीवन जीने में सहायक होता है। भारतीय संस्कृति में पंचमहायज्ञों की जो अवधारणा है। उसमें भूतयज्ञ विशेष रूप से पर्यावरण को दृष्टिगत रखते हुए विकसित की गयी है। कालांतर में अपनी जड़ों से कटने के कारण हम अपनी जीवन पद्धति को भूल गए और मानसिक दासता के कारण हम अपनी जीवन शैली को धारण करने में आत्मग्लानि महसूस करने लगे तथा पाश्चात्य जीवन शैली को धारण करते हुए हमें गर्व महसूस होने लगा। आज हम महामारी के दौर से गुजर रहे हैं जिसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि हमने सिर्फ अपनी प्रकृति का दोहन किया है और बदले में उसे दिया कुछ भी नहीं। महामना मालवीय जी के आचार, विचार, व्यवहार, आहार-विहार इस महामारी से उबरने में हमारे लिए सहायक हो सकते हैं।
प्रो• कविता शाह, पूर्व निदेशक, पर्यावरण संस्थान एवं सतत विकास एवं समन्वयक, महामना मालवीय गंगा अनुशंधान केंद्र, नदी विकास एवं जल संसाधन प्रबंधन, का•हि•वि•वि• ने अपने व्याख्यान में कहा कि स्वच्छता, श्रेष्ठ संस्कृति का प्रतीक है। महामना का मानना था किसी भी व्यक्ति, राष्ट्र व समाज का निर्माण तभी संभव है जब उसकी शिक्षा भारतीय मूल्यपरक संस्कृति को ध्यान में रखते हुए दी जाए। पर्यावरण के सभी अवयव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर यदि किसी एक में प्रदूषण फैलता है तो अन्य सभी अवयव भी प्रदूषित हो जाएंगे। वर्तमान कोरोना महामारी एक प्रकार का वायु प्रदूषण ही है। वायु से जल प्रदूषित होता है, जल प्रदूषण से मृदा प्रदूषित होती है और इस प्रकार उस मिट्टी से निकलने वाला अनाज दूषित होता है, दूषित अनाज ग्रहण करने से मन में विकार आता है जिससे बुद्धि भ्रमित होती है और भ्रमित बुद्धि हमें नकारात्मकता की ओर ले जाती है तथा यह नकारात्मकता पुनः हमें पर्यावरण प्रदूषण के लिए प्रेरित करती है। अतः आवश्यक है कि हम इस चक्र का भेदन करें। कोविड -19 संकट के बीच पर्यावरण के विभिन्न आयामों में जो सुधार हुआ है उसे बनाए रखा हमारा कर्तव्य है।
तदुपरांत प्रो• ज्योत्स्ना तिवारी, एन•सी•ई•आर•टी•, नई दिल्ली ने कहा कि नदियों के किनारों पर हर सभ्यता विकसित हुई है, गंगा भारत की जीवन रेखा है। स्वच्छ गंगा केवल सरकार का काम नहीं है, अपितु यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सतत विकास पर ध्यान देने के बजाय, हम केवल विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और पर्यावरण के साथ तदात्मा स्थापित करने की अपरिहार्यता है। इस सत्र का समापन मालवीय जी के जीवनवृत पर आधारित डाक्यूमेंट्री के प्रसारण के साथ हुआ।
कार्यक्रम का सातवां सत्र “महामना की दृष्टि में विधिक प्रणाली एवं न्याय की संकल्पना” विषय पर आधारित रहा। इस सत्र के मुख्य वक्ता पूर्व न्यायाधीश माननीय जस्टिस बी• एन• श्रीकृष्णा, उच्चत्तम न्यायालय, नई दिल्ली ने कहा कि कानूनी पचड़ा वास्तव में केवल विशेष अधिनियम की धारा को अध्ययन करने और अवसर की मांग के दौरान पुन: पेश करने की कोशिश करने का मामला नहीं है। इसके लिए न्याय के मूल सिद्धांतों की व्यापक समझ की आवश्यकता है।
