चंबल के बीहड़ में 700 साल पुराने इस मंदि‍र से प्रेर‍ित है भारतीय लोकतंत्र का मंदिर संसद



--अभिजीत पाण्डेय (ब्यूरो),
पटना-बिहार, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

मध्य प्रदेश के भिंड मुरैना क्षेत्र में चंबल घाटी के बीहड़, भले ही डाकुओं की शरणस्थली के रूप में कुख्यात हैं। लेकिन इसी बीहड़ पट्टी के एक गुमनाम इलाके में गुलजार है संसद भवन की प्रतिकृति।

सियासी कोलाहल से दूर, चंबल घाटी के वीराने में मौजूद ‘चौंसठ योगिनी मंदिर’ की। हकीकत में तो यह शिवालय है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के मंदिर अर्थात दिल्ली स्थित संसद भवन की इमारत इसी मंदिर की हूबहू प्रतिकृति है।

मान्यता है कि लोकतंत्र के महापर्व के रूप में चल रहे आमचुनाव में शरीक होने वाले इस क्षेत्र के तमाम उम्मीदवार संसद भवन पहुंचने की हसरत पूरी करने के लिए इस मंदिर की दहलीज पर भी मत्था टेकने आते हैं। जानकारी के अनुसार यूनेस्को विश्व विरासत सूची में लाने की योजना प्रस्तावित है। मुरैना के मितावली गांव में स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर ही नहीं, बल्कि यहां आसपास के इलाके में मौजूद ऐतिहासिक महत्व के अन्य विरासत स्थल, अभी भी दुनियां की नजरों से ओझल हैं। इन्हें विश्व पटल पर लाने के लिए इस इलाके को यूनेस्को विश्व विरासत सूची में लाने की योजना प्रस्तावित बताई जा रही है।

मितावली के चौंसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में तत्कालीन प्रतिहार क्षत्रिय राजाओं ने कराया था। भारतीय पुरात्व विभाग के अनुसार यह मंदिर गोलाकार है। इसी गोलाई में बने चौंसठ कमरों में से हर एक में एक शिवलिंग स्थापित है। इसके मुख्य परिसर में एक विशाल शिव मंदिर है। बताते हैं कि हर शिव प्रतिमा के साथ देवी योगिनी की प्रतिमाएं भी स्थापित है। इस कारण इसे चौंसठ योगिनी मंदिर के नाम से जाना गया। पुरातत्व विभाग के अनुसार देवी की कुछ मूर्तियां चोरी हो गई हैं, जबकि कुछ देश के विभिन्न संग्रहालयों में हैं। यह 100 से ज़्यादा पत्थर के खंभों पर टिका है।

स्थानीय निवासी आज भी मानते हैं कि यह मंदिर आज भी शिव की तंत्र साधना के कवच से ढका हुआ है। यहां आज भी रात में रुकने की इजाजत नहीं है, ना तो इंसानों को और ना ही पंक्षी को। तंत्र साधना के लिए मशहूर इस मंदिर में शिव की योगनियों को जागृत किया जाता था।

ये सभी चौसठ योगिनी माता आदिशक्ति काली का अवतार हैं। घोर नामक दैत्य के साथ युद्ध करते हुए मां काली ने यह अवतार लिए थे। इन देवियों में दस महाविघाएं और सिद्ध विघाओं की भी गणना की जाती है। ये सभी योगिनी तंत्र तथा योग विघा से संबंध रखती हैं।

योगिनी मंदिर एक जमाने में तांत्रिक यूनिवर्सिटी कहलाता था। कभी इस मंदिर में तांत्रिक सिद्धियां हासिल करने के लिए तांत्रिकों का जमावड़ा लगा रहता था। विदेशी नागरिक भी यहां तंत्र-मंत्र की विघाएं हासिल करने आते थे। आज भी कुछ तांत्रिक, सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यज्ञ करते हैं। यहां इस मंदिर को इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहास के जानकरों ने बताया कि करीब सात सौ साल पहले, 1323 ई. में जब राजा देवपाल ने तंत्र साधना के शिक्षा केंद्र के रूप में चौंसठ योगिनी मंदिर का निर्माण कराया होगा, तब दूर दूर तक किसी के जेहन में यह बात नहीं रही होगी कि 20वीं सदी में ब्रिटिश वास्तुकार एडवर्ड लुटियन, इस मंदिर के वास्तुशिल्प को भारत के लोकतंत्र के मंदिर में हूबहू उकेरेंगे। ऊबड़ खाबड़ रास्तों से यहां आने वाले सैलानियों को मितावली पहुंचते ही लगभग 200 फुट ऊंची पहाड़ी पर निर्मित यह मंदिर, दूर से संसद भवन की याद दिला देता है।

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