मालवीय जी के जीवन वृत्त से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे, उन्होंने बताया कि मालवीय जी एक विशाल व्यक्तित्व के धनी थे जो भारतीय जीवन-पद्धति को स्वयं अपने जीवन में उतारा। उन्होंने चौरी-चौरा मामलों में मालवीय जी योगदान को विशेष रूप से उल्लिखित किया और बताया कि उनके पैरवी के कारण ही अधिकांश आरोपियों को राहत मिल पायी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मालवीयजी की शानदार वकालत से प्रभावित हुए कि उन्होंने तीन अलग-अलग अवसरों पर उनके सामने अपना सिर झुकाया जो देश के न्यायिक इतिहास में एक दुलर्भ संयोग है।
इसी क्रम में प्रो• शैलेन्द्र कुमार गुप्ता, आचार्य, विधि संकाय, का•हि•वि•वि• ने विधि एवं न्याय के सम्बन्ध में अपना विचार रखते हुए कहा कि न्याय विधि का अंतिम लक्ष्य है। इसके महत्व को बताते हुए प्रो• गुप्ता ने एक पश्चिमी चिंतक प्रोफेसर जॉन रोल्स के विचारों को साझा किया जिन्होंने ने अपनी पुस्तक “द थ्योरी ऑफ जस्टिस’ में ये बताया है कि न्याय किसी भी सामाजिक व्य्वस्था का प्रथम जीवन मूल्य होता है और न्याय एवं सत्य के बीच अन्योन्याशीक सम्बन्ध है इसलिए हम इस दोनों में से किसी की भी उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। भारतीय विधि व्यवस्था का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि इसमे कुछ ढांचागत कमियां है और अप्रासंगिक विधियों को समाप्त करने की भारत सरकार के प्रयासों की प्रशंसा की। न्याय एवं विश्व में विद्यमान विभिन विचार धाराओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने वर्तमान चिंतन व्यवस्था के अंतर्गत पांच प्रकार के प्रमुख विचारधाराओं जैसे उदारवाद, समाजवाद, साम्यवाद, नारीवाद, पर्यावरणवाद के गुण व अवगुण पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि इन पांचो विचारधाराओं को मिला दिया जाए तो एक महामना मालवीयवाद चिंतन दर्शन हमें प्राप्त होगा और यह दर्शन इन सभी दर्शनों को अपने में समाहित करता है।
विधि संकाय, का•हि•वि•वि•, वाराणसी के आचार्य डॉ• अनूप कुमार ने इस सत्र का संचालन किया एवं धन्यवाद ज्ञापन दिया। समापन सत्र का आरम्भ करते हुए स्वागत वक्तव्य प्रो• जय प्रकाश लाल सदस्य, संरक्षक मण्डल, महामना मालवीय मिशन, का•हि•वि•वि• इकाई ने दिया। इन आठ सत्रों में महामना के चिन्तन को विविध विषयों के अन्तर्गत व्याख्यायित किया गया जिसकी विस्तृत वेबिनार रिपोर्ट प्रो• सुमन जैन, सचिव, महामना मालवीय मिशन, का•हि•वि•वि• इकाई ने प्रस्तुत की। समापन सत्र के विशिष्ट अतिथि हरिशंकर सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, महामना मालवीय मिशन, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में कहा कि महामना मालवीय मिशन महामना चिन्तन को विश्व पटल पर प्रसारित करने की शुभ इच्छा से महामना वांगमय का प्रकाशन कर रहा है। उन्होंने कहा कि मालवीय जी विद्यार्थियों से स्वस्थ व सुखी रहने के लिए प्रतिदिन 2 घण्टे स्वाध्याय, नियमित व्यायाम व योग, गीता प्रवचन सुनना इत्यादि भारतीय संस्कृति के उपाय बताया करते थे। आज के समय में पाश्चात्य जीवन शैली से आयी विकृतियों का विश्लेषण एवं उनसे निवृत्ति के उपाय खोजना आवश्यक है।
कार्यक्रम के मुख्यवक्ता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख स्वान्त रंजन जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि मालवीय जी ने समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए हिन्दू चिन्तन के आधार पर अपनी समाजोपयोगी कार्ययोजना को लोकजागरण का विषय बनाया। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा थे। उन्होंने चरित्ररक्षा एवं स्त्री सम्मान पर विशेष पर बल दिया था। उन्होंने कहा कि महामना शिक्षा को पुरातन और नवीनतम मूल्यों के बीच एक सेतु के रूप में देखते थे। जीवन का सर्वांगीण विकास मालवीय जी का शिक्षा विषयक मूल उद्देश्य था। उसके लिए वे प्राथमिक शिक्षा को आवश्यक एवं निःशुल्क बनाना चाहते थे। वे पुरातन विद्या के साथ तकनीकि शिक्षा को भी आवश्यक मानते थे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महामना के पौत्र, महामना मालवीय मिशन के संरक्षक तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलाधिपति न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय जी ने कहा कि महामना अपने जीवन में सदैव नैतिकता, जीवन मूल्यों तथा उच्च आदर्शों का पालन किया। मैकाले की शिक्षा पद्धति के साथ वे सहमत नहीं थे, वे मानते थे कि इस शिक्षा प्रणाली से भारत के नागरिकों का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है।
बौद्धिक रूप से प्रखर होने के साथ ही वे अत्यन्त कोमल हृदयवाले व्यक्ति थे। मालवीय जी विशुद्ध स्वदेशी शिक्षा के समर्थक तथा प्रवर्तक रहे। महामना के लिबास भी सदैव भारतीयता से संवलित रहे। उनकी कार्य शैली में कभी अंग्रेजियत दिखाई नहीं देती थी। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था। उन्होंने उस समय में अछूतोद्धार का महनीय कार्य किया जिससे समाज में जागृति आई। स्त्री शिक्षा पर भी उन्होंने लोकजागरण का कार्य किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो• विजय कुमार शुक्ल ने कहा कि आज सम्पूर्ण विश्व कोविड-19 की समस्या से जुझ रहा है। भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा इसकी रोकथाम के लिए किये जा रहे प्रयास सराहनीय है। हमारे स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों के रूप में हमें जनसेवक मिले हैं। माध्यम कुछ भी हो पर अपनी क्षमता के अनुसार सेवाभाव होना चाहिए, यही मालवीय जी का विचार था। महामना का सम्पूर्ण जीवन दर्शन एवं कार्य शैली भारतीय शास्त्रीय परम्परा से ओत-प्रोत रहा है। उनके जीवन दर्शन के अनुरूप चिन्तन मनन से समाज को निश्चित ही कोविड-19 जैसी समस्या से जूझने का मार्ग मिल सकेगा। सत्र संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ• ममता मेहरा ने किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ।
इस वेबिनार को फेसबुक और यूट्यूब सहित मालवीय मिशन के सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर संचालित किया गया, जिसमे लगभग 6000 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर आज तक तीन दिनों में लगभग चौवन हजार लोगों ने लाईव देखा।
इस कार्यक्रम के आयोजन समिति में अध्यक्ष, डॉ• उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी, संयोजिका, प्रो• कविता शाह, सह संयोजक, विजय नाथ पाण्डेय व प्रो• शैलेन्द्र कुमार गुप्ता, आयोजन सचिव, प्रो• सुमन जैन, संयुक्त आयोजन सचिव, डॉ• प्रभाकर उपाध्याय एवं सह संयुक्त आयोजन सचिव, डॉ• अभय कुमार सिंह, व डॉ• अनूप कुमार रहे